वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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रेल | बाल कविता (बाल-साहित्य ) 
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Author:हरिवंशराय बच्चन

आओ हम सब खेलें खेल

एक दूसरे के पीछे हो

लम्बी एक बनायें रेल ।


जो है सबसे मोटा-काला

वही बनेगा इंजनवाला;

सबसे आगे जायेगा,

सबको वही चलायेगा ।


एक दूसरे के पीछे हो

डिब्बे बाक़ी बन जायें,

चलें एक सीधी लाइन में

झुकें नहीं दायें, बायें ।


सबसे छोटा सबसे पीछे

गार्ड बनाया जायेगा,

हरी चलाने को, रुकने को

झण्डी लाल दिखायेगा ।


जब इंजनवाला सीटी दे

सब को पाँव बढ़ाना है,

सबको अपने मुँह से 'छुक-छुक

छुक-छुक' करते जाना है ।


-हरिवंशराय बच्चन

[नीली चिड़िया - बच्चन रचनावली से]

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