वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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कविताएं

देश-भक्ति की कविताएं पढ़ें। अंतरजाल पर हिंदी दोहे, कविता, ग़ज़ल, गीत क्षणिकाएं व अन्य हिंदी काव्य पढ़ें। इस पृष्ठ के अंतर्गत विभिन्न हिंदी कवियों का काव्य - कविता, गीत, दोहे, हिंदी ग़ज़ल, क्षणिकाएं, हाइकू व हास्य-काव्य पढ़ें। हिंदी कवियों का काव्य संकलन आपको भेंट!

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रंग दे बसंती चोला गीत का इतिहास - रोहित कुमार 'हैप्पी'

'रंग दे बसंती चोला' अत्यंत लोकप्रिय देश-भक्ति गीत है। यह गीत किसने रचा? इसके बारे में बहुत से लोगों की जिज्ञासा है और वे समय-समय पर यह प्रश्न पूछते रहते हैं।

 
मेरे देश की आँखें  - अज्ञेय | Ajneya

नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं
पुते गालों के ऊपर
नकली भवों के नीचे
छाया प्यार के छलावे बिछाती
मुकुर से उठाई हुई
मुस्कान मुस्कुराती
ये आँखें -
नहीं, ये मेरे देश की नहीं हैं...

तनाव से झुर्रियाँ पड़ी कोरों की दरार से
शरारे छोड़ती घृणा से सिकुड़ी पुतलियाँ -
नहीं, ये मेरे देश की आँखें नहीं हैं...

वन डालियों के बीच से
चौंकी अनपहचानी
कभी झाँकती हैं
वे आँखें,
मेरे देश की आँखें,
खेतों के पार
मेड़ की लीक धारे
क्षिति-रेखा को खोजती
सूनी कभी ताकती हैं
वे आँखें...

उसने
झुकी कमर सीधी की
माथे से पसीना पोछा
डलिया हाथ से छोड़ी
और उड़ी धूल के बादल के
बीच में से झलमलाते
जाड़ों की अमावस में से
मैले चाँद-चेहरे सुकचाते
में टँकी थकी पलकें
उठायीं -
और कितने काल-सागरों के पार तैर आयीं
मेरे देश की आँखें...

 
तुलसीदास | सोहनलाल द्विवेदी की कविता  - सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi

अकबर का है कहाँ आज मरकत सिंहासन?
भौम राज्य वह, उच्च भवन, चार, वंदीजन;

 
रावण या राम - जैनन प्रसाद

रामायण के पन्नों में
रावण को देख कर,
काँप उठा मेरा मन
अपने अंतर में झाँक कर।

 
भूले स्वाद बेर के  - नागार्जुन | Nagarjuna

सीता हुई भूमिगत, सखी बनी सूपनखा
वचन बिसर गए देर के सबेर के
बन गया साहूकार लंकापति विभीषण
पा गए अभयदान शावक कुबेर के
जी उठा दसकंधर, स्तब्ध हुए मुनिगण
हावी हुआ स्वर्णमरिग कंधों पर शेर के
बुढ़भस की लीला है, काम के रहे न राम
शबरी न याद रही, भूले स्वाद बेर के

 
प्यार !  - आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

प्यार! कौन सी वस्तु प्यार है? मुझे बता दो।
किस को करता कौन प्यार है ? यही दिखा दो।।

 
मुक़ाबला - रोहित कुमार 'हैप्पी'

दमदार ने
पूरे दम से
जान लड़ा दी
मंज़िल पाने को,

 
खेल का खेल  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

हार और जीत
भोगते हैं तीनों ही - अनाड़ी, जुगाड़ी और खिलाड़ी।
अनाड़ी को हारने पर
आती है शर्म।

 
चीरहरण - जैनन प्रसाद

हँस रहे हैं आज
कई दुशासन।
द्रोपदी को निर्वस्त्र देख।
और झुके हुए हैं
गर्दन वीरों के।
सोच रहें है--
इस आधुनिक जुग में
कैसे वार करें
तीरों के।
चीखती हुई उस
अबला की पुकार
सभी को खल रहा है।
आज कृष्ण की जगह
लोगों में
दुर्योधन पल रहा है ।

 
डॉ॰ सुधेश के मुक्तक - डॉ सुधेश

प्राण का पंछी सवेरे क्यों चहकता है
शबनम बूँद से नया बिरवा लहकता है
हड्डियों के पसीने से इसे सींचा है
फूल मेरे चमन का ज़्यादा महकता है ।

 
शहीदों के प्रति  - भोलानाथ दर्दी

भइया नहीं है लाशां यह बे कफ़न तुम्हारा
है पूजने के लायक पावन बदन तुम्हारा

 
वीर सपूत - रवीन्द्र भारती | देशभक्ति कविता

गंगा बड़ी है हिमालय बड़ा है
तुम बड़े हो या धरती बड़ी है
तुम सरहदों पर रात दिन
जल रहे मशाल हो

 
हिंडोला - अजय गुप्ता

हिंडोले सा ये जीवन,
घूम रहा है, घुमा रहा है
गोल-गोल

 
पानी का रंग - सुखबीर सिंह

पानी के रंग जैसी हैं ये जिंदगी,
इसे जैसे बनाओगे वैसे ही बन जाएगी।

 
कोमल मैंदीरत्ता की दो कविताएं - कोमल मैंदीरत्ता

बारहवीं के बच्चे

 
रंग गयी ज़मीं फिर से - निशा मोहन

रंग गयी ज़मीं फिर से लाल रंग में
मिट्टी की महक और ख़ुशबू बढ़ी लहू के संग में।
बिछे थे वजूद जब भारत मां की गोद में
एक दफा तो डोला होगा उसका मन भी, सोच
कितनों की चढ़ेगी और कुर्बानी
कब इंसानियत होगी सयानी,
कब वो दिन देखना नसीब होगा!
'मैं वापिस आऊंगा,
और जल्द ही आऊंगा'
ये वादा उनका पूरा होगा।

 
सैनिक  - विश्वनाथ प्रसाद तिवारी

जीविका के लिए निकले थे
हम अपने-अपने घरों से

 
सैनिक अनुपस्थिति में छावनी - वीरेन डंगवाल

लाम पर गई है पलटन
बैरकें सूनी पड़ी हैं
निर्भ्रान्‍त और इत्‍मीनान से
सड़क पार कर रही बंदरों की एक डार

 
मृत्यु-जीवन - हरिशंकर शर्मा

फूल फबीला झूम-झूमकर डाली पर इतराता था,
सौरभ-सुधा लुटा वसुधा पर फूला नहीं समाता था,
हरी-हरी पत्तियाँ प्रेम से, स्वागत कर सुख पाती थीं,
ओस-धूप दोनों हिलमिलकर भली भाँति नहलाती थीं,

 
कैसा समय - नासिर अहमद सिकन्दर

कैसा समय आया भाई!
किस दुश्मन को नजर लगी
किस वैज्ञानिक ने गलती की
किस ऋपि ने दिया शाप
किस राजनीतिज्ञ ने
सदियों पुराने बाल की निकाली खाल
जो इतना बिगड़ा समय

 

 

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