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कच्चे-पक्के मकान (काव्य)

Author: सोमनाथ गुप्ता 'दीवाना रायकोटी'

कच्चे मकान थे सच्चे इंसान थे
दिलों में मोहब्बत, एक दूसरे की जान थे 
मिलजुल कर करते काम, ना कोई एहसान थी
बोलों के पक्के, इज़्ज़त में आगे 
बच्चों के लिए माँ-बाप ही उनकी पहचान थे
देसी खाना, देसी पहनना और मीठे पकवान थे
इज़्ज़त के रखवाले, हट्टे-कट्टे नौजवान थे
हर जरूरत हो जाती थी पूरी, चाहे कुछ कम सामान थे
फ़रेब लिपट गया है सीने से अब
खो गए परिवारों के नाम कहीं
होती नहीं जरूरतें पूरी
घर में भरा पड़ा ढेरों सामान है
माँ-बाप बैठे हैं दुबके घर के कोने में
बदल गया कितना इंसान है
हर किसी का हर किसी पर इक एहसान है
अब ना किसी की कोई पहचान है
बन गए 'दीवाना' पक्के अब मकान है।

-सोमनाथ गुप्ता 'दीवाना रायकोटी'
 न्यूज़ीलैंड

[सफेद बादलों के देश में, संपादन प्रीता व्यास, बोधि प्रकाशन, 2019 ] 

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