अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी, न कि उर्दू। -रामचंद्र शुक्ल

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एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी (विविध) 
   
Author:क्षितिज ब्यूरो

महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी मुंबई द्वारा हिंदी आंदोलन परिवार, पुणे के सहयोग से 6 जनवरी को पुणे में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में संपन्न हुई। संगोष्ठी का विषय ‘हिंदी साहित्य का आम आदमी पर प्रभाव' था। इसकी अध्यक्षता मूर्धन्य भाषाविद डॉ. रामजी तिवारी ने की। प्रसिद्ध कथाकार डॉ. सूर्यबाला मुख्य अतिथि थीं।

अध्यक्षीय वक्तव्य में डॉ. तिवारी ने कहा कि ‘जो धारण करने योग्य है, वही धर्म है। यही कारण है कि काल और परिस्थिति अनुसार धार्मिक कथाओं और आख्यानों के संदर्भ बदलते जाते हैं। वाल्मीकि रामायण से लेकर तुलसीदास रचित रामचरितमानस तक पहुँचते हुए अनेक घटनाओं के संदर्भ बदल चुके थे। अत: धार्मिक साहित्य को युगानुकूल चेतना से सकारात्मक भाव से ग्रहण करना चाहिए।' डॉ. सूर्यबाला ने लोकसाहित्य के महत्व की विशद व्याख्या की। उन्होंने कहा कि लोकसाहित्य, लोकजीवन की सूक्ष्मतम अनुभूतियों को प्रकट करता है। लोकसाहित्य के लुप्त होने की आशंका जताते हुए उन्होंने आह्वान किया कि अकादमी भविष्य की पीढ़ी के लिए लोकसाहित्य का संकलन तैयार करे। अकादमी के सदस्य अभिमन्यु शितोले ने इस प्रस्ताव पर सहमति जताते हुए इस दिशा में काम करने का आश्वासन दिया।

संगोष्ठी के संयोजक और अकादमी के सदस्य संजय भारद्वाज ने अपनी प्रस्तावना में कहा कि साहित्य अर्थात ‘स' हित। यह ‘स' समाज की इकाई याने आम आदमी है। साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। जो कुछ समाज में घटता है, दिखता है, साहित्यकार उसे ही रचता और लिखता है। भारतीय भाषाओं के विशेषकर हिंदी के साहित्यकारों ने साहित्य को जन सामान्य से जोड़ने और समाज का दर्पण बनाने में महति भूमिका निभाई है। संभवत: यह पहला आयोजन है जिसमें श्रोताओं से सीधे संवाद कर साहित्य के आम आदमी पर प्रभाव की पड़ताल साहित्यकारों की उपस्थिति में की जा रही है।

इस संगोष्ठी को आशातीत सफलता मिली। विद्वजनो के सारगर्भित वक्तव्यों ने श्रोताओं पर गहरा प्रभाव डाला। श्रोताओं सहभागिता ने आयोजन को अनुसंधानपरक और सर्वसमावेशक स्वरूप दिया।

ज्ञानपीठ विजेता रचनाकारों की रचनाओं पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम ‘सहितस्य भाव: साहित्यम्‘ ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसका लेखन-निर्देशन संजय भारद्वाज का था। उनके साथ ॠता सिंह, आशीष त्रिपाठी और अमृतराज ने वाचन में भाग लिया।

उल्लेखनीय संख्या में साहित्यकारों, भाषाविदों और हिंदी प्रेमियों की उपस्थिति तथा अनुशासित प्रबंधन ने आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान की।

संचालन सुधा भारद्वाज ने किया।

[ क्षितिज ब्यूरो की रपट ]

 

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