समाज और राष्ट्र की भावनाओं को परिमार्जित करने वाला साहित्य ही सच्चा साहित्य है। - जनार्दनप्रसाद झा 'द्विज'।

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मोटा लाला (बाल-साहित्य ) 
   
Author:नमित कालरा

मोटा लाला, मोटा लाला
आ गए अपना पेट फुला कर
जब देखो तुम खाते रहते
बर्गर, समोसा मज़े ले-ले कर।

खाओ उतना जितनी भूख
छोड़ कर के 'जंक फ़ूड'।
हरी सब्ज़ी और दालों से
सदा रहोगे मस्त और स्वस्थI

-नमित कालरा (कक्षा 4), भारत
 ई-मेल: namitkalra2011@gmail.com

 

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