भारतेंदु और द्विवेदी ने हिंदी की जड़ पाताल तक पहुँचा दी है; उसे उखाड़ने का जो दुस्साहस करेगा वह निश्चय ही भूकंपध्वस्त होगा।' - शिवपूजन सहाय।

Find Us On:

English Hindi

स्वप्न सब राख की...

 (काव्य) 
 
रचनाकार:

 उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

स्वप्न सब राख की ढेरियाँ हो गए,
कुछ जले, कुछ बुझे, फिर धुआँ हो गए।  

पेट की भूख से आग ऐसी लगी,
जल के आदर्श सब रोटियाँ हो गए।  

जब से चाणक्य महलों में रहने लगा,
मूल्य जीवन के बस कुर्सियाँ हो गए। 

लोग जो मुंह दिखाने के काबिल न थे,
आज अख़बार की सुर्खियाँ  हो गए।  

धन सफलता की जबसे कसौटी बना,
कल जो कोठे थे अब कोठियाँ  हो गए। 

जब सिफ़ारिश से सम्मान मिलने लगा, 
मूल्य प्रतिभा के दो कौड़ियाँ  हो गए। 

जो पतन के थे साधन सभी कल तलक,
आज वे प्रगति की सीढ़ियाँ  हो गए। 

जिनके सिद्धांत लोहे की दीवार थे,
आज वे मोम की मूर्तियाँ  हो गए। 

योग्यता जब पुरस्कृत नहीं हो सकी,
काव्य कुंठा की परछाइयाँ हो गए। 

वक्त ने 'हंस' को घाव जितने दिए,
वे ग़ज़ल-गीत की पंक्तियां हो गए।

- उदयभानु 'हंस', राजकवि हरियाणा
साभार-दर्द की बांसुरी [ग़ज़ल संग्रह]

 

Back

 

Comment using facebook

 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश