| काव्य |
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| जब ह्रदय अहं की भावना का परित्याग करके विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है, तब वह मुक्त हृदय हो जाता है। हृदय की इस मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है उसे काव्य कहते हैं। कविता मनुष्य को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से ऊपर उठाती है और शेष सृष्टि से रागात्मक संबंध जोड़ने में सहायक होती है। काव्य की अनेक परिभाषाएं दी गई हैं। ये परिभाषाएं आधुनिक हिंदी काव्य के लिए भी सही सिद्ध होती हैं। काव्य सिद्ध चित्त को अलौकिक आनंदानुभूति कराता है तो हृदय के तार झंकृत हो उठते हैं। काव्य में सत्यं शिवं सुंदरम् की भावना भी निहित होती है। जिस काव्य में यह सब कुछ पाया जाता है वह उत्तम काव्य माना जाता है। |
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अब तो हरि नाम लौ लागी | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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मैंने लिखा कुछ भी नहीं | ग़ज़ल
- डॉ सुधेश
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| मैंने लिखा कुछ भी नहीं तुम ने पढ़ा कुछ भी नहीं ।
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साजन! होली आई है!
- फणीश्वरनाथ रेणु | Phanishwar Nath 'Renu'
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| साजन! होली आई है! सुख से हँसना जी भर गाना मस्ती से मन को बहलाना पर्व हो गया आज- साजन ! होली आई है! हँसाने हमको आई है! साजन! होली आई है! इसी बहाने क्षण भर गा लें दुखमय जीवन को बहला लें ले मस्ती की आग- साजन! होली आई है! जलाने जग को आई है! साजन! होली आई है! रंग उड़ाती मधु बरसाती कण-कण में यौवन बिखराती, ऋतु वसंत का राज- लेकर होली आई है! जिलाने हमको आई है! साजन ! होली आई है! खूनी और बर्बर लड़कर-मरकर- मधकर नर-शोणित का सागर पा न सका है आज- सुधा वह हमने पाई है ! साजन! होली आई है! साजन ! होली आई है ! यौवन की जय ! जीवन की लय! गूँज रहा है मोहक मधुमय उड़ते रंग-गुलाल मस्ती जग में छाई है साजन! होली आई है!
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बापू
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| संसार पूजता जिन्हें तिलक, रोली, फूलों के हारों से, मैं उन्हें पूजता आया हूँ बापू ! अब तक अंगारों से। अंगार, विभूषण यह उनका विद्युत पीकर जो आते हैं, ऊँघती शिखाओं की लौ में चेतना नयी भर जाते हैं। उनका किरीट, जो कुहा-भंग करके प्रचण्ड हुंकारों से, रोशनी छिटकती है जग में जिनके शोणित की धारों से। झेलते वह्नि के वारों को जो तेजस्वी बन वह्नि प्रखर, सहते ही नहीं, दिया करते विष का प्रचण्ड विष से उत्तर। अंगार हार उनका, जिनकी सुन हाँक समय रुक जाता है, आदेश जिधर का देते हैं, इतिहास उधर झुक जाता है।
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संत दादू दयाल के पद
- संत दादू दयाल | Sant Dadu Dayal
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पूजे पाहन पानी
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अर्जुन की प्रतिज्ञा
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| उस काल मारे क्रोध के तन कांपने उसका लगा, मानों हवा के वेग से सोता हुआ सागर जगा। मुख-बाल-रवि-सम लाल होकर ज्वाल सा बोधित हुआ, प्रलयार्थ उनके मिस वहाँ क्या काल ही क्रोधित हुआ? युग-नेत्र उनके जो अभी थे पूर्ण जल की धार-से, अब रोष के मारे हुए, वे दहकते अंगार-से । निश्चय अरुणिमा-मित्त अनल की जल उठी वह ज्वाल सी, तब तो दृगों का जल गया शोकाश्रु जल तत्काल ही। साक्षी रहे संसार करता हूँ प्रतिज्ञा पार्थ मैं, पूरा करुंगा कार्य सब कथानुसार यथार्थ मैं। जो एक बालक को कपट से मार हँसते हैँ अभी, वे शत्रु सत्वर शोक-सागर-मग्न दीखेंगे सभी। अभिमन्यु-धन के निधन से कारण हुआ जो मूल है, इससे हमारे हत हृदय को, हो रहा जो शूल है, उस खल जयद्रथ को जगत में मृत्यु ही अब सार है, उन्मुक्त बस उसके लिये रौ'र'व नरक का द्वार है। उपयुक्त उस खल को न यद्यपि मृत्यु का भी दंड है, पर मृत्यु से बढ़कर न जग में दण्ड और प्रचंड है । अतएव कल उस नीच को रण-मध्य जो मारूँ न मैं, तो सत्य कहता हूँ कभी शस्त्रास्त्र फिर धारूँ न मैं। अथवा अधिक कहना वृथा है, पार्थ का प्रण है यही, साक्षी रहे सुन ये वचन रवि, शशि, अनल, अंबर, मही। सूर्यास्त से पहले न जो मैं कल जयद्रथ-वध करूँ, तो शपथ करता हूँ स्वयं मैं ही अनल में जल मरूँ। |
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गुणगान
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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कलम, आज उनकी जय बोल | कविता
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| जो अगणित लघु दीप हमारे, तूफ़ानों में एक किनारे, जल-जलाकर बुझ गए किसी दिन, मांगा नहीं स्नेह मुँह खोल। कलम, आज उनकी जय बोल। पीकर जिनकी लाल शिखाएं, उगल रही सौ लपट दिशाएं, जिनके सिंहनाद से सहमी, धरती रही अभी तक डोल। कलम, आज उनकी जय बोल। अंधा चकाचौंध का मारा, क्या जाने इतिहास बेचारा, साखी हैं उनकी महिमा के, सूर्य, चन्द्र, भूगोल, खगोल। कलम, आज उनकी जय बोल। |
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वीर | कविता
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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जो तुम आ जाते एक बार | कविता
- महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma
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| कितनी करूणा कितने संदेश पथ में बिछ जाते बन पराग गाता प्राणों का तार तार अनुराग भरा उन्माद राग आँसू लेते वे पथ पखार जो तुम आ जाते एक बार
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अधिकार | कविता
- महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma
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| वे मुस्काते फूल, नहीं जिनको आता है मुर्झाना, वे तारों के दीप, नहीं जिनको भाता है बुझ जाना।
वे नीलम के मेघ, नहीं जिनको है घुल जाने की चाह, वह अनन्त रितुराज, नहीं जिसने देखी जाने की राह।
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मैं नीर भरी दुःख की बदली | कविता
- महादेवी वर्मा | Mahadevi Verma
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| मैं नीर भरी दुःख की बदली, स्पंदन में चिर निस्पंद बसा, क्रंदन में आहत विश्व हँसा, नयनो में दीपक से जलते, पलकों में निर्झनी मचली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली ! मेरा पग पग संगीत भरा, श्वांसों में स्वप्न पराग झरा, नभ के नव रंग बुनते दुकूल, छाया में मलय बयार पली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली ! मैं क्षितिज भृकुटी पर घिर धूमिल, चिंता का भर बनी अविरल, रज कण पर जल कण हो बरसी, नव जीवन अंकुर बन निकली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली ! पथ न मलिन करते आना पद चिन्ह न दे जाते आना सुधि मेरे आगम की जग में सुख की सिहरन हो अंत खिली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली ! विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होना परिचय इतना इतिहास यही उमटी कल थी मिट आज चली ! मैं नीर भरी दुःख की बदली !
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जलियाँवाला बाग में बसंत
- सुभद्रा कुमारी
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| यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते, काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।
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आखिर पाया तो क्या पाया?
- हरिशंकर परसाई | Harishankar Parsai
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| जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा जब थाप पड़ी, पग डोल उठा औरों के स्वर में स्वर भर कर अब तक गाया तो क्या गाया?
सब लुटा विश्व को रंक हुआ रीता तब मेरा अंक हुआ दाता से फिर याचक बनकर कण-कण पाया तो क्या पाया?
जिस ओर उठी अंगुली जग की उस ओर मुड़ी गति भी पग की जग के अंचल से बंधा हुआ खिंचता आया तो क्या आया?
