हमारी हिंदी भाषा का साहित्य किसी भी दूसरी भारतीय भाषा से किसी अंश से कम नहीं है। - (रायबहादुर) रामरणविजय सिंह।

Find Us On:

English Hindi

लघु-कथाएं

लघु-कथा, 'गागर में सागर' भर देने वाली विधा है। लघुकथा एक साथ लघु भी है, और कथा भी। यह न लघुता को छोड़ सकती है, न कथा को ही।

Article Under This Catagory

बिल और दाना - रांगेय राघव

एक बार एक खेत में दो चींटियां घूम रही थीं। एक ने कहा, 'बहन, सत्य क्या है ?' दूसरी ने कहा ‘सत्य? बिल और दाना !'

 
मूर्ति - खलील जिब्रान

दूर पर्वत की तलहटी में एक आदमी रहता था। उसके पास प्राचीन कलाकारों की बनाई हुई एक मूर्ति थी, जो उसके द्वार पर औंधी पड़ी रहती थी। उसे उसका कोई गुण मालूम न था।

 
दूसरी दुनिया का आदमी | लघु-कथा - रोहित कुमार 'हैप्पी'

वो शक्ल सूरत से कैसा था, बताने में असमर्थ हूँ। पर हाँ, उसके हाव-भावों से ये पूर्णतया स्पष्ट था कि वो काफी उदास और चिंतित था।

 
अंगहीन धनी  - भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra

एक धनिक के घर उसके बहुत-से प्रतिष्ठित मित्र बैठे थे। नौकर बुलाने को घंटी बजी। मोहना भीतर दौड़ा, पर हँसता हुआ लौटा।

 
संतोष का पुरस्कार  - अज्ञात

आसफउद्दौला नेक बादशाह था। जो भी उसके सामने हाथ फैलाता, वह उसकी झोली भर देता था। एक दिन उसने एक फ़क़ीर को गाते सुना- जिसको न दे मौला उसे दे आसफउद्दौला। बादशाह खुश हुआ। उसने फ़क़ीर को बुलाकर एक बड़ा तरबूज दिया। फकीर ने तरबूज ले लिया, मगर वह दुखी था। उसने सोचा- तरबूज तो कहीं भी मिल जाएगा। बादशाह को कुछ मूल्यवान चीज देनी चाहिए थी।

 
रावण कौन | लघुकथा  - अमित राज ‘अमित'

वो चारों-पाँचों शराब में धूत्त होकर, सुबह से ही रावण का पुतला बनाने में व्यस्त थे। सब बराबर लगे हुए थे।

 
कुछ नहीं - आरती शर्मा

मिन्नी और मुन्ना दोनों भाई-बहन घर के दालान में खेल रहे थे। पापा भी पास में कुर्सी पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे।

 
खिचड़ी भाषा - भारत-दर्शन संकलन

एक बार एक विद्यार्थी ने पंडित नेहरू से 'आटोग्राफ ' मांगा । पंडित जी ने अंग्रेजी में हस्ताक्षर करके उसे पुस्तिका लौटा दी । फिर विद्यार्थी ने पुस्तिका पर एक शुभकामना संदेश लिखने के लिए प्रार्थना की तो चाचा नेहरू ने वह भी पूरीकर दी ।

 

 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश