यह संदेह निर्मूल है कि हिंदीवाले उर्दू का नाश चाहते हैं। - राजेन्द्र प्रसाद। 

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काव्य

जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है।

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विश्वनाथ प्रताप सिंह की दो क्षणिकाएँ  - विश्वनाथ प्रतापसिंह

लिफाफा

पैगाम तुम्हारा
और पता उनका
दोनों के बीच
फाड़ा मैं ही जाऊँगा।

 
यह दिल क्या है देखा दिखाया हुआ है  - त्रिलोचन

यह दिल क्या है देखा दिखाया हुआ है
मगर दर्द कितना समाया हुआ है

 
डिजिटल इंडिया | हास्य-व्यंग - रोहित कुमार 'हैप्पी'

वर्मा जी ने फेसबुक पर स्टेटस लिखा -
'Enjoying in Dubai with family!'
साथ में...पूरे परिवार का फोटो अपलोड किया था!

 
रहीम के दोहे - 2 - रहीम

(21)

 
आज के हाइकु - रोहित कुमार 'हैप्पी'

भूख-गरीबी
करा देती है दूर
बड़े करीबी।

 
कबीर वाणी  - नरेंद्र शर्मा

हिन्दुअन की हिन्दुआई देखी
तुरकन की तुरकाई !
सदियों रहे साथ, पर दोनों
पानी तेल सरीखे ;
हम दोनों को एक दूसरे के
दुर्गुन ही दीखे !

 
दिन अच्छे आने वाले हैं - गयाप्रसाद शुक्ल सनेही

जब दुख पर दुख हों झेल रहे, बैरी हों पापड़ बेल रहे,
हों दिन ज्यों-त्यों कर ढेल रहे, बाकी न किसी से मेल रहे,
तो अपने जी में यह समझो,
दिन अच्छे आने वाले हैं ।

 
फिर तेरी याद - त्रिलोचन

फिर तेरी याद जो कहीं आई
नींद आने को थी नहीं आई

 
हाथ में हाथ मेरे | ग़ज़ल - रोहित कुमार 'हैप्पी'

हाथ में हाथ मेरे थमा तो जरा
हम कदम हमको अपना बना तो जरा

 
नव वर्ष  - सोहनलाल द्विवेदी

स्वागत! जीवन के नवल वर्ष
आओ, नूतन-निर्माण लिये,
इस महा जागरण के युग में
जाग्रत जीवन अभिमान लिये;

 
जीवन और संसार पर दोहे  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

आँखों से बहने लगी, गंगा-जमुना साथ ।
माँ ने पूछा हाल जो, सर पर रख कर हाथ ।।

 
नव वर्ष - हरिवंशराय बच्चन

नव वर्ष
हर्ष नव
जीवन उत्कर्ष नव।

 
साथी, नया वर्ष आया है - हरिवंशराय बच्चन

साथी, नया वर्ष आया है!
वर्ष पुराना, ले, अब जाता,
कुछ प्रसन्न सा, कुछ पछताता,
दे जी-भर आशीष, बहुत ही इससे तूने दुख पाया है!
साथी, नया वर्ष आया है!

 
संजय भारद्वाज की दो कविताएं - संजय भारद्वाज

जाता साल

(संवाद 2018 से)

 
नया साल  - भवानी प्रसाद मिश्र

पिछले साल नया दिन आया,
मैंने उसका गौरव गाया,
कहा, पुराना बीत गया लो,
आया सुख का गीत नया लो!

 
नववर्ष - भवानी प्रसाद मिश्र

दुस्समय ने साँस ली है,
वर्ष भर अविरत किया श्रम,
और जगती को निरन्तर ढालते रह कर दिया तम,
पी लिया उसने, कि शंकर शिव करें,
उसका न केवल कंठ नीला है;
भिद गया रग-रग सजगता खो चुकी,
हर तन्तु ढीला है;
यम, नियम में दृढ,
कि उनके सिद्ध हस्तों ने स्वयं ही फाँस ली है,
किन्तु हे शिव एक आशा है
समय ने साँस ली है ।

 
जय हिन्दी  - रघुवीर शरण

जय हिन्दी ! जय देव नागरी ! जय जय भारत माता।
‘तुलसी' 'सूर' और 'मीरा' का जीवन इसमें गाता ॥
नभ से नाद सुनें हिन्दी का, धरती पर हिन्दी हो।
भारत माता के माथे पर हिन्दी की बिन्दी हो ॥
यही राष्ट्र भाषा है अपनी, यही राज भाषा है।
मातृ प्रेम का मधु है इसमें, सब की अभिलाषा है ।
जय जय हिन्दी का जयकारा, कोटि कोटि को भाता ।
जय हिन्दी ! जय देवनागरी ! जय जय भारत माता !!
सारी दुनिया ऊंचे स्वर से- जय जय हिन्दी ! गाये ।
जन जन का मन इस भाषा पर - पूजा फूल चढ़ाये ॥
चलो ! हिमालय की चोटी पर- जय जय हिन्दी गायें ।
हिन्दी की गंगा हिमगिरि से- दुनिया में लहरायें ।
हिन्दी भाषा के भारत में, गीत तिरंगा गाता ।
जय हिन्दी ! जय देवनागरी ! जय जय भारत माता !!

 
जो दीप बुझ गए हैं - दुष्यंत कुमार

जो दीप बुझ गए हैं
उनका दु:ख सहना क्या,
जो दीप, जलाओगे तुम
उनका कहना क्या,

 
नया साल आए - दुष्यंत कुमार

नया साल आए, नया दर्द आए ।
मैं डरता नहीं हूँ, हवा सर्द आए,

 
घर-सा पाओ चैन कहीं तो |ग़ज़ल  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

घर-सा पाओ चैन कहीं तो हमको भी बतलाना तुम
हमसा कोई और दिखे तो जरा हमें दिखलाना तुम

 
एक बरस बीत गया - अटल बिहारी वाजपेयी

एक बरस बीत गया
झुलसाता जेठ मास
शरद चाँदनी उदास
सिसकी भरते सावन का
अंतर्घट रीत गया
एक बरस बीत गया

 
नये साल का पृष्ठ - शिवशंकर वशिष्ठ

एक साल कम हुआ और इस जीवन का,
नये साल का पृष्ठ खोलने वाले सुन!
छोटी-सी है जान बबाल सैकड़ों हैं,
छुटकारे का आँख खोलकर रस्ता चुन!

 
वर्ष नया - अजित कुमार

कुछ देर अजब पानी बरसा ।
बिजली तड़पी, कौंधा लपका ।
फिर घुटा-घुटा सा,
घिरा-घिरा
हो गया गगन का उत्तर-पूरब तरफ़ सिरा ।

 
शुभकामनाएँ - कुमार विकल

मैं भेजना चाहता हूँ
नए वर्ष की शुभकामनाएँ
दिसंबर की उजली धूप की
बची-खुची सद्भावनाएँ
किंतु कौन स्वीकार करेगा
मेरे उदास मन की भावनाएँ
क्योंकि मेरे प्रियजन जानते हैं
आजकल
मैं निराश मन हूँ
हताश तन हूँ।

 
नया वर्ष - डॉ० राणा प्रताप गन्नौरी राणा

नया वर्ष आया नया वर्ष आया,
नया हर्ष लाया नया हर्ष लाया ।

 
काश! नए वर्ष में - हलीम 'आईना'

काश! नए वर्ष में
ऐसा हो जाए।
कुर्सी हथियाने के बाद भी
हर एक सत्ताधारी
चुनाव पूर्व वाली
विनम्रता दिखलाए ।

 
नववर्ष पर.. - अमिता शर्मा

नव उमंग दो नव तरंग दो
नव उत्साह दो नव प्रवाह दो
शुभ संकल्पों से सुवासित
जीवन में जीवन भर दो ।

 
नये बरस में कोई बात नयी - रोहित कुमार 'हैप्पी'

नये बरस में कोई बात नयी चल कर लें
तुम ने प्रेम की लिखी है कथायें तो बहुत
किसी बेबस के दिल की 'आह' जाके चल सुन लें
तू अगर साथ चले जाके उसका ग़म हर लें
नये बरस में कोई बात नयी चल कर लें.....

