राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

Find Us On:

English Hindi

तुम बेटी हो (काव्य)

 

Author: राधा सक्सेना

तुम मेरी बेटी जैसी हो, ये कहना बहुत आसान है
इन शब्दों का लेकिन अब यहां, कौन रखता मान है!
इसी एक झूठे भ्रम में खुश हो लेती है वो नादान है
कहने में क्या, कहते तो सभी बेटी को वरदान है।
कहने और करने में, फर्क बहुत बड़ा होता है
बेटियों को भार न समझना मुश्किल जरा होता है।
इस दुनिया में लोगों का, दिल कहां बड़ा होता है!
भेड़िया इंसान के रूप में हर मोड़ पर खड़ा होता है।
नन्ही सी जान के दुश्मन को कौन कहेगा इंसान है!
गर्भ से लेकर जवानी तक उस पर लटक रही तलवार है
प्यार बांटने वाली बेटी को क्यों नहीं मिलता प्यार है!
उसकी हर एक बात पर उठते हर रोज यहां सवाल है
न जाने कब जागेगी दुनिया सुनके उसकी चीख पुकार है।
उसकी इस व्यथा वेदना का कब होगा स्थाई समाधान है!
जो कोख में नहीं मरती वो हर रोज यहां मरती है
अपने अरमानों के संग हरपल थोड़ा-थोड़ा बिखरती है।
सुरक्षा की कसम खाके भी हम रक्षा नहीं कर पाते हैं
उसके हक के लिए बस खोखले नारे ही लगाते हैं
'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का चलता हर रोज अभियान है।

- राधा सक्सेना, इंदौर, भारत
  ई-मेल: suskha22sep@gmail.com

Back

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश