साहित्य की उन्नति के लिए सभाओं और पुस्तकालयों की अत्यंत आवश्यकता है। - महामहो. पं. सकलनारायण शर्मा।

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मातृ-मन्दिर

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt

भारतमाता का यह मन्दिर, समता का संवाद यहाँ,
सबका शिव-कल्याण यहाँ है, पावें सभी प्रसाद यहाँ।
नहीं चाहिये बुद्धि वैरकी, भला प्रेम-उन्माद यहाँ,
कोटि-कोटि कण्ठों से मिलकर,उठे एक जयनाद यहाँ ।
जाति,धर्म या सम्प्रदाय का, नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
सबका स्वागत सबका आदर, सबका सम-सम्मान यहाँ।
राम-रहीम, बुद्ध-ईसा का, सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
भिन्न-भिन्न भव-संस्कृतियों के गुण-गोख का ज्ञान यहाँ ।
सब तीर्थो का एकतीर्थ यह, हृदय पवित्र बना लें हम,
आओ यहाँ अजातशत्रु बन, सबको मित्र बना लें हम।
रेखाएं प्रस्तुत हैं अपने, मन के चित्र बना लें हम,
सौ-सौ आदर्शों को लेकर, एक चरित्र बना लें हम।
मिला सत्य का हमें पुजारी, सफल काम उस न्यायी का,
मुक्तिलाभ कर्तव्य यहाँ है, एक-एक अनुयायी का ।
बैठो माता के आँगन में, नाता भाई-भाई का,
समझे उसकी प्रसव वेदना, वही लाल है माई का।

- मैथिलीशरण गुप्त

 

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