जो वर्तमान ने उगल दिया उसको भविष्य ने निगल लिया है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु जूठन खाया तो क्या खाया? |
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कबीर दोहे -2
- कबीरदास | Kabirdas
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| (21) लूट सके तो लूट ले, राम नाम की लूट । पाछे फिरे पछताओगे, प्राण जाहिं जब छूट ॥
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रहीम के दोहे
- रहीम
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| (1)
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रहीम के दोहे - 2
- रहीम
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| (21)
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प्रभु ईसा
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| मूर्तिमती जिनकी विभूतियाँ जागरूक हैं त्रिभुवन में; मेरे राम छिपे बैठे हैं मेरे छोटे-से मन में;
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हम पंछी उन्मुक्त गगन के
- शिवमंगल सिंह सुमन
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| हम पंछी उन्मुक्त गगन के पिंजरबद्ध न गा पाऍंगे कनक-तीलियों से टकराकर पुलकित पंख टूट जाऍंगे ।
हम बहता जल पीनेवाले मर जाऍंगे भूखे-प्यासे कहीं भली है कटुक निबोरी कनक-कटोरी की मैदा से ।
स्वर्ण-श्रृंखला के बंधन में अपनी गति, उड़ान सब भूले बस सपनों में देख रहे हैं तरू की फुनगी पर के झूले ।
ऐसे थे अरमान कि उड़ते नील गगन की सीमा पाने लाल किरण-सी चोंच खोल चुगते तारक-अनार के दाने ।
होती सीमाहीन क्षितिज से इन पंखों की होड़ा-होड़ी या तो क्षितिज मिलन बन जाता या तनती सॉंसों की डोरी ।
नीड़ न दो, चाहे टहनी का आश्रय छिन्न-भिन्न कर डालो लेकिन पंख दिए हैं तो आकुल उड़ान में विघ्न न डालो ।
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मधुशाला | Madhushala
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा, फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।
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काका हाथरसी का हास्य काव्य
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार
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वंदन कर भारत माता का | काका हाथरसी की हास्य कविता
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| वंदन कर भारत माता का, गणतंत्र राज्य की बोलो जय । काका का दर्शन प्राप्त करो, सब पाप-ताप हो जाए क्षय ॥
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हास्य दोहे | काका हाथरसी
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज, ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज
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खिलौनेवाला
- सुभद्रा कुमारी
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| वह देखो माँ आज खिलौनेवाला फिर से आया है। कई तरह के सुंदर-सुंदर नए खिलौने लाया है। हरा-हरा तोता पिंजड़े में गेंद एक पैसे वाली छोटी सी मोटर गाड़ी है सर-सर-सर चलने वाली। सीटी भी है कई तरह की कई तरह के सुंदर खेल चाभी भर देने से भक-भक करती चलने वाली रेल। गुड़िया भी है बहुत भली-सी पहने कानों में बाली छोटा-सा \\\'टी सेट\\\' है छोटे-छोटे हैं लोटा-थाली। छोटे-छोटे धनुष-बाण हैं हैं छोटी-छोटी तलवार नए खिलौने ले लो भैया ज़ोर-ज़ोर वह रहा पुकार। मुन्नूौ ने गुड़िया ले ली है मोहन ने मोटर गाड़ी मचल-मचल सरला कहती है माँ se लेने को साड़ी कभी खिलौनेवाला भी माँ क्याख साड़ी ले आता है। साड़ी तो वह कपड़े वाला कभी-कभी दे जाता है। अम्मा तुमने तो लाकर के मुझे दे दिए पैसे चार कौन खिलौने लेता हूँ मैं तुम भी मन में करो विचार। तुम सोचोगी मैं ले लूँगा तोता, बिल्लीा, मोटर, रेल पर माँ, यह मैं कभी न लूँगा ये तो हैं बच्चों के खेल। मैं तो तलवार ख़रीदूँगा माँ या मैं लूँगा तीर-कमान जंगल में जा, किसी ताड़का को मारुँगा राम समान। तपसी यज्ञ करेंगे, असुरों- को मैं मार भगाऊँगा यों ही कुछ दिन करते-करते रामचंद्र मैं बन जाऊँगा। यही रहूँगा कौशल्याऊ मैं तुमको यही बनाऊँगा तुम कह दोगी वन जाने को हँसते-हँसते जाऊँगा। पर माँ, बिना तुम्हाेरे वन में मैं कैसे रह पाऊँगा? दिन भर घूमूँगा जंगल में लौट कहाँ पर आऊँगा। किससे लूँगा पैसे, रूठूँगा तो कौन मना लेगा कौन प्यानर से बिठा गोद में, मनचाही चींजे़ देगा। |
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मेरा शीश नवा दो - गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| मेरा शीश नवा दो अपनी चरण-धूल के तल में। देव! डुबा दो अहंकार सब मेरे आँसू-जल में।
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ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है | ग़ज़ल
- वसीम बरेलवी | Waseem Barelvi
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| ज़रा सा क़तरा कहीं आज गर उभरता है समन्दरों ही के लहजे में बात करता है ख़ुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है शराफ़तों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं किसी का कुछ न बिगाड़ो तो कौन डरता है ज़मीं की कैसी विक़ालत हो फिर नहीं चलती जब आसमां से कोई फ़ैसला उतरता है तुम आ गये हो तो फिर चाँदनी सी बातें हों ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है
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बढ़े चलो! बढ़े चलो!
- सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi
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| न हाथ एक शस्त्र हो न हाथ एक अस्त्र हो, न अन्न, नीर, वस्त्र हो, हटो नहीं, डटो वहीं, बढ़े चलो! बढ़े चलो!