 
लूट मची है चारों ओर | ग़ज़ल  - राहत इंदौरी

लूट मची है चारों ओर, सारे चोर
इक जंगल और लाखों मोर, सारे चोर

 
कविता-कविता - कौतुक बनारसी | हास्य कविता

कुछ जीत हुई, कुछ हार हुई
              दिन-रात रटें कविता-कविता
कुछ आन रही, कुछ शान रही
             हर बात रटें कविता-कविता
हर मौसिम में सरदी गरमी
             बरसात, रटें कविता-कविता
उफ, जात रहे न रहे जग में,
              कमजात रटें कविता-कविता

 
वो था सुभाष, वो था सुभाष - रोहित कुमार 'हैप्पी'

वो भी तो ख़ुश रह सकता था
महलों और चौबारों में।
उसको लेकिन क्या लेना था,
तख्तों-ताज-मीनारों से!
         वो था सुभाष, वो था सुभाष!

 
क्या ख़ास क्या है आम - हस्तीमल हस्ती

क्या ख़ास क्या है आम ये मालूम है मुझे
किसके हैं कितने दाम ये मालूम है मुझे

 
जहाँ जाते हैं हम... -  उदय प्रताप सिंह

जहाँ जाते हैं हम कोई कहानी छोड़ जाते हैं
ज़रा सा प्यार थोड़ी सी जवानी छोड़ आते हैं

 
ढूँढा है हर जगह पे... - हस्तीमल हस्ती

ढूँढा है हर जगह पे कहीं पर नहीं मिला
ग़म से तो गहरा कोई समुंदर नहीं मिला

 
मत पूछिये क्यों... - शेरजंग गर्ग

मत पूछिये क्यों पाँव में रफ़्तार नहीं है
यह कारवाँ मज़िल का तलबग़ार नहीं है

 
आँखों में रहा.. - बशीर बद्र

आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समुंदर नहीं देखा

 
अगर हम कहें... - सुदर्शन फ़ाकिर

अगर हम कहें और वो मुस्कुरा दें
हम उन के लिए ज़िंदगानी लुटा दें

 
ये किसने भीड़ में - श्याम ‘निर्मम'

ये किसने भीड़ में लाकर अकेला छोड़ दिया
मेरा तमाम सफ़र हादसों से जोड़ दिया

 
अपने होने का पता  - विजयकुमार सिंघल

अपने होने का पता मिलता नहीं
आजकल वो बेवफ़ा मिलता नहीं

 
मन रामायण जीवन गीता - सोम अधीर

मन रामायण जीवन गीता
यह घट आधा वह घट रीता

 
तू है बादल - लक्ष्मी शंकर वाजपेयी ब्लॉग

तू है बादल
तो, बरसा जल

 
काश! मैं भगवान होता - दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar

काश! मैं भगवान होता
तब न पैसे के लिए यों
हाथ फैलाता भिखारी
तब न लेकर कोर मुख से
श्वान के खाता भिखारी
तब न यों परिवीत चिथड़ों में
शिशिर से कंपकंपाता
तब न मानव दीनता औ'
याचना पर थूक जाता
तब न धन के गर्व में यों
सूझती मस्ती किसी को
तब ना अस्मत निर्धनों की
सूझती सस्ती किसी को
तब न अस्मत निर्धनों की
सूझती सस्ती किसी को
तब न भाई भाइयों पर
इस तरह खंजर उठाता
तब न भाई भगनियों का
खींचता परिधान होता
काश! मैं भगवान होता।

 
हिन्दी गान  -  महेश श्रीवास्तव

भाषा संस्कृति प्राण देश के इनके रहते राष्ट्र रहेगा।
हिन्दी का जय घोष गुँजाकर भारत माँ का मान बढ़ेगा।।

 
तुमने मुझको देखा... - श्री गिरिधर गोपाल

तुमने मुझको देखा मेरा भाग खिल गया ।
मेघ छ्टे सूरज निकला हिल उठीं दिशाएं,
दूर हुईं पथ से बाधा मनसे चिंताएं,
तुमने अंक लगाया मेरा शाप धुल गया ।

 
मैं तुम्हारी बांसुरी में.... - नर्मदा प्रसाद खरे

मैं तुम्हारी बांसुरी में स्वर भरूँगा । 
एक स्वर ऐसा भरूँ कि  तुम जगत को भूल जाओ;
एक स्वर ऐसा भरूँ कि चंद्रको तुम  चूम आओ,
स्वर -सुधा तुममें बहाकर,  ताप सब पल में हरूँगा ।
स्वर भरूँगा।। 

