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लोकगीतों में झलकती संस्कृति का प्रतीक : होली (विविध)

Author: आत्माराम यादव 'पीव'

होली  की एक अलग ही उमंग और मस्ती होती है जो अनायास ही लोगों के दिलों में गुदगुदी व रोमांच से भर देती है। खेतों में गेहूं चने की फसल पकने लगती है। जंगलों में महुए की गंध मादकता भर देती है। कहीं आम की मंजरियों की महक वातावरण को बासन्ती हवा के साथ उल्लास भरती है तो कहीं पलाश दिल को हर लेता है। ऐसे में फागुन मास की निराली हवा में लोक संस्कृति परम्परागत परिधानों में आन्तरिक प्रेमानुभूति के सुसज्जित होकर चारों और मस्ती भंग आलम बिखेरती है जिससे लोग जिन्दगी के दुख-दर्द भूलकर रंगों में डूब जाते है। शीत ऋतु की विदाई एवं ग्रीष्म ऋतु के आगमन की संधि बेला में युग मन प्रणय के मधुर सपने सजोये मौसम के साथ अजीव हिलौरे महसूस करता है जब सभी के साथ ऐसा हो रहा हो तो यह कैसे हो सकता है कि ब्रज की होली को बिसराया जा सके। हमारे देश के गॉव-गॉव में ढ़ोलक पर थाप पड़ने लगती है,झांझतों की झंकार खनखता उठती है और लोक गीतों के स्वर समूचे वातावरण को मादक बना देते है। आज भी ब्रज की तरह गांवों व शहरों के नरनारी बालक-वृद्घ सभी एकत्रित होकर खाते है पीते -गाते है और मस्ती में नाचते है।

राधा कृष्ण की रासस्थली सहित चौरासी कोस की ब्रजभूमि के अपने तेवर होते हैं जिसकी झलक गीतों में इस तरह फूट पड़ते को आतुर है जहां युवक युवतियों में पारंपरिक प्रेमाकंट के उदय होने की प्राचीन पराकाष्ठा परिष्कृत रूप से कूक उठती हैः-

आज विरज में होली रे रसिया

होली रे रसिया बरजोरी रे रसिया

क हॅू बहुत कहॅू थोरी रे रसिया

आज विरज में होली रे रसिया।

नटखट कृष्ण होली में अपनी ही चलाते है। गोपियों का रास्ता रोके खडे होना उनकी फितरत है तभी जी भर कर फाग खेलने की उन जैसी उच्छृखंलता कही देखने को नहीं मिलती। उनकी करामाती हरकतों से गोपियां समर्पित हो जाती है और वे अपनी बेवशी घॅूघट काढ़ने की शर्महया को बरकरार रखे मनमोहन की चितवन को एक नजर देखने की हसरत लिये जतलाती है कि सच मैं अपने भाई की सौगंध खाकर कहती हॅू कि मैं तुम्हें देखते से रही। इसलिये उलाहना करते हुये कहती है कि-

भावै तुम्हें सो करौ सोहि लालन

पाव पडौ जनि घूघट टारौ

वीर की सौ तुम्हे देखि है कैसे

अबीर तो ऑख बचाय के डारौ

जब कभी होली खेलते हुए कान्हा कहीं छिप जाते है तब गोपियॉ व्याकुल हो उन्हें ढॅूढती है। उनके लिए कृष्ण उस अमोल रत्न की तरह है जो लाखों में एक होता है वे कृष्ण के मन ही मन नहीं अपितु अंगों की सहज संवेदनाओं से भी चिर-परिचित है तभी उनके अंग स्पर्श के अनुभव को तारण करते हुए उपमा देती है कि उनके अंग माखन की लुगदी से भी ज्यादा कोमल हैः-

अपने प्रभु को हम ढॅूढ लियों

जैसे लाल अमोलक लाखन में

प्रभु के अंग की नरमी है जिती

नरमी नही ऐसी माखन में।

वे कृष्ण को एक नजरभर के लिये भी अपने से अलग रखने को कल्पना नहीं करती। यदि वे नजरों के आगे नहीं होते तो उस बिछोह तक को वे अपने कुल की मर्यादा पानी में मिलाकर पीने का मोह नहीं त्यागती। जब कृष्ण दो चार दिन नहीं मिलते तो उस बिछुडन की दशा में उनको होश भी नहीं रहता कि कब उनकी ऑखों से बरसने वाले ऑसुओं से शरीर धुल गया हैः-

मनमोहन सों बिछुरी जब से

तन ऑसुन सौ नित धोबति है

हरीचन्द्र जू प्रेम के फन्द परी

कुल की कुल लाजहि खोवती है।

इस कारण सभी गोपिया मान प्रतिष्ठा खोकर दुख उठाने के लिये सदैव तत्पर रहती है उन्हें भोजन में रूचि नहीं है बशर्ते कृष्ण ब्रजभूमि त्यागने को न कहे। ब्रज भूमि से इतना अधिक गहरा लगाव हो गया है जैसे आशा का संबंध शरीर से एकाकर हो जाता है।ः-

