राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार।

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हिंदी और राष्ट्रीय एकता - सुभाषचन्द्र बोस

यह काम बड़ा दूरदर्शितापूर्ण है और इसका परिणाम बहुत दूर आगे चल कर निकलेगा। प्रांतीय ईर्ष्या-द्वेश को दूर करने में जितनी सहायता हमें हिंदी-प्रचार से मिलेगी, उतनी दूसरी किसी चीज़ से नहीं मिल सकती। अपनी प्रांतीय भाषाओं की भरपूर उन्नति कीजिए। उसमें कोई बाधा नहीं डालना चाहता और न हम किसी की बाधा को सहन ही कर सकते हैं; पर सारे प्रांतो की सार्वजनिक भाषा का पद हिंदी या हिंदुस्तानी ही को मिला। नेहरू-रिपोर्ट में भी इसी की सिफारिश की गई है। यदि हम लोगों ने तन मन से प्रयत्न किया, तो वह दिन दूर नहीं है, जब भारत स्वाधीन होगा और उसकी राष्ट्रभाषा होगी हिंदी।

 
डॉ गोविंदप्पा वेंकटस्वामी - रोहित कुमार 'हैप्पी'

जीवन परिचय 

डॉ गोविंदप्पा वेंकटस्वामी (Dr Govindappa Venkataswamy) को स्नेह से लोग "डॉ वी" के नाम से पुकारते हैं। डॉ गोविंदप्पा वेंकटस्वामी ने लाखों लोगों की शल्य चिकित्सा की हैं और लाखों को आँखों की रोशनी दी है।

 
हिन्दी भाषा की समृद्धता - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra

यदि हिन्दी अदालती भाषा हो जाए, तो सम्मन पढ़वाने के लिए दो-चार आने कौन देगा, और साधारण-सी अर्जी लिखवाने के लिए कोई रुपया-आठ आने क्यों देगा। तब पढ़ने वाले को यह अवसर कहाँ मिलेगा कि गवाही के सम्मन को गिरफ्तारी का वारण्ट बता दें।

 
अगली सदी का शोधपत्र - सूर्यबाला | Suryabala

एक समय की बात है, हिन्दुस्तान में एक भाषा हुआ करे थी। उसका नाम था हिंदी। हिन्दुस्तान के लोग उस भाषा को दिलोजान से प्यार करते थे। बहुत सँभालकर रखते थे। कभी भूलकर भी उसका इस्तेमाल बोलचाल या लिखने-पढ़ने में नहीं करते थे। सिर्फ कुछ विशेष अवसरों पर ही वह लिखी-पढ़ी या बोली जाती थी। यहाँ तक कि साल में एक दिन, हफ्ता या पखवारा तय कर दिया जाता था। अपनी-अपनी फुरसत के हिसाब से और सबको खबर कर दी जाती थी कि इस दिन इतने बजकर इतने मिनट पर हिंदी पढ़ी-बोली और सुनी-समझी (?) जाएगी। निश्चित दिन, निश्चित समय पर बड़े सम्मान से हिंदी झाड़-पोंछकर तहखाने से निकाली जाती थी और सबको बोलकर सुनाई जाती थी।

 
हिंदी के बारे में कुछ तथ्य - रोहित कुमार 'हैप्पी'
  • सरहपाद को अपभ्रंश का पहला आदि कवि कहा जा सकता है। खुसरो से कहीं पहले सरहपाद का अस्तित्व सामने आता है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार अपभ्रंश की पहली कृति 'सरह के दोहों' के रूप में उपलब्ध है। [ राहुल सांकृत्यायन कृत दोहा-कोश से]
  • 1283 खुसरो की पहेली व मुकरी प्रकाश में आईं जो आज भी प्रचलित हैं।
  • हिंदी की पहली ग़ज़ल संभवत: कबीर की ग़ज़ल है।
  • 1805 में लल्लू लाल की हिंदी पुस्तक 'प्रेम सागर' फोर्ट विलियम कॉलेज, कोलकाता के लिए पहली हिंदी प्रकाशित पुस्तक थी।
  • हिन्दी का पहला साप्ताहिक समाचारपत्र उदन्त मार्तण्ड पं जुगलकिशोर शुक्ल के संपादन में मई 1926 में कोलकाता से आरम्भ हुआ था।
  • पं० जामनराव पेठे को राष्ट्रभाषा का प्रस्ताव उठाने वाला पहला व्यक्ति कहा जाता है। उन्होंने सबसे पहले भारत की कोई राष्ट्रभाषा हो के मुद्दे को उठाया। 'भारतमित्र' का इस विषय में मतभेद था। 'भारतमित्र' ने 'बंकिम बाबू' को इसका श्रेय दिया है।
  • 1833 में गुजराती कवि नर्मद ने भारत की राष्‍ट्रभाषा के रूप में हिंदी का नाम प्रस्तावित किया ।
  • 1877 में श्रद्धाराम फुल्लौरी ने 'भाग्यवती' नामक उपन्यास रचा। फल्लौरी 'औम जय जगदीश हरे' आरती के भी रचयिता हैं।
  • 1893 में बनारस (वाराणसी) में नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना हुई ।
  • 1900 में द्विवेदी युग का आरंभ हुआ जिसमें राष्ट्र-धारा का साहित्य सामने आया।
  • 1918 में गाँधी जी ने 'दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा' की स्थापना की ।
  • 1929 में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के 'हिंदी साहित्य का इतिहास' का प्रकाशन हुआ ।
  • 1931 में हिंदी की पहली बोलती फिल्म "आलम आरा" पर्दे पर आई।
  • 1996-97 में न्यूजीलैंड से प्रकाशित हिंदी पत्रिका 'भारत-दर्शन' इंटरनेट पर विश्व का पहला हिंदी प्रकाशन है। 

        संकलन: रोहित कुमार 'हैप्पी'

 
हिन्दी का स्थान - राहुल सांकृत्यायन | Rahul Sankrityayan

प्रान्तों में हिन्दी

 
हिंदी महारानी है या नौकरानी ? - डॉ. वेदप्रताप वैदिक | Dr Ved Pratap Vaidik

आज हिंदी दिवस है। यह कौनसा दिवस है, हिंदी के महारानी बनने का या नौकरानी बनने का ? मैं तो समझता हूं कि आजादी के बाद हिंदी की हालत नौकरानी से भी बदतर हो गई है। आप हिंदी के सहारे सरकार में एक बाबू की नौकरी भी नहीं पा सकते और हिंदी जाने बिना आप देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री भी बन सकते हैं। इस पर ही मैं पूछता हूं कि हिंदी राजभाषा कैसे हो गई ? आपका राज-काज किस भाषा में चलता है ? अंग्रेजी में ! तो इसका अर्थ क्या हुआ ? हमारी सरकारें हिंदुस्तान की जनता के साथ धोखा कर रही हैं। उसकी आंख में धूल झोंक रही हैं। भारत का प्रामाणिक संविधान अंग्रेजी में हैं। भारत की सभी ऊंची अदालतों की भाषा अंग्रेजी है। सरकार की सारी नीतियां अंग्रेजी में बनती हैं। उन्हें अफसर बनाते हैं और नेता लोग मिट्टी के माधव की तरह उन पर अपने दस्तखत चिपका देते हैं। सारे सांसदों की संसद तक पहुंचने की सीढ़ियां उनकी अपनी भाषाएं होती हैं लेकिन सारे कानून अंग्रेजी में बनते हैं, जिन्हें वे खुद अच्छी तरह से नहीं समझ पाते। बेचारी जनता की परवाह किसको है ? सरकार का सारा महत्वपूर्ण काम-काज अंग्रेजी में होता है। सरकारी नौकरियों की भर्ती में अंग्रेजी अनिवार्य है। उच्च सरकारी नौकरियां पानेवालों में अंग्रेजी माध्यमवालों की भरमार है। उच्च शिक्षा का तो बेड़ा ही गर्क है। चिकित्सा, विज्ञान और गणित की बात जाने दीजिए, समाजशास्त्रीय विषयों में भी उच्च शिक्षा और शोध का माध्यम आज तक अंग्रेजी ही है। आज से 53 साल पहले मैंने अपना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का पीएच.डी. का शोधग्रंथ हिंदी में लिखने का आग्रह करके इस गुलामी की जंजीर को तोड़ दिया था लेकिन देश के सारे विश्वविद्यालय अभी भी उस जंजीर में जकड़े हुए हैं। अंग्रेजी भाषा को नहीं उसके वर्चस्व को चुनौती देना आज देश का सबसे पहला काम होना चाहिए लेकिन हिंदी दिवस के नाम पर हमारी सरकारें एक पाखंड, एक रस्म-अदायगी, एक खानापूरी हर साल कर डालती हैं। हमारे महान राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री को चार साल बाद फुर्सत मिली कि अब उन्होंने केंद्रीय हिंदी समिति की बैठक बुलाई। उसकी वेबसाइट अभी तक सिर्फ अंग्रेजी में ही है। यदि देश में कोई सच्चा नेता हो और उसकी सच्ची राष्ट्रवादी सरकार हो तो वह संविधान की धारा 343 को निकाल बाहर करे और हिंदी को राष्ट्रभाषा और अन्य भारतीय भाषाओं को राज-काज भाषाएं बनाए। ऐसा किए बिना यह देश न तो संपन्न बन सकता है, न समतामूलक, न महाशक्ति !

 
डिजिटल संसार में हिन्दी के विविध आयाम - अरविंद कुमार

आज वैश्विक हिन्दी का मतलब है सूचना प्रौद्योगिकी के युग में हिन्दी और सूचना जगत में समाई हिन्दी। एक ऐसा आभासी संसार जो ठोस है और ठोस है भी नहीँ। पल पल परिवर्तित, विकसित जानकारी से भरा जगत जो हर उस आदमी के सामने फैला है जिस के पास कंप्यूटर पर इंटरनैट कनक्शन है या जिस के हाथ में स्मार्ट टेलिफ़ोन है। यह जगत केवल हिन्दी में ही नहीँ है, इंग्लिश में है, जर्मन में है, फ़्रैंच में है, उर्दू में है, बंगला में है, गुजराती में है। मैँ अपने आप को हिन्दी तक सीमित रखूँगा। यह जो हिन्दी है अकेले हमारे अपने देश की नहीँ है, पूरे संसार की है।

 
अटल जी का ऐतिहासिक भाषण  - भारत-दर्शन संकलन

स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी का हिंदी हिन्दी प्रेम सर्वविदित है।

 
हिंदी वालों को अटल-पताका की डोर फिर थमा गया विश्व हिंदी सम्मेलन - प्रो.वीरेंद्र सिंह चौहान

तीन साल में एक बार आयोजित होने वाला हिंदी का वैश्विक मेला अर्थात विश्व हिंदी सम्मेलन बीते दिनों मॉरिशस के पाई में स्वामी विवेकानंद अंतर्राष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में संपन्न हुआ। सम्मेलन से ठीक 2 दिन पहले जाने-माने हिंदी प्रेमी और जागतिक पटल पर हिंदी के सबसे प्रभावी ध्वज वाहकों में से एक पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का महाप्रयाण हो गया था। स्वाभाविक रुप से ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन पर कवि साहित्यकार, पत्रकार व राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी के निधन की छाया प्रारंभ से अंत तक बनी रही। सम्मेलन से मेले और उल्लास का भाव तो अटल जी के परलोक गमन के चलते चला गया। मगर ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन में हिंदी को लेकर हिंदी वालों को उस डोर का छोर जरूर मिल गया जिसे थाम कर विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में प्रथम हिंदी संबोधन के साथ अटल जी ने विश्व गगन में हिंदी की गौरव ध्वजा फहरायी थी।

 
परदेश और अपने घर-आंगन में हिंदी - बृजेन्द्र श्रीवास्तव ‘उत्कर्ष’

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, "भारत के युवक और युवतियां अंग्रेजी और दुनिया की दूसरी भाषाएँ खूब पढ़ें मगर मैं हरगिज यह नहीं चाहूंगा कि कोई भी हिन्दुस्तानी अपनी मातृभाषा को भूल जाएँ या उसकी उपेक्षा करे या उसे देखकर शरमाये अथवा यह महसूस करे कि अपनी मातृभाषा के जरिए वह ऊँचे से ऊँचा चिन्तन नहीं कर सकता।" वास्तव में आज उदार हृदय से, गांधी जी के इस विचार पर चिंतन-मनन करने की आवश्यकता है। हिंदी भाषा, कुछ व्यक्तियों के मन के भावों को व्यक्त करने का माध्यम ही नहीं है बल्कि यह भारतीय संस्कृति, सभ्यता, अस्मिता, एकता-अखंडता, प्रेम-स्नेह-भक्ति और भारतीय जनमानस को अभिव्यक्त करने की भाषा है। हिंदी भाषा के अनेक शब्द वस्तुबोधक, विचार बोधक तथा भावबोधक हैं ये शब्द संस्कृति के भौतिक, वैचारिक तथा दार्शनिक-आध्यात्मिक तत्वों का परिचय देते हैं । इसीलिए कहा गया है- "भारत की आत्मा को अगर जानना है तो हिंदी सीखना अनिवार्य है ।"

 

 

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