कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति है। - हजारी प्रसाद द्विवेदी।

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माँ का संवाद – लोरी (विविध)

Author: इलाश्री जायसवाल

माँ बनना स्वयं में एक आनन्ददायी व संपूर्ण अनुभव है। यह प्रक्रिया तभी से आरंभ हो जाती है जब एक स्त्री गर्भ धारण करती है। गर्भ धारण करने से लेकर शिशु के जन्म तक स्त्री शिशु से अनेक प्रकार से संवाद करती है फिर चाहे वह संवाद उसकी भावनाओं का हो या पेट पर हाथ फेरकर सहलाने का हो। शिशु समस्त भावों को समझता है तभी तो गर्भवती स्त्रियों को अच्छा संगीत सुनने, अच्छी पुस्तकें पढ़ने अथवा अच्छा सोचने के लिए कहा जाता है।

शिशु जन्म के बाद से माता-शिशु के मध्य एक नैसर्गिक प्रेम तथा आकर्षण होता ही है लेकिन फिर भी न केवल माताएं वरन परिवार के अन्य सदस्य भी यथासंभव शिशु से वार्तालाप जन्म के साथ ही करना शुरू कर देते हैं। जिसे सुनकर शिशु मन आनंदित हो उठता है। यह वार्तालाप अलग-अलग रूपों में चलता ही रहता है। शिशु के जागने से लेकर सोने तक के मध्य में जितनी भी क्रियाएं होती हैं, इन सब में होने वाला संवाद अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसा ही एक संवाद है शिशु के सोने के समय पर किया जाने वाला संवाद जिसे हम साधारण भाषा में लोरी कहते हैं।

संपूर्ण विश्व में स्त्रियाँ ही नहीं बल्कि समस्त प्राणी अपने बच्चों को मधुर लय और धुन में कुछ वात्सल्यपूर्ण शब्द अपनी-अपनी भाषा में उच्चरित करते हैं। इन प्राणियों में समस्त पशु-पक्षी भी शामिल हैं। पशु-पक्षियों की ‘में-में,चूं-चूं,ची-ची,टी-टी,कीं-कीं' आदि इसी श्रेणी में आते हैं।

माताओं द्वारा शिशुओं को भांति-भांति की आवाज़ें बनाकर सुनाई जाने वाले सार्थक-निरर्थक गीतों को न जाने कब से लोरियों के रूप में माना जा रहा है, यह अभी तक अज्ञात ही है लेकिन कवियों ने जरूर इस विधा को साहित्य में समाहित कर लिया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हमें तुलसीदास और सूरदास की कृतियों में देखने को मिलता है। सूरदास जैसा बाल-वर्णन अब तक न किसी ने किया है और न ही भविष्य में कोई कर पाएगा। तुलसीदास भी श्रीराम के बाल रूप की मोहक छवि से स्वयं को बचा नहीं पाए। माताओं की चिंता का सबसे बड़ा विषय होता है- उनके शिशु का खाना तथा सोना। शिशुओं के सोने के समय को लेकर तो वे कहीं भी किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करती।

लोरियों का विषय कुछ भी हो सकता हैं। माँ की कल्पना अनन्त है, वह अपने भावों में शिशु को सात समंदर पार भी ले जाती है तो कभी परियों के देश, कभी राजा-रानी होते हैं तो कभी हाथी-घोड़े इत्यादि। वह अपने शिशु की तुलना कभी चन्द्रमा से करती है, तो कभी कमल से।

भक्त तुलसीदास द्वारा रचित एक लोरी देखिए, जिसमें माता कौशल्या प्रभु श्रीराम को पालने में झुलाते हुए कहतीं हैं कि राम के कर (हाथ), पाद (पैर ) एवं मुख को देखकर भ्रमर को कमल का भुलावा हो जाता है-

पौढिए लालन पालने हौं झुलावौं
कर, पद मुख लख कमल लसत सजि लोचन भंवर भुलावौं ।

तुलसीदास द्वारा रचित एक और उदाहरण भी दृष्टव्य है-
देवी आंखिन में बैठावो
सोवे मेरो राम दुलारो...

सूरदास के संगीत-माधुर्य में भी कन्हैया का आनंद देखिए-

यशोदा हरि पालने झुलावै
हलरावै दुलराई मल्हावै जोई-सोई कछु गावै
कबहुंक नयन हरि मूंद लेत हैं कबहुंक अधर फरकावै।

लोरी में माताएं अपनी भावना व्यक्त करती हैं। नन्हा बालक तो कुछ भी नहीं सोचता,वह तो बस अधर फड़काता है,आँखें मिचमिचाता है और अलग-अलग तरह की भाव-भंगिमा दिखाता है। शिशु को सुलाते समय माँ कभी थपकी देती है, कभी गोदी में तो कभी बांहों में झुलाती है और धीरे-धीरे कुछ सार्थक-निरर्थक शब्द गुनगुनाती है। जैसे-

छोटी गुड़िया सो जा
लाल पलंग पे सो जा
निंदिया रानी आएगी
गुड़िया को सुलाएगी ....!

