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सरफ़रोशी की तमन्ना  (काव्य) 
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Author:पं० रामप्रसाद बिस्मिल

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-कातिल में है॥

राहरवे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में ।
लज्जते सहरा नवरदी दूरिये मंहिल में है॥

वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आस्मां।
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है॥

आके मकतल में यह कातिल कह रहा है बार बार।
क्या तम्नाये शहादत भी किसी के दिल में है॥

एक से करता नहीं क्यों दूसरा कुछ बातचीत।
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है॥

ए शहीदे मुल्क मिल्लत तेरे कदमों पर निसार।
तेरी कुर्बानी का चर्चा गैर की महफ़िल में है॥

अब न अगले वल्वले हैं और न अरमानों की भीड़।
एक मिट जाने की हसरत अब दिले 'बिस्मिल' में है॥

-पं० राम प्रसाद 'बिस्मिल'

 

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