 
जब अन्तस में.... - विनय शुक्ल 'अक्षत'

जब अन्तस में पीड़ा हो, सन्नाटे हों
जब कहने को खुद से ही न बातें हों
जब पलकें बोझिल सी होने लगती हों
जब नदियाँ लहरों को खोने लगती हों
जब काँटें बन चुभते नर्म बिछौने हों
जब भविष्य के सारे सपने बौने हों।

 
कंकड चुनचुन  - कबीरदास | Kabirdas

कंकड चुनचुन महल उठाया
        लोग कहें घर मेरा। 
ना घर मेरा ना घर तेरा
        चिड़िया रैन बसेरा है॥

 
तुमने कुछ नहीं कहा  - अशोक लव

तुम्हारे चले जाने से पूर्व
तुमसे कितनी-कितनी बातें करनी थीं
कितना कुछ जानना था ।
तुम बोलने में असमर्थ थी
और मैं
वर्षों संग जिए क्षणों को जी लेना चाहता था
मृत्यु तुम्हारे सिरहाने मंडरा रही थी
मैं तुम्हें बताना चाहता था
पर बताने की सामर्थ्य कहाँ थी !
बता भी देता तो क्या होता !
विदा के क्षण और पीड़ामय हो जाते।
झूठे आश्वासनों को तुम सुनती थी
और मैं प्रतिदिन आश्वासन देता चला जाता था।
तुम्हारे सिर पर हाथ फेरते हुए
तुम्हारे अश्रु-कणों को पोंछते हुए
देखता था -
तुम्हारी आँखों में
फिर से मेरे साथ जीने की ललक के स्वप्न,
मेरे हाथों पर अभी भी है
तुम्हारे हाथों के कसाव की गर्माहट
पर विवशता थी
तुम्हें अकेले छोड़ने की
अस्पताल के अपरिचित डाक्टरों - नर्सों के पास।
कितने-कितने वर्षों के चित्र
आँखों के समक्ष तैरते
बेंच पर अकेले बैठे
अश्रुकणों के अविरल प्रवाहों के संग
तुम तैरती रहती मेरी स्मृतियों में।
एक-एक दिन आता
मैं हर पल मरता जाता
और जिस क्षण तुमने अंतिम श्वास लिए
और तुम्हारे हाथ का कसाव ढीला पड़ गया
तुम्हारे संग ही
मेरा संसार भी मर गया।
बस यही कसक लिए जीने की विवशता है
तुमने जाने से पूर्व कुछ नहीं कहा
कहती भी कैसे -
मुख पर लगी ट्यूब्स ने
तुम्हें बोलने ही नहीं दिया।
किसी के बिना कैसे जीवित रहा जा सकता है
किसी पुस्तक में नहीं लिखा है
तुम बोल सकती तो बता जाती।

 
किसान  - सत्यनारायण लाल

नहीं हुआ है अभी सवेरा
पूरब की लाली पहचान
चिड़ियों के जगने से पहले
खाट छोड़ उठ गया किसान ।

 
सबसे ख़तरनाक - अवतार सिंह संधू 'पाश'

मेहनत की लूट सबसे ख़तरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे ख़तरनाक नहीं होती
ग़द्दारी-लोभ की मुट्ठी सबसे ख़तरनाक नहीं होती

 
सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ - अज्ञेय | Ajneya

सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान!

 
सरकार कहते हैं - गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas

बुढ़ापे में जो हो जाए उसे हम प्यार कहते हैं,
जवानी की मुहब्बत को फ़कत व्यापार कहते हैं।
जो सस्ती है, मिले हर ओर, उसका नाम महंगाई,
न महंगाई मिटा पाए, उसे सरकार कहते हैं।

 
पूजा गीत  - धर्मवीर भारती | Dhramvir Bharti

जिस दिन अपनी हर आस्था तिनके-सी टूटे
जिस दिन अपने अन्तरतम के विश्वास सभी निकले झूठे !
उस दिन
होंगे वे कौन चरण
जिनमें इस लक्ष्यभ्रष्ट मन को मिल पायेगी
अन्त में शरण ?

 

 

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