हिंदुस्तान की भाषा हिंदी है और उसका दृश्यरूप या उसकी लिपि सर्वगुणकारी नागरी ही है। - गोपाललाल खत्री।

Find Us On:

English Hindi
Loading
सुभाषचन्द्र - गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' की कविता (विविध) 
Click to print this content  
Author:भारत-दर्शन संकलन

तूफान जुल्मों जब्र का सर से गुज़र लिया
कि शक्ति-भक्ति और अमरता का बर लिया ।
खादिम लिया न साथ कोई हमसफर लिया,
परवा न की किसी की हथेली पर सर लिया ।
आया न फिर क़फ़स में चमन से निकल गया ।
दिल में वतन बसा के वतन से निकल गया ।।

बाहर निकल के देश के घर-घर में बस गया;
जीवट-सा हर जबाने-दिलावर में बस गया ।
ताक़त में दिल की तेग़ से जौर में बस गया;
सेवक में बस गया कभी अफसर में बस गया ।
आजाद हिन्द फौज का वह संगठन किया ।
जादू से अपने क़ाबू में हर एक मन किया ।।

ग़ुर्बत में सारे शाही के सामान मिल गये,
लाखों जवान होने को कुर्बान मिल गये ।
सुग्रीव मिल गये कहीं हनुमान् मिल गये
अंगद का पाँव बन गये मैदान मिल गये '
कलियुग में लाये राम-सा त्राता सुभाषचन्द्र ।
आजाद हिन्द फौज के नेता सुभाषचन्द्र ।।

हालांकि! आप गुम हैं मगर दिल में आप हैं
हर शख़्स की जुबान पै महफिल में आप हैं ।
ईश्वर ही जाने कौन-सी मन्जिल में आप हैं,
मँझधार में हैं या किसी साहिल में आप हैं ।
कहता है कोई, अपनी समस्या में लीन हैं ।
कुछ' कह रहे हैं, आप तपस्या में लीन हैं ।।

आजाद होके पहुँचे हैं सरदार आपके,
शैदा वतन के शेरे-बबर यार आपके,
बन्दे बने हैं काफिरो-दीदार आपके,
गुण गाते देश-देश में अखबार आपके ।।
है इन्तजार आप मिलें, पर खुले हुए ।
आँखों की तरह दिल्ली के हैं दर खुले हुए ।।


- गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही'

#
Poem Subhashchandra by Gaya Prasad Shukla Snehi

सुभाषचन्द्र - गयाप्रसाद शुक्ल सनेही की कविता

Previous Page  |  Index Page  |   Next Page

Comment using facebook

 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश