मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। - माधवराव सप्रे।
सिंह को जीवित करने वाले  (बाल-साहित्य )  Click to print this content  
Author:विष्णु शर्मा

किसी शहर में चार मित्र रहते थे। वे हमेशा एक साथ रहते थे। उनमें से तीन बहुत ज्ञानी थे। चौथा दोस्त इतना ज्ञानी नहीं था फिर भी वह दुनियादारी की बातें बहुत अच्छी तरह जानता था।

एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि वे दूर देश घूम-घूमकर देखेंगे और कुछ दौलत कमाकर लाएंगे। वे चारों एक साथ निकल पड़े। जल्दी ही वे एक घने जंगल में पहुँचे। रास्ते में उन्होंने किसी जानवर की हड्डियाँ ज़मीन पर खड़ी देखीं। एक ज्ञानी बोला, ‘‘हमें अपना ज्ञान परखने का मौका मिला है।’’

"ये हड्डियाँ किसी मरे हुए जानवर की हैं। मैं उसे फिर से जिन्दा कर दूँगा। मुझे पता है कि इन हड्डियों को कैसे जोड़ा जा सकता है।’’

दूसके मित्र ने कहा। ‘‘मैं इस जानवर पर माँस, खून और खाल चढ़ा दूँगा।’’

तीसरे मित्र ने कहा, ‘‘मैं अपने अमूल्य ज्ञान से इस जानवर को जिन्दा कर दूँगा।’’

अब तक पहले वाले ज्ञानी युवक ने उस जानवर की हड्डियाँ लगा दी थीं और दूसरे मित्र ने उस पर माँस, खून और खाल चढ़ा दी थी।

चौथा युवक चिल्लाया, ‘‘अरे ! अरे ! उस जानवर में प्राण नहीं डालना यह एक सिंह है !’’

परन्तु ज्ञानी मित्रों ने उसकी बात नहीं सुनी। उन्होंने सिंह को जिन्दा करने का निश्चय कर लिया था। दुनियादारी जाननेवाला मित्र झट से पास के एक पेड़ पर चढ़ गया और देखने लगा। तीसरे मित्र ने सिंह में जान डाल दी। जैसे ही सिंह जिन्दा हुआ वह गुर्राने लगा और तुरन्त ही तीनों मित्रों पर टूट पड़ा। उन तीनों मित्रों को दबोचकर मार डाला। चौथा मित्र अपने मित्रों की मृत्यु देख बहुत दुखी हुआ।

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