भारत-दर्शन | Bharat-Darshan, Hindi literary magazine
लिखना बाकी है
Author : हरिहर झा | Harihar Jha


शब्दों के नर्तन से शापित
अंतर्मन शिथिलाया
लिखने को तो बहुत लिखा
पर कुछ लिखना बाकी है


रुग्ण बाग में पंछी घायल
रक्त वमन जब बहता
विभत्स में शृंगार रसों की
लुकाछिपी  खेलाई
विद्रोही दिल रोता रहता
दर्द बहुत ही सहता
फिर भी लफ़्ज़ों को निचोड़ कर
बदबू ही फैलाई
खाद समझ नाले से मैंने
कीचड़ तो बिखराया

किन्तु हाय! गन्ध  फूलों की
बिखराना बाकी है।

साफ करुंगा वस्त्र भाव के
बचपन में कुछ सोचा
किन्तु आज तक मैले कपड़े
धूल हटा ना पाया
दुर्गंध भरे, बिखरे बालों
को कितना भी नोचा
निर्मल करे सुभाये ऐसा
कुछ भी लिख ना पाया
ज्योत जलाने चला भले ही
अंधकार में डूबा

अब तक घने तिमिर की परतें
खुल जाना बाकी है।

कागद ने खुश होकर नभ के
रहस्य खूब उभारे
स्याही में डूबा तो, अचरज
पंछी खुद को पाया
ले आई आकाश में कलम
दुबका डर के मारे
उड़ ना पाया मुक्त हवा में
गड्ढे में घुस आया
बहुत किया डबरे में छपछप
थक कर यों पछताया

सागर से उठती लहरों को
छू लेना बाकी है

- हरिहर झा, ऑस्ट्रेलिया