यदि स्वदेशाभिमान सीखना है तो मछली से जो स्वदेश (पानी) के लिये तड़प तड़प कर जान दे देती है। - सुभाषचंद्र बसु।

Find Us On:

English Hindi

हर लम्हा ज़िंदगी के-- (काव्य)

Author: सूर्यभानु गुप्त

हर लम्हा ज़िंदगी के पसीने से तंग हूँ
मैं भी किसी क़मीज़ के कॉलर का रंग हूँ

मुहरा सियासतों का मिरा नाम आदमी
मेरा वजूद क्या है ख़लाओं की जंग हूँ

रिश्ते गुज़र रहे हैं लिए दिन में बत्तियाँ
मैं आधुनिक सदी की अँधेरी सुरंग हूँ

निकला हूँ इक नद्दी सा समुंदर को ढूँढने
कुछ दूर कश्तियों के अभी संग-संग हूँ

माँझा कोई यक़ीन के क़ाबिल नहीं रहा
तन्हाइयों के पेड़ से अटकी पतंग हूँ

ये किस का दस्तख़त है बताए कोई मुझे
मैं अपना नाम लिख के अंगूठे सा दंग हूँ

-सूर्यभानु गुप्त

 

Back

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश