अंग्रेजी के माया मोह से हमारा आत्मविश्वास ही नष्ट नहीं हुआ है, बल्कि हमारा राष्ट्रीय स्वाभिमान भी पददलित हुआ है। - लक्ष्मीनारायण सिंह 'सुधांशु'।

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पिछली प्रीत (काव्य)

Author: जाँ निसार अख्तर

हवा जब मुँह-अँधेरे प्रीत की बंसी बजाती है,
कोई राधा किसी पनघट के ऊपर गुनगुनाती है,
मुझे इक बार फिर अपनी मोहब्बत याद आती है!

उफ़क पर आस्माँ झुककर ज़मीं को प्यार करता है,
ये मंज़र एक सोई याद को बेदार करता है,
मुझे एक बार फिर अपनी मोहब्बत याद आती है!

मिलाकर मुँह से मुँह साहिल से जब मौजे गुज़रती है,
मेरे सीने में मुद्दत की दबी चोंटे उभरती है,
मुझे एक बार फिर अपनी मोहब्बत याद आती है!

चमकता एक तारा चाँद के पहलू में चलता है,
मेरा सोया हुआ दिल एक करवट सी बदलता है,
मुझे एक बार फिर अपनी मोहब्बत याद आती है!

ज़मीं जब डूबते सूरज की खातिर आह भरती है,
किरन जब आस्माँ को इक विदाई प्यार करती है,
मुझे एक बार फिर अपनी मोहब्बत याद आती है!

पिघलती शम्मा पर गिरते है जब ताक़ों में परवाने,
सुनाता है कोई जब दूसरों के दिल के अफ़साने,
मुझे एक बार फिर अपनी मोहब्बत याद आती है!

-जाँ निसार अख्तर
[जांनिसार अख़्तर और उनकी शायरी]

श्ब्दार्थ/मायने
उफक़ पर = आसमान पर/क्षितिज पर
मंज़र = दृश्य
बेदार = जगाता है
साहिल = तट

 

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