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माँ कह एक कहानी
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| "माँ कह एक कहानी।" बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?" "कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी? माँ कह एक कहानी।" "तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे, तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभी मनमानी।" "जहाँ सुरभी मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।" वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे, हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।" "लहराता था पानी, हाँ हाँ यही कहानी।" "गाते थे खग कल कल स्वर से, सहसा एक हँस ऊपर से, गिरा बिद्ध होकर खर शर से, हुई पक्षी की हानी।" "हुई पक्षी की हानी? करुणा भरी कहानी!" चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया, इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।" "लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।" "माँगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी, तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।" "हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।" हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में, गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सब ने जानी।" "सुनी सब ने जानी! व्यापक हुई कहानी।" राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?" "माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी। कोई निरपराध को मारे तो क्यों न उसे उबारे? रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।" "न्याय दया का दानी! तूने गुणी कहानी।"
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देश
- शेरजंग गर्ग
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| ग्राम, नगर या कुछ लोगों का काम नहीं होता है देश संसद, सड़कों, आयोगों का नाम नहीं होता है देश देश नहीं होता है केवल सीमाओं से घिरा मकान देश नहीं होता है कोई सजी हुई ऊँची दूकान देश नहीं क्लब जिसमें बैठ करते रहें सदा हम मौज देश नहीं केवल बंदूकें, देश नहीं होता है फौज जहाँ प्रेम के दीपक जलते वहीं हुआ करता है देश जहाँ इरादे नहीं बदलते वहीं हुआ करता है देश सज्जन सीना ताने चलते वहीं हुआ करता है देश हर दिल में अरमान मचलते वहीं हुआ करता है देश वही होता जो सचमुच आगे बढ़ता क़दम-क़दम धर्म, जाति, भाषाएँ जिसका ऊँचा रखती हैं परचम पहले हम खुद को पहचाने फिर पहचानें अपना देश एक दमकता सत्य बनेगा, नहीं रहेगा सपना देश
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वीरांगना
- केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal
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| मैंने उसको जब-जब देखा, लोहा देखा। लोहे जैसा तपते देखा, गलते देखा, ढलते देखा मैंने उसको गोली जैसा चलते देखा।
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स्वतंत्रता का नमूना
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| बिना टिकिट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर जहाँ ‘मूड' आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू पकड़ें टी.टी., गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना |
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हिंदी जन की बोली है
- गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur
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| एक डोर में सबको जो है बाँधती वह हिंदी है, हर भाषा को सगी बहन जो मानती वह हिंदी है। भरी-पूरी हों सभी बोलियां यही कामना हिंदी है, गहरी हो पहचान आपसी यही साधना हिंदी है, सौत विदेशी रहे न रानी यही भावना हिंदी है।
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पन्द्रह अगस्त
- गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur
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| आज जीत की रात पहरुए सावधान रहना खुले देश के द्वार अचल दीपक समान रहना
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हम होंगे कामयाब
- गिरिजाकुमार माथुर | Girija Kumar Mathur
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| हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब हम होंगे कामयाब एक दिन ओ हो मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन॥
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हिंदी मातु हमारी - प्रो. मनोरंजन
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| प्रो. मनोरंजन जी, एम. ए, काशी विश्वविद्यालय की यह रचना लाहौर से प्रकाशित 'खरी बात' में 1935 में प्रकाशित हुई थी।
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वसीम बरेलवी की ग़ज़ल
- वसीम बरेलवी | Waseem Barelvi
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| मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा
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राजगोपाल सिंह | दोहे
- राजगोपाल सिंह
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| बाबुल अब ना होएगी, बहन भाई में जंग डोर तोड़ अनजान पथ, उड़कर चली पतंग
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मौन ओढ़े हैं सभी | राजगोपाल सिंह का गीत
- राजगोपाल सिंह
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| मौन ओढ़े हैं सभी तैयारियाँ होंगी ज़रूर राख के नीचे दबी चिंगारियाँ होंगी ज़रूर
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हाइकु - रोहित कुमार हैप्पी
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| हाइकु
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शास्त्रीजी - कमलाप्रसाद चौरसिया | कविता
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| पैदा हुआ उसी दिन, जिस दिन बापू ने था जन्म लिया भारत-पाक युद्ध में जिसने तोड़ दिया दुनिया का भ्रम।
एक रहा है भारत सब दिन, सदा रहेगा एक। युगों-युगों से रहे हैं इसमें भाषा-भाव अनेक।
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मेरी कविता
- कमला प्रसाद मिश्र | Kamla Prasad Mishra
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| मैं अपनी कविता जब पढ़ता उर में उठने लगती पीड़ा मेरे सुप्त हृदय को जैसे स्मृतियों ने है सहसा चीरा
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ताजमहल
- कमला प्रसाद मिश्र | Kamla Prasad Mishra
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| उमड़ा करती है शक्ति, वहीं दिल में है भीषण दाह जहाँ है वहीं बसा सौन्दर्य सदा सुन्दरता की है चाह जहाँ उस दिव्य सुन्दरी के तन में उसके कुसुमित मृदु आनन में इस रूप राशि के स्वप्नों को देखा करता था शाहजहाँ
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भूल कर भी न बुरा करना | ग़ज़ल
- डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
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| भूल कर भी न बुरा करना जिस क़दर हो सके भला करना।
सीखना हो तो शमअ़ से सीखो दूसरों के लिए जला करना।
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जयप्रकाश
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| झंझा सोई, तूफान रूका, प्लावन जा रहा कगारों में; जीवित है सबका तेज किन्तु, अब भी तेरे हुंकारों में।
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आपकी हँसी
- रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay
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मुक्तिबोध की हस्तलिपि में कविता
- गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh
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दोहे और सोरठे
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra
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| है इत लाल कपोल ब्रत कठिन प्रेम की चाल। मुख सों आह न भाखिहैं निज सुख करो हलाल॥
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राष्ट्रगीत में भला कौन वह
- रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay
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| राष्ट्रगीत में भला कौन वह भारत-भाग्य विधाता है फटा सुथन्ना पहने जिसका गुन हरचरना गाता है। मख़मल टमटम बल्लम तुरही पगड़ी छत्र चंवर के साथ तोप छुड़ाकर ढोल बजाकर जय-जय कौन कराता है। पूरब-पच्छिम से आते हैं नंगे-बूचे नरकंकाल सिंहासन पर बैठा, उनके तमगे कौन लगाता है। कौन-कौन है वह जन-गण-मन- अधिनायक वह महाबली डरा हुआ मन बेमन जिसका बाजा रोज बजाता है।
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तोड़ो
- रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay
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तोड़ो तोड़ो तोड़ो ये पत्थर ये चट्टानें ये झूठे बंधन टूटें तो धरती को हम जानें सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूब है अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी ऊब है आधे आधे गाने
तोड़ो तोड़ो तोड़ो ये ऊसर बंजर तोड़ो ये चरती परती तोड़ो सब खेत बनाकर छोड़ो मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को? गोड़ो गोड़ो गोड़ो
- रघुवीर सहाय
[साभार - हँसो हँसो जल्दी हँसो]
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झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं | ग़ज़ल
- कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
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| झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं मेरे तश्नालब पर पहरे उसके हैं
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दोहावली
- तुलसीदास | Tulsidas
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| तुलसीदास कृत 'दोहावली' मुक्तक रचना है। इसमें 573 छंद हैं जिनमें 23 सोरठे व शेष दोहे संगृहित हैं। |
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दोहावली - 1
- तुलसीदास | Tulsidas
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| श्रीसीतारामाभ्यां नम:
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तमाम घर को .... | ग़ज़ल
- ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek
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| तमाम घर को बयाबाँ बना के रखता था पता नहीं वो दीए क्यूँ बुझा के रखता था
बुरे दिनों के लिए तुमने गुल्लक्कें भर लीं, मै दोस्तों की दुआएँ बचा के रखता था
वो तितलियों को सिखाता था व्याकरण यारों- इसी बहाने गुलों को डरा के रखता था
न जाने कौन चला आए वक़्त का मारा, कि मैं किवाड़ से सांकल हटा के रखता था
हमेशा बात वो करता था घर बनाने की मगर मचान का नक़्शा छुपा के रखता था
मेरे फिसलने का कारण भी है यही शायद, कि हर कदम मैं बहुत आज़मा के रखता था
-ज्ञानप्रकाश विवेक
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गीत फ़रोश
- भवानी प्रसाद मिश्र | Bhawani Prasad Mishra
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| जी हाँ हुज़ूर मैं गीत बेचता हूँ मैं तरह-तरह के गीत बेचता हूँ मैं क़िस्म-क़िस्म के गीत बेचता हूँ
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हो गई है पीर पर्वत-सी | दुष्यंत कुमार
- दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
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| हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
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राजगोपाल सिंह की ग़ज़लें
- राजगोपाल सिंह
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| राजगोपाल सिंह की ग़ज़लें भी उनके गीतों व दोहों की तरह सराही गई हैं। यहाँ उनकी कुछ ग़ज़लें संकलित की जा रही हैं।
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इन चिराग़ों के | ग़ज़ल
- राजगोपाल सिंह
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| इन चिराग़ों के उजालों पे न जाना, पीपल ये भी अब सीख गए आग लगाना, पीपल
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महावीर प्रसाद द्विवेदी की कविताएं
- महावीर प्रसाद द्विवेदी | Mahavir Prasad Dwivedi
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| महावीर प्रसाद द्विवेदी की कविताएं |
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कभी कभी खुद से बात करो | कवि प्रदीप की कविता
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| कभी कभी खुद से बात करो, कभी खुद से बोलो । अपनी नज़र में तुम क्या हो? ये मन की तराजू पर तोलो । कभी कभी खुद से बात करो । कभी कभी खुद से बोलो ।
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सुख-दुख | कविता
- सुमित्रानंदन पंत | Sumitranandan Pant
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| मैं नहीं चाहता चिर-सुख, मैं नहीं चाहता चिर-दुख, सुख दुख की खेल मिचौनी खोले जीवन अपना मुख ! सुख-दुख के मधुर मिलन से यह जीवन हो परिपूरन; फिर घन में ओझल हो शशि, फिर शशि से ओझल हो घन ! जग पीड़ित है अति-दुख से जग पीड़ित रे अति-सुख से, मानव-जग में बँट जाएँ दुख सुख से औ’ सुख दुख से ! अविरत दुख है उत्पीड़न, अविरत सुख भी उत्पीड़न; दुख-सुख की निशा-दिवा में, सोता-जगता जग-जीवन ! यह साँझ-उषा का आँगन, आलिंगन विरह-मिलन का; चिर हास-अश्रुमय आनन रे इस मानव-जीवन का !
