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भेड़िया और बकरी (कथा-कहानी)

Author: अरविंद कुमार

एक बार की बात है, एक जंगल में एक बकरी रहती थी, उसने अपने लिए जंगल में एक झोंपड़ी बनायी और वहाँ अपने बच्चों को जन्म दिया। बकरी अकसर चारे की खोज में घास वाले जंगल में जाया करती थी। बकरी के बाहर जाते ही उसके बच्चे खुद को झोंपड़ी के अंदर बंद कर लेते थे, और कहीं बाहर नहीं जाते थे। बकरी वापस आने पर दरवाजे को खटखटा कर गाना गाती:

प्यारे मेमनों, प्यारे बच्चों!
खोलो, जल्दी ताला खोलो!
मैं घास के वन में गयी थी;
रेशमी घास खायी थी,
ठंडा पानी पीया था,
दूध छाती से बह रहा है,
छाती से बहता हुआ खुर तक टपक रहा है,
और खुर से सोंधी जमीन पर!

इस तरह गाना सुनकर बच्चे तुरंत दरवाज़ा खोल देते और माँ अन्दर आ जाती। माँ उनको दूध पिलाती है और वापस जंगल की ओर चली जाती, बच्चे फिर से स्वयं को झोंपड़े के अंदर बंद कर लेते।

एक बार एक भेड़िया ये सब सुन लेता हैं और अच्छे समय का इंतजार करता हैं। जैसे ही बकरी जंगल की ओर जाती है, वह तुरंत झोंपड़ी के समीप पहुँच कर अपनी भारी आवाज़ में चिल्लाने लगता है :

प्यारे बच्चों, तुम्हारे बाबा,
खोलो, ताला खोलो!
तुम्हारी मम्मी आई है,
दूध ले के आयी है,
खुर पानी में डूबे हुये हैं।

लेकिन बच्चों ने जवाब दिया:

सुन रहे हैं- सुन रहे हैं - यह माँ की मीठी आवाज़ नहीं है। हमारी माँ नीची आवाज़ में गाना गाती है और ऐसे नहीं चिल्लाती है।

भेड़िया वहाँ से चला गया और अपने आप को छुपा लिया।

थोड़ी देर में बकरी आयी और दरवाज़ा खटखटाया -

प्यारे मेमनों, प्यारे बच्चों!
खोलो, जल्दी ताला खोलो!
मैं घास के वन में गयी थी;
रेशमी घास खायी थी,
ठंडा पानी पीया था,
दूध छाती से बह रहा है,
छाती से बहता हुआ खुर तक टपक रहा है,
और खुर से सोंधी जमींन पर!

बच्चे अपनी माँ को अन्दर ले आये और विस्तार से पूरी कहानी सुनायी। बताया कि कैसे एक भेड़िया उनके घर तक आया और वह हम सब को खाना चाहता था।

बकरी ने बच्चों को दूध पिलाया और बाहर जंगल की ओर गयी तथा गुस्से में बोली : अगर कोई मेरे घर के समीप आता है और खड़े हो कर अपनी मोटी आवाज़ में कुछ पूछता हैं तथा अन्दर झाँकता हैं; तो मैं उसे देख लूँगी। उसे कभी अपने घर की चौखट के अन्दर नहीं आने दूँगी।

जैसे ही बकरी बाहर गयी वैसे ही भेड़िया घर के पास आ पहुँचा, दरवाजे को खटखटाया और अन्दर झांकते हुए नीची सुर में गाना शुरू किया:

प्यारे मेमनों, प्यारे बच्चों!
खोलो, जल्दी ताला खोलो!
मैं घास के वन में गयी थी;
रेशमी घास खायी थी,
ठंडा पानी पीया था,
दूध छाती से बह रहा है,
छाती से बहता हुआ खुर तक टपक रहा है,
और खुर से सोंधी जमीन पर!

बच्चों ने दरवाज़ा खोला दिया, भेड़िया तेजी से झोंपड़ी के अन्दर घुसा और सब को खा गया लेकिन एक मेमने ने भट्ठी के अन्दर छिपकर अपनी जान बचा ली।

जब बकरी घर पर आयी और बहुत देर तक इंतजार के बाद भी जब किसी ने उसकी बात का जवाब नहीं दिया तो बकरी दरवाज़े के थोड़ा पास गयी और देखा कि सब कुछ खुला था, अन्दर से झोंपड़ी भी खाली पड़ी थी। जब वह भट्ठी में झांकी तो वहाँ उसे एक बच्चा पड़ा मिला।

जैसे ही बकरी को अपने दुर्भाग्य का पता चला वह एक मेज़ पर बैठ गयी और जोर-जोर से रोकर कहने लगी:

- ओह, मेरे बच्चों, मेरे प्यारे बच्चों! क्यों तुमने उस दुष्ट भेड़िये के लिए दरवाज़ा खोला और उसे अन्दर आने दिया?

भेड़िये ने तुम सब को खा लिया और मुझे यहाँ इस दुःख की घड़ी में अकेला छोड़ दिया।

यह सुन कर भेड़िया झोंपड़ी के अन्दर आया और बकरी को बोला:

ओह, मेरी बहन! क्यों तुम मुझ पर ये पाप चढ़ा रही हो? क्या मैं ऐसा कर सकता हूँ! चलो मेरे साथ जंगल में घूम कर आते है।

नहीं, भाई, त्योहार से पहले नहीं।

चलो चले! - भेड़िये ने कहा।

फिर दोनों जंगल की ओर चल दिये, रास्ते में उन्हें एक गड्ढा दिखा जिसमें कुछ समय पहले ही लुटेरों ने दलिया बनाया था और उसमें अभी भी अच्छी-ख़ासी आग बची हुई थी।

बकरी भेड़िये से बोली:
- भाई, चलो कोशिश करें कि कौन इस गड्ढे के ऊपर से कूद सकता है?

दोनों कूदने के लिए खड़े हो गये।

भेड़िया जैसे ही कूदा, गरम गड्ढे में जा गिरा, उसका पेट आग में जल कर फट गया और बच्चे पेट से उछल कर माँ के पास आ गये।

उसके बाद वे सभी बहुत समय तक आराम से जीवन-यापन करते रहे, धीरे-धीरे वे समझदार हो गये और पुरानी आप बीती को भी भूल गये।

अनुवाद: अरविंद कुमार
पीएचडी शोधार्थी, रूसी भाषा केंद्र
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
नई दिल्ली, 110067

* यह जानवरों पर आधारित रूसी लोककथा मूल रूप से रूसी भाषा से अनुवाद की गयी है। ‘भेड़िया और बकरी' लोककथा मूल रूप से रूसी भाषा में प्रसिद्ध लोक-कथाकार अलेक्जेंडर निकोलाएविच अफ़ानसेव (1826-1871) ने लिखी है। अलेक्जेंडर निकोलाएविच अफ़ानसेव को रूस के जर्मन लोक-कथाकार ‘ग्रीम भाइयों' से तुलना की जाती है। अलेक्जेंडर निकोलाएविच अफ़ानसेव रूसी स्लाविस्त और नृवंशविज्ञानशास्री हैं और 600 से भी ज्यादा लोककथाओं को पूरे रूस से संगृहीत किया ओर 8 संस्करणों में प्रकाशित किया।

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