मनुष्य सदा अपनी भातृभाषा में ही विचार करता है। - मुकुन्दस्वरूप वर्मा।

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बोध कथाएं

बोध-कथाओं में कोई न कोई नैतिक शिक्षा अवश्य निहित रहती है और आप एक क्षण के लिए सोचने को बाध्य हो जाते हैं। यहाँ हम भारत-दर्शन के पाठकों के लिए बोध कथाएं संकलित कर रहे हैं। इन छोटी-छोटी कथा-कहानियों में परबत-सी ऊंची बातें और सागर-सी गहनता होती है निसंदेह यह कथाएं आपको पठनीय व रुचिकर लगेंगी। नैतिक सीख देती, बोध कथाओं का यह संकलन आपको भेंट।

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तीन चींटियाँ  - खलील जिब्रान

एक व्यक्ति धूप में गहरी नींद में सो रहा था। तीन चीटियाँ उसकी नाक पर आकर इकट्ठी हुईं। तीनों ने अपनी प्रथा अनुसार एक दूसरे का अभिवादन किया और फिर वार्तालाप करने लगीं।

 
स्वर किसका? - डॉ प्रेम नारायण टंडन

ईश्वर की खोज करते-करते हारकर जीव ने कहा - बड़ी मूर्खता की मैंने जो उस निराकार को पाने की आशा से अब तक भटकता फिरा ।

 

 

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