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भारत-भारती
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| यहाँ मैथिलीशरण गुप्त की भारत-भारती को संकलित करने का प्रयास आरंभ किया है। विश्वास है पाठकों को रोचक लगेगा।
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ठाकुर का कुआँ | कविता
- ओमप्रकाश वाल्मीकि | Om Prakash Valmiki
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| चूल्हा मिट्टी का मिट्टी तालाब की तालाब ठाकुर का ।
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निकटता | कविता
- विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar
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प्यारा वतन
- महावीर प्रसाद द्विवेदी | Mahavir Prasad Dwivedi
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| ( १)
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मंगलाचरण | उपक्रमणिका | भारत-भारती
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| मंगलाचरण
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मैं दिल्ली हूँ
- रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
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| 'मैं दिल्ली हूँ' रामावतार त्यागी की काव्य रचना है जिसमें दिल्ली की काव्यात्मक कहानी है। |
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मैं दिल्ली हूँ | एक
- रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
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| मैं दिल्ली हूँ मैंने कितनी, रंगीन बहारें देखी हैं । अपने आँगन में सपनों की, हर ओर कितारें देखीं हैं ॥
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स्वप्न बंधन
- सुमित्रानंदन पंत | Sumitranandan Pant
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| बाँध लिया तुमने प्राणों को फूलों के बंधन में एक मधुर जीवित आभा सी लिपट गई तुम मन में! बाँध लिया तुमने मुझको स्वप्नों के आलिंगन में! तन की सौ शोभाएँ सन्मुख चलती फिरती लगतीं सौ-सौ रंगों में, भावों में तुम्हें कल्पना रँगती, मानसि, तुम सौ बार एक ही क्षण में मन में जगती! तुम्हें स्मरण कर जी उठते यदि स्वप्न आँक उर में छवि, तो आश्चर्य प्राण बन जावें गान, हृदय प्रणयी कवि? तुम्हें देख कर स्निग्ध चाँदनी भी जो बरसावे रवि! तुम सौरभ-सी सहज मधुर बरबस बस जाती मन में, पतझर में लाती वसंत, रस-स्रोत विरस जीवन में, तुम प्राणों में प्रणय, गीत बन जाती उर कंपन में! तुम देही हो? दीपक लौ-सी दुबली कनक छबीली, मौन मधुरिमा भरी, लाज ही-सी साकार लजीली, तुम नारी हो? स्वप्न कल्पना सी सुकुमार सजीली ? तुम्हें देखने शोभा ही ज्यों लहरी सी उठ आई, तनिमा, अंग भंगिमा बन मृदु देही बीच समाई! कोमलता कोमल अंगों में पहिले तन घर पाई!
