जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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कहानियां

कहानियों के अंतर्गत यहां आप हिंदी की नई-पुरानी कहानियां पढ़ पाएंगे जिनमें कथाएं व लोक-कथाएं भी सम्मिलित रहेंगी। पढ़िए मुंशी प्रेमचंद, रबीन्द्रनाथ टैगोर, भीष्म साहनी, मोहन राकेश, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, फणीश्वरनाथ रेणु, सुदर्शन, कमलेश्वर, विष्णु प्रभाकर, कृष्णा सोबती, यशपाल, अज्ञेय, निराला, महादेवी वर्मालियो टोल्स्टोय की कहानियां

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खूनी - आचार्य चतुरसेन शास्त्री

उसका नाम मत पूछिये। आज दस वर्ष से उस नाम को हृदय से और उस सूरत को आँखों से दूर करने को पागल हुआ फिरता हूँ। पर वह नाम और वह सूरत सदा मेरे साथ है। मैं डरता हूँ, वह निडर है--मैं रोता हूँ--वह हँसता है--मैं मर जाऊँगा--वह अमर है।

 
होली का उपहार - मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

मैकूलाल अमरकान्त के घर शतरंज खेलने आये, तो देखा, वह कहीं बाहर जाने की तैयारी कर रहे हैं। पूछा--कहीं बाहर की तैयारी कर रहे हो क्या भाई? फुरसत हो, तो आओ, आज दो-चार बाजियाँ हो जाएँ।

 
शत्रु - अज्ञेय | Ajneya

ज्ञान को एक रात सोते समय भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिये और कहा, ‘‘ज्ञान, मैंने तुम्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर संसार में भेजा है। उठो, संसार का पुनर्निर्माण करो।''

 
सरकारी नियमानुसार  - डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

राकेश कुमार कानपुर में तीन सालों से फ़ूड सप्लाई इंस्पेक्टर के रूप में कार्यरत थे। बड़ी मेहनत के बाद नौकरी मिली थी सो नौकरी करने से अधिक नौकरी बचाने में विश्वास करते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके नौकरी सिद्धांत के अनुसार नौकरी करने की नहीं अपितु बचाने की वस्तु है। समय के पाबंद और अधिकारियों के प्रिय। बँधी - बंधाई अतिरिक्त आय की पूरी श्रृंखला से अच्छी तरह वाक़िफ़ पर किसी तरह के विरोध में दिलचस्पी नहीं। अपना हिस्सा चुपचाप ले लेते। पहली बार जब धर्मपरायण पत्नी राधिका ने टोका तो उसे समझाते हुए बोले - "देखो राधिका, इस तरह की पाप की कमाई में मुझे भी दिलचस्पी नहीं है। मैं खुद नहीं चाहता ऐसे पैसे। लेकिन क्या करूं? ऊपर से नीचे तक पूरी श्रृंखला बनी है। सब का हिस्सा निश्चित है। बिना कहे सुने सब के पास ये पैसे हर महीने पहुँच जाते हैं। सब ले लेते हैं और जो ना ले वह सब की आँख की किरकिरी बन जाता है। अधिकारी और साथी उसे परेशान करने लगते हैं। फ़र्जी मामलों में फ़साने लगते हैं। अब तुम ही कहो चुपचाप नौकरी करूं या अकेले पूरी व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ें?"

 
चूहे की कहानी - भारत-दर्शन संकलन | Collections

एक विशाल घने जंगल में एक महात्मा की कुटिया थी और उसमें एक चूहा रहा करता था। महात्मा उसे बहुत प्यार करते थे। जब पूजा से निवृत हो वे अपनी मृगछाला पर आ बैठते तो चूहा दौड़ता हुआ उनके पास आ पहुँचता। कभी उनकी टाँगो पर दौड़ता, कभी कूद कर उनके कंधों पर चढ़ बैठता। महात्मा सारे वक्त हँसते रहते। धीरे-धीरे उन्होंने चूहे को मनुष्यों की तरह बोलना भी सिखा दिया ।

 

 

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