राष्ट्रीय एकता की कड़ी हिंदी ही जोड़ सकती है। - बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

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क्षणिकाएं

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राजेश ’ललित’ की दो क्षणिकाएँ  - राजेश ’ललित’

ख़्वाब

थे हमारे भी !
कुछ ख़्वाब,
पर नींद नहीं आई;
पलकों से बाहर ही
रहे ख़्वाब !
मचलते हुए
जाना है हमको भी
पलकों के पीछे।

 

 

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