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बाँध दिए क्यों प्राण
- सुमित्रानंदन पंत | Sumitranandan Pant
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| सुमित्रानंदन पंत की हस्तलिपि में उनकी कविता, 'बाँध दिए क्यों प्राण'
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राखी | कविता
- सुभद्रा कुमारी
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| भैया कृष्ण ! भेजती हूँ मैं राखी अपनी, यह लो आज । कई बार जिसको भेजा है सजा-सजाकर नूतन साज ।।
लो आओ, भुजदण्ड उठाओ इस राखी में बँध जाओ । भरत - भूमि की रजभूमि को एक बार फिर दिखलाओ ।।
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राखी की चुनौती | सुभद्रा कुमारी चौहान
- सुभद्रा कुमारी
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| बहिन आज फूली समाती न मन में । तड़ित आज फूली समाती न घन में ।। घटा है न झूली समाती गगन में । लता आज फूली समाती न बन में ।।
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खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं
- वसीम बरेलवी | Waseem Barelvi
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| खुल के मिलने का सलीक़ा आपको आता नहीं और मेरे पास कोई चोर दरवाज़ा नहीं
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आशा का दीपक
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल दूर नहीं है; थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है। चिंगारी बन गयी लहू की बूंद गिरी जो पग से; चमक रहे पीछे मुड़ देखो चरण-चिह्न जगमग से। बाकी होश तभी तक, जब तक जलता तूर नहीं है; थक कर बैठ गये क्या भाई मन्जिल दूर नहीं है। अपनी हड्डी की मशाल से हृदय चीरते तम का; सारी रात चले तुम दुख झेलते कुलिश का। एक खेय है शेष, किसी विध पार उसे कर जाओ; वह देखो, उस पार चमकता है मन्दिर प्रियतम का। आकर इतना पास फिरे, वह सच्चा शूर नहीं है; थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है। दिशा दीप्त हो उठी प्राप्त कर पुण्य-प्रकाश तुम्हारा; लिखा जा चुका अनल-अक्षरों में इतिहास तुम्हारा। जिस मिट्टी ने लहू पिया, वह फूल खिलाएगी ही; अम्बर पर घन बन छाएगा ही उच्छ्वास तुम्हारा। और अधिक ले जाँच, देवता इतना क्रूर नहीं है; थककर बैठ गये क्या भाई! मंज़िल दूर नहीं है।
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प्रभु या दास?
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| बुलाता है किसे हरे हरे, वह प्रभु है अथवा दास? उसे आने का कष्ट न दे अरे, जा तू ही उसके पास ।
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मैं तो वही खिलौना लूँगा
- सियाराम शरण गुप्त | Siyaram Sharan Gupt
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| 'मैं तो वही खिलौना लूँगा'
मचल गया दीना का लाल -
'खेल रहा था जिसको लेकर
राजकुमार उछाल-उछाल ।'
व्यथित हो उठी माँ बेचारी -
'था सुवर्ण - निर्मित वह तो !
खेल इसी से लाल, - नहीं है
राजा के घर भी यह तो ! '
राजा के घर ! नहीं नहीं माँ
तू मुझको बहकाती है ,
इस मिट्टी से खेलेगा क्यों
राजपुत्र तू ही कह तो । '
फेंक दिया मिट्टी में उसने
मिट्टी का गुड्डा तत्काल ,
'मैं तो वही खिलौना लूँगा' -
मचल गया दीना का लाल ।
' मैं तो वही खिलौना लूँगा '
मचल गया शिशु राजकुमार , -
वह बालक पुचकार रहा था
पथ में जिसको बारबार |
' वह तो मिट्टी का ही होगा ,
खेलो तुम तो सोने से । '
दौड़ पड़े सब दास - दासियाँ
राजपुत्र के रोने से ।
' मिट्टी का हो या सोने का ,
इनमें वैसा एक नहीं ,
खेल रहा था उछल - उछल कर
वह तो उसी खिलौने से । '
राजहठी ने फेंक दिए सब
अपने रजत - हेम - उपहार ,
' लूँगा वही , वही लूँगा मैं ! '
मचल गया वह राजकुमार ।
- सियारामशरण गुप्त
[ साभार - जीवन सुधा ]
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कृष्ण की चेतावनी
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है।
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सीखा पशुओं से | व्यंग्य कविता
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas
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| कुत्ते से सीखी चापलूसी मलाई चट करना बता गई पूसी बकरे से अहं ब्रह्मास्मि-मैं-मैं कहां तक जानवरों को धन्यवाद दें ! बैलों से सीखा खटना, दुम्बे से चोट मारने के लिए पीछे हटना, भेड़िए से अपने लिए खुद कानून बनाना, भेंड़ों से आंख मूंदकर पीछे-पीछे आना, लोमड़ी ने सिखलाई चालाकी बताओ, अब और क्या रह गया बाकी ?
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कर्त्तव्यनिष्ठ
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| एक ने फेसबुक पर लिखा - पिताजी बीमार हैं... फिर अस्पताल की उनकी फोटो अपलोड कर दी फेसबुकिया यारों ने भी 'लाइक' मार-मार कर अपनी 'ड्यूटी' पूरी कर दी।
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एक भी आँसू न कर बेकार
- रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
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| एक भी आँसू न कर बेकार - जाने कब समंदर मांगने आ जाए! पास प्यासे के कुआँ आता नहीं है, यह कहावत है, अमरवाणी नहीं है, और जिस के पास देने को न कुछ भी एक भी ऐसा यहाँ प्राणी नहीं है, कर स्वयं हर गीत का श्रृंगार जाने देवता को कौनसा भा जाए!