कहीं मान प्रतिष्ठा मिले-न-मिले

अपमान गले में बंधवाना पडे

अभिलाषा नहीं सुख की कुछ भी

दुख नित नवीन उठाना पडे

ब्रजभूमि के बाहर किन्तु प्रभो

हमको कभी भूल के न जाना पडे

जल भोजन की परवाह नहीं

करके व्रत जीवन यॅू ही बिताना पडे।

फाग की घनी अंधेरी रात में श्याम का रंग उसमें मेल खाता है। गोपी उन्हें रंगने को दौडती है किन्तु वे पहले ही सतर्क है और गोपियां अपने मनोरथ सिद्घ किये बिना कृष्ण के हाथों अपने वस्त्र ओढ़नी तक लुटा आती हैः-

फाग की रैनि अंधेरी गलि

जामें मेल भयो सखि श्याम छलि को

पकड़ बॉह मेरी ओढ़नी छीनी

गालन में मलि दयो रंग गुलाल को टीको।

आयो हाथ न कन्हैया गयो न भयो

सखी हाय मनोरथ मेरे जीको।

कृष्ण पर रीझी गोपिया अनेक अवसर खो बैठती है तो कई पाती भी है। इधर कृष्ण गोपी को अकेला पाकर उस पर अपना अधिकार जताते है तो उधर गोपियॉ कृष्ण को गलियों में रोक गालिया गाते हुए तालिया बजाती पिचकारी से रंग देती हैः-

मैल में माई के गारी दई फिरि

तारी दई ओ दई ओ दई पिचकारी

त्यों पदमाकर मेलि मुढि इत

पाई अकेली करी अधिकारी।

फाग हो और बृजभान दुलारी न हो ऐसा संभव नहीं। रंग गुलाल केसर लिये मधुवन में कृष्ण के मन विनोद हिलोर लेता है कि अब बृजभान ललि के साथ होली खेलने का आनन्द रंग लायेगाः-

हरि खेलत फाग मधुवन में

ले अबीर सुकेसरि रंग सनै

उत चाड भरी बृजभान सुता

उमंग्यों हरि के उत मोढ मनै।

होली खेलते समय कृष्ण लाल रंगमय हो जाते है जागते हुए उनकी आंखे भी लाल हो गई है, नंदलाल-लाल रंग से रंगे है यहॉ तक कि पीत वस्त्र पीताम्बर सहित मुकुट भी लाल हो गया हैः-

लाल ही लाल के लाल ही लोचन

लालन के मुख लाल ही पीरा

लाल हुई कटि काछनी लाल को

लाल के शीश पै लस्त ही चीरा।

मजाक की अति इससे कहीं दूसरी नहीं मिलेगी जब गोपियॉ मिलकर कृष्ण को पकड़ उनके पीताम्बर व काम्बलियॉ को उतारकर उन्हें साडी झुमकी आदि पहना दे फिर पांव में महावर आंखों में अंजन लगा गोपी स्वरूप बनाकर अपने झुण्ड में शामिल कर लें तब होली का मजा दूना हुए नहीं रह सकेगाः-

छीन पीताम्बर कारिया

पहनाई कसूरमर सुन्दर सारी

आंखन काजर पाव महावर

सावरौ नैनन खात हहारी।

कृष्ण इस रूप में अपने ग्वाल सखाओं के साथ हॅसी ठहाका करने में माहिर है। बृजभान ललि भीड का लाभ लेकर कृष्ण को घर के अन्दर ले जाती है और नयनों को नचाते हुए मुस्कुराहटे बिखेरती हुई दोबारा होली खेलने का निमंत्रण इस तरह देती हैः-

फाग की भीर में पकड़ के हाथ

गोविन्दहि ले गई भीतर गोरी

नैन नचाई कही मुसुकाइ के

लला फिर आईयों खेलन होरी।

होली के राग रंग में कोई अधिक देर रूठा नहीं रहता जल्दी ही एक दूसरे को मनाने की पहल चल पडती है फिर मिला जुला प्रेम पाने की उम्मीद में सभी रंगों में खो जाते है। लक्ष्य और भावना के चरम आनन्द की भाव भंगिया को आंखों में अंग प्रत्यंग में व्यक्त किये पीढी दर पीढी यह पर्व अनन्तकाल से चला आ रहा है कृष्ण ब्रज को मन में बसाये एक महारास की निश्चलता श्रद्घा को जीवन्त रखने हेतु सभी को प्रेरित करता हुआ आनन्द की तरंगे फैलाता जीवन में रंग घोल जीने की कला लिये।

-आत्माराम यादव 'पीव'

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