हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

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संगीतकार गुलजार को दादा साहेब फालके पुरस्कार  (विविध) 
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Author:भारत दर्शन संकलन

प्रसिद्ध गीतकार, निर्देशक, पटकथा लेखक, निर्माता और कवि गुलजार को वर्ष 2013 के लिए दादा साहेब फालके पुरस्कार दिया गया है।
भारत में फिल्मी हस्तियों को दिया जाने वाला यह सर्वोच्च सम्मान है।

गुलजार, 'तुझसे नाराज नहीं जिंदगी' और 'तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा नहीं' जैसे प्रसिद्ध गीतों के रचनाकार हैं। यह पुरस्कार भारत सरकार भारतीय सिनेमा की वृद्धि और विकास में असाधारण योगदान के लिए देती है। पुरस्कार में स्वर्ण कमल, 10 लाख रुपये नकद और शॉल प्रदान किया जाता है। सरकार की ओर से गठित जाने-माने लोगों की समिति की सिफारिश पर पुरस्कार के लिए चयन किया जाता है। गहन विचार-विमर्श के बाद सर्वसम्मति से इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए गुलजार की सिफारिश की गई थी।

गुलजार को साहित्य में योगदान के लिए 2002 में साहित्य अकादमी पुरस्कार प्रदान किया जा चुका है व 2004 में पद्म भूषण, 2009 में फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर के गीत 'जय हो' के लिए सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत का ऑस्कर और वर्ष 2010 में ग्रैमी पुरस्कार भी प्राप्त कर चुके हैं। अनेक राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के सहित 20 फिल्म फेयर पुरस्कार भी आपके नाम हैं।

गुलजार ने 1956 से अपना फिल्मी जीवन आरम्भ किया। गीतकार के रूप में उन्हें सबसे पहले बिमल राय की फिल्म बंदिनी में काम मिला।  आपने सचिन देव बर्मन, सलिल चौधरी, शंकर जयकिशन, हेमंत कुमार, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल, मदन मोहन, राजेश रौशन, अनु मलिक और शंकर अहसान लॉय सहित अग्रणी संगीतकारों के साथ काम किया है। राहुल देव बर्मन, ए आर रहमान और विशाल भारद्वाज के साथ आपकी खूब जमी। गुलजार ने अनेक फिल्मों में पटकथा लेखक, लेखक और संवाद लेखक का भी काम किया। मेरे अपने, कोशिश, आंधी, किनारा, खुशबू, अंगूर, लिबास, मीरा, लेकिन और माचिस जैसी अनेक फिल्मों में उन्हें खूब सराहना मिली।

 

विभाजन पूर्व पंजाब प्रांत (अब पाकिस्तान में) में 1934 में जन्मे गुलजार का नाम संपूर्ण सिंह कालरा है। उनका परिवार विभाजन की त्रासदी के बाद अमृतसर आ गया लेकिन गुलजार मुंबई आ गए। एक गैराज में मैकेनिक के तौर पर काम करने लगे। खाली वक्त में वह कविताएं लिखते थे। आपके तीन कविता संग्रह 'चांद पुखराज का', 'रात पश्मीने की' , 'पंद्रह पांच पचहत्तर' और दो लघु कथाएं 'रावी पार' और 'धुंआ' प्रकाशित हो चुकी हैं।


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