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परशुराम की प्रतीक्षा
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| दो शब्द (प्रथम संस्करण)
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परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 1
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ? शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ?
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मैं और कुछ नहीं कर सकता था
- विष्णु नागर
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| मैं क्या कर सकता था किसी का बेटा मर गया था सांत्वना के दो शब्द कह सकता था किसी ने कहा बाबू जी मेरा घर बाढ़ में बह गया तो उस पर यकीन करके उसे दस रुपये दे सकता था किसी अंधे को सड़क पार करा सकता था रिक्शावाले से भाव न करके उसे मुंहमांगा दाम दे सकता था अपनी कामवाली को दो महीने का एडवांस दे सकता था दफ्तर के चपरासी की ग़लती माफ़ कर सकता था अमेरिका के खिलाफ नारे लगा सकता था वामपंथ में अपना भरोसा फिर से ज़ाहिर कर सकता था वक्तव्य पर दस्तख़त कर सकता था और मैं क्या कर सकता था किसी का बेटा तो नहीं बन सकता था किसी का घर तो बना कर नहीं दे सकता था किसी की आँख तो नहीं बन सकता था रिक्शा चलाने से किसी के फेफड़ों को सड़ने से रोक तो नहीं सकता था
और मैं क्या कर सकता था- ऐसे सवाल उठा कर खुश हो सकता था मान सकता था कि अब तो सिद्ध है वाकई मैं एक कवि हूँ और वक़्त आ चुका है कि मेरी कविताओं के अनुवाद की किताब अब अंग्रेजी में लंदन से छप कर आ जाना चाहिए।
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वन्देमातरम्
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| 'वन्देमातरम्' बंकिम चन्द्र चटर्जी द्वारा संस्कृत में रचा गया; यह स्वतंत्रता की लड़ाई में भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत था। इसका स्थान हमारे राष्ट्र गान, 'जन गण मन...' के बराबर है। इसे पहली बार 1896 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के सत्र में गाया गया था।
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वन्देमातरम् | राष्ट्रीय गीत
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| वंदे मातरम्, वंदे मातरम्! सुजलाम्, सुफलाम्, मलयज शीतलाम्, शस्यश्यामलाम्, मातरम्! वंदे मातरम्! शुभ्रज्योत्सनाम् पुलकितयामिनीम्, फुल्लकुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्, सुहासिनीम् सुमधुर भाषिणीम्, सुखदाम् वरदाम्, मातरम्! वंदे मातरम्, वंदे मातरम्॥
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माँ गाँव में है
- दिविक रमेश
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| चाहता था आ बसे माँ भी यहाँ, इस शहर में।
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सोचेगी कभी भाषा
- दिविक रमेश
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| जिसे रौंदा है जब चाहा तब जिसका किया है दुरूपयोग, सबसे ज़्यादा। जब चाहा तब निकाल फेंका जिसे बाहर। कितना तो जुतियाया है जिसे प्रकोप में, प्रलोभ में वह तुम्हीं हो न भाषा।
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माँ
- दिविक रमेश
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| रोज़ सुबह, मुँह-अंधेरे दूध बिलोने से पहले माँ चक्की पीसती, और मैं घुमेड़े में आराम से सोता।
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राधा प्रेम
- सपना मांगलिक
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| मोर मुकट पीताम्बर पहने,जबसे घनश्याम दिखा साँसों के मनके राधा ने, बस कान्हा नाम लिखा राधा से जब पूँछी सखियाँ, कान्हा क्यों न आता मैं उनमें वो मुझमे रहते, दूर कोई न जाता द्वेत कहाँ राधा मोहन में, यों ह्रदय में समाया जग क्या मैं खुद को भी भूली, तब ही उसको पाया।
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नाग की बाँबी खुली है आइए साहब
- ऋषभदेव शर्मा
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| नाग की बाँबी खुली है आइए साहब भर कटोरा दूध का भी लाइए साहब
रोटियों की फ़िक्र क्या है? कुर्सियों से लो गोलियाँ बँटने लगी हैं खाइए साहब
टोपियों के हर महल के द्वार छोटे हैं और झुककर और झुककर जाइए साहब
मानते हैं उम्र सारी हो गई रोते गीत उनके ही करम के गाइए साहब
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धुंध है घर में उजाला लाइए
- ऋषभदेव शर्मा
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| धुंध है घर में उजाला लाइए रोशनी का इक दुशाला लाइए
केचुओं की भीड़ आँगन में बढ़ी आदमी अब रीढ़ वाला लाइए
जम गया है मोम सारी देह में गर्म फौलादी निवाला लाइए
जूझने का जुल्म से संकल्प दे आज ऐसी पाठशाला लाइए
- डॉ.ऋषभदेव शर्मा (तरकश, 1996)