हिंदी का काम देश का काम है, समूचे राष्ट्र निर्माण का प्रश्न है। - बाबूराम सक्सेना

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संस्मरण

संस्मरण - Reminiscence

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गांधी का हिंदी प्रेम - भारत-दर्शन संकलन | Collections

महात्मा गांधी की मातृभाषा यद्यपि गुजराती थी तथापि वे भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम में जनसंपर्क हेतु हिन्दी को ही सर्वाधिक उपयुक्त भाषा मानते थे।

 
सुभाषबाबू का हिन्दी प्रेम - भारत-दर्शन संकलन | Collections

सुभाषबाबू हिन्दी पढ़ लिख सकते थे, बोल सकते थे मगर वह इसमें बराबर हिचकते और कमी महसूस करते थे। वह चाहते थे कि हिन्दी में वह हिन्दी भाषी लोगों की तरह ही सब काम कर सकें।

एक दिन उन्होंने अपने उदगार प्रकट करते हुए कहा, "यदि देश में जनता के साथ राजनीति करनी है, तो उसका माध्यम हिन्दी ही हो सकती है। बंगाल के बाहर मैं जनता में जाऊं तो किस भाषा में बोलूं? इसलिए कांग्रेस का सभापति बनकर मैं हिन्दी खूब अच्छी तरह न जानू तो काम नहीं चलेगा। मुझे एक  मास्टर दीजिए, जो मेरे साथ रहे और मेरा हिन्दी का सारा काम कर दे। इसके साथ ही जब मैं चाहूं और मुझे समय मिले तब मैं उससे हिन्दी सीखता रहूं।"

श्री जगदीशनारायण तिवारी को, जो मूक कांग्रेस कर्मी थे और हिन्दी के अच्छे शिक्षक थे, सुभाषबाबू के साथ रखा गया। हरिपुरा कांग्रेस में तथा सभापति के दौरे के समय वह बराबर सुभाषबाबू के साथ रहे। सुभाषबाबू ने बड़ी लगन से हिन्दी सीखी और वह सचमुच बहुत अच्छी हिन्दी लिखने, पढ़ने और बोलने लगे।

'आजाद हिंद फौज' का काम और सुभाषबाबू के वक्तव्य प्राय: हिन्दी में होते थे। नेताजी भविष्यदृष्टा थे और भलीभांति जानते थे कि जिस देश की अपनी राष्ट्रभाषा नहीं होती, वह खड़ा नहीं रह सकता।

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साभार - बड़ों की बड़ी बात
पुन: संपादन - भारत-दर्शन

 
मेरे व्यंग्य लेखन की राह बदलने वाले - प्रेम जनमेजय

उस उम्र में ‘आयुबाध्य' प्रेम के साथ-साथ मुबईया फिल्मों का प्रेम भी संग-संग पींग बढ़ाता था। पता नहीं कि फिल्मों के कारण मन में प्रेम का अंकुर फूटता था या मन में प्रेम के फूटे अंकुर के कारण हिंदी फिल्मों के प्रति एकतरफा प्रेम जागता था। या दोनो तरफ की आग बराबर होती थी। पर कुछ भी हो फिल्मो ने बॉम्बे के प्रति बेहद आकर्षण जगा दिया। हिंदी फिल्मों ने मेरे बॉम्बे ज्ञान में आकार्षणात्मक वृद्धि की। ये वृदिृध ज्यो ज्यों बूड़े श्याम रंग जैसी थी। चौपाटी जुहू के समुद्र और ऊंची इमारतों ने आकर्षण बढ़ाना आरम्भ कर दिया। दिल्ली में तो मैं एक ही ऊंची इमारत को जानता था और उसे देखा था--कुतुब मीनार। दिल्ली की सरकारी कर्मचारियों की कालोनी रामकृष्ण पुरम में पहली बार मनोरंजन के साधन, टी वी से आंखें चार हुईं।कम्युनिटी सेंटर में दूरदर्शन का चित्रहार और फि़ल्में देखते हुए बाली उमरिया अंगड़ाई लेने लगी। तब एटलस से निकलकर फिल्मी ज्ञान के माध्यम से मुम्बई के विशाल समुद्र और ऊंची इमारतों को देख जाना। न न न फिल्मों का भूत ऐसा नहीं था कि हीरो बनने के लिए बॉम्बे की रेलगाड़ी में चढ़ा देता और स्ट्रगल कराता। पर हां ऐसा अवश्य था कि प्रेमिका के साथ-साथ बॉम्बे का समुद्र और ऊंची अट्टालिकाएं भी सपनों का हिस्सा बनें।