बिना शब्दों के सिर्फ लय से भी लोरी होती है-
हूं हूं आ आ ओ ओ
हूं हूं हा हा री री ....।

इन शब्दों को पढ़ते हुए, मेरा दावा है कि सबके मन में जो लोरी आई होगी, वह यही होगी -
लल्ला लल्ला लोरी,
दूध की कटोरी,
दूध में बताशा ,
मुन्ना करे तमाशा।

यह लोरी हर घर में बच्चों ने सुनी होगी, कहीं अपनी माताओं के मुख से या फिर दादी-नानी से। लोरी का नाम लेते ही ये लोरी हम सब के मन-मस्तिष्क में अनायास ही आ जाती है। इस संदर्भ में एक और प्रचलित लोरी का उदाहरण अगर न दिया गया तो वह लोरी के साथ अन्याय होगा।

चंदा मामा दूर के,
पुए पकाए बूर के,
आप खाएं थाली में,
मुन्ने को दें प्याली में,
प्याली गई टूट,
मुन्ना गया रूठ,
नई प्याली लाएंगे,
मुन्ने को मनाएंगे।

लोरी का उद्देश्य सिर्फ शिशु को सुखद अनुभूति देना होता है जिससे वह सुखमय नींद के साथ-साथ माँ की उपस्थिति और निकटता को भी महसूस कर सके।
आज का युग तो टी.वी. और इंटरनेट का युग है। नई सभ्यता, नई जीवन-शैली है। अब झूलों और पालनों का स्वरूप भी बदल गया है। आधुनिक जीवन इतना व्यस्त, त्रस्त और तनावग्रस्त है कि लोरी जैसे कोमल गीतों को गाने की मानसिकता ही नहीं है। लोरियां किसी सभ्यता को आगे बढ़ने से नहीं रोकतीं। लोरियां हर प्रकार के तनाव को झेलने की ताकत रखती हैं तथा समस्त जगत को एक सूत्र में पिरोकर रखती हैं। लोरियां ज्ञान की पाठशालाएं हैं, जहाँ से शिशु जीवन के रसरंगों की बारहखड़ी सीखकर जीवन में आगे बढ़ता है। ये लोरी-गीत प्रकृति को, पशु-पक्षियों को शिशुओं का मित्र बना देते हैं तथा उनके प्रति प्रेम सहज ही हो जाता है।

बच्चे जैसे पुरानी रचना पूरे विश्व में दूसरी कोई नहीं है। देश, काल, शिक्षा, प्रथा के अनुसार व्यस्क मनुष्यों में न जाने कितने परिवर्तन हुए हैं, लेकिन बच्चा हजारों साल पहले भी जैसा था आज भी वैसा ही है। अपने जन्म के सबसे पहले दिन वह जैसा नया था, जैसा सुकुमार था, जैसा भोला था, जैसा मीठा था आज भी वैसा ही है क्योंकि वह प्रकृति की सृष्टि है। इसी प्रकार लोरी भी माँ के मन में स्वत: ही जन्म लेती है। लोरी में जो रस है, वात्सल्य है, गेयात्मकता है मधुरता है, आनंद है वह किसी शास्त्र में नहीं मिलेगी क्योंकि वह माँ के कोमल मन से उपजती है। भले ही आज की माताएं व्यस्त हैं शाब्दिक लोरी नहीं गाती किन्तु आज भी जब शिशुओं की नींद नहीं आती तो उनके मुख से कुछ अस्फुट ध्वनियाँ, आरोह-अवरोह अवश्य ही निकलते हैं जोकि उनका नींद का आह्वान है तथा शिशु के साथ कोमल संवेगात्मक एकालाप ही उनका संवाद है, उनकी लोरी है।

- इलाश्री जायसवाल (हिंदी अध्यापिका)
91, हारमनी अपार्टमेंट
C-58/16, सेक्टर-62
नोएडा 201301
ई-मेल: ila_shri@yahoo.कॉम

लेखिका इलाश्री जायसवाल - हिंदी अध्यापिका, एम.ए. (हिंदी-गोल्ड मेडलिस्ट), अध्यापन का लगभग 15 वर्षों का अनुभव, आकाशवाणी रामपुर से कई वार्ताएं प्रसारित, आकाशवाणी कुरुक्षेत्र में लाइव कार्यक्रम-संचालिका, कई कविताएँ, लेख आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

 

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