क्या संसार में कहीं का भी आप एक दृष्टांत उद्धृत कर सकते हैं जहाँ बालकों की शिक्षा विदेशी भाषाओं द्वारा होती हो। - डॉ. श्यामसुंदर दास।

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कथा-कहानी

अंतरजाल पर हिंदी कहानियां व हिंदी साहित्य निशुल्क पढ़ें। कथा-कहानी के अंतर्गत यहां आप हिंदी कहानियां, कथाएं, लोक-कथाएं व लघु-कथाएं पढ़ पाएंगे।

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पत्ता परिवर्तन  - डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी

वह ताश की एक गड्डी हाथ में लिए घर के अंदर चुपचाप बैठा था कि बाहर दरवाज़े पर दस्तक हुई। उसने दरवाज़ा खोला तो देखा कि बाहर कुर्ता-पजामाधारी ताश का एक जाना-पहचाना पत्ता फड़फड़ा रहा था। उस ताश के पत्ते के पीछे बहुत सारे इंसान तख्ते लिए खड़े थे। उन तख्तों पर लिखा था, "यही है आपका इक्का, जो आपको हर खेल जितवाएगा।"

 
छोटी हिन्दी कहानियां  - भारत-दर्शन

दस शिक्षाप्रद व प्रेरणादायक कहानियाँ

 

 
ज़हर की जड़ें - बलराम अग्रवाल

दफ़्तर से लौटकर मैं अभी खाना खाने के लिए बैठा ही था कि डॉली ने रोना शुरू कर दिया।

 
उलाहना  - सआदत हसन मंटो | Saadat Hasan Manto

"देखो यार। तुम ने ब्लैक मार्केट के दाम भी लिए और ऐसा रद्दी पेट्रोल दिया कि एक दुकान भी न जली।"

 
दो लघु-कथाएँ  - डॉ. पूरन सिंह

मेकअप

 
त्रासदी  - रोहित कुमार ‘हैप्पी'

वायु सेना के इस पायलट ने कुछ ऐसा कर दिखाया कि सारा देश उसकी जय-जयकार कर उठा। लगभग 60 घंटे शत्रुओं की हिरासत में रहने के बाद भी वह जीवित अपने वतन लौट आया था। उसने दुश्मन की हिरासत में अपना मुंह नहीं खोला। अपने नाम व बैच के सिवाए उसने कुछ नहीं बताया था।

 
विद्यासागर की सीख  - रोहित कुमार 'हैप्पी'

एक बार एक युवक ईश्वरचंद्र विद्यासागर से मिलने आया। वह रेलगाड़ी से स्टेशन पहुंचा था। उसके पास एक सूटकेस था। स्टेशन पर कोई कुली न था। वह स्वयं सामान उठाना नहीं चाहता था। साहब लोग अक्सर अपना सामान स्वयं उठाने में अपमानित अनुभव करते थे। उसे बहुत गुस्सा आ रहा था।

 
पहचान - चंद्रेश कुमार छतलानी

उस चित्रकार की प्रदर्शनी में यूं तो कई चित्र थे लेकिन एक अनोखा चित्र सभी के आकर्षण का केंद्र था। बिना किसी शीर्षक के उस चित्र में एक बड़ा सा सोने का हीरों जड़ित सुंदर दरवाज़ा था जिसके अंदर एक रत्नों का सिंहासन था जिस पर मखमल की गद्दी बिछी थी।उस सिंहासन पर एक बड़ी सुंदर महिला बैठी थी, जिसके वस्त्र और आभूषण किसी रानी से कम नहीं थे। दो दासियाँ उसे हवा कर रही थीं और उसके पीछे बहुत से व्यक्ति खड़े थे जो शायद उसके समर्थन में हाथ ऊपर किये हुए थे।

 
जितने मुँह उतनी बात - रोहित कुमार 'हैप्पी'

एक बार एक वृद्ध और उसका लड़का अपने गाँव से किसी दूसरे गाँव जा रहे थे। पुराने समय में दूर जाने के लिए खच्चर या घोड़े इत्यादि की सवारी ली जाती थी। इनके पास भी एक खच्चर था। दोनों खच्चर पर सवार होकर जा रहे थे। रास्ते में कुछ लोग देखकर बोले, "रै माड़ा खच्चर अर दो-दो सवारी। हे राम, जानवर की जान की तो कोई कीमत नहीं समझते लोग।"

 
लिहाफ़ - इस्मत चुग़ताई

जब मैं जाड़ों में लिहाफ़ ओढ़ती हूँ तो पास की दीवार पर उसकी परछाई हाथी की तरह झूमती हुई मालूम होती है। और एकदम से मेरा दिमाग बीती हुई दुनिया के पर्दों में दौडने-भागने लगता है। न जाने क्या कुछ याद आने लगता है।

 
विधाता  - विनोदशंकर व्यास

चीनी के खिलौने, पैसे में दो; खेल लो, खिला लो, टूट जाए तो खा लो--पैसे में दो।

 
ठाकुर का कुआँ - मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand

जोखू ने लोटा मुँह से लगाया तो पानी में सख्त बदबू आयी। गंगी से बोला- यह कैसा पानी है? मारे बास के पिया नहीं जाता। गला सूखा जा रहा है और तू सड़ा पानी पिलाये देती है!

 
गूंगी - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

कन्या का नाम जब सुभाषिणी रखा गया था तब कौन जानता था कि वह गूंगी होगी। इसके पहले, उसकी दो बड़ी बहनों के सुकेशिनी और सुहासिनी नाम रखे जा चुके थे, इसी से तुकबन्दी मिलाने के हेतु उसके पिता ने छोटी कन्या का नाम रख दिया सुभाषिणी। अब केवल सब उसे सुभा ही कहकर बुलाते हैं।

 
प्रश्न | लघुकथा - रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore

बाप श्मशान से घर लौटा।

 
कुतिया के अंडे  - सुशांत सुप्रिय

उन दिनों एक मिशन के तहत हम दोनों को शहर के बाहर एक बंगले में रखा गया था - मुझे और मेरे सहयोगी अजय को। दोपहर में सुनीता नाम की बाई आती थी और वह दोपहर और शाम - दोनों समय का खाना एक ही बार में बना जाती थी। उसे और झाड़ू-पोंछे वाली बाई रमा को ख़ुद करकरे साहब ने यहाँ काम पर रखा था। हम लोग केवल करकरे साहब को जानते थे। उन्होंने ही हमें इस मिशन को पूरा करने का काम सौंपा था।

 
एक आने के दो समोसे | कहानी - आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)

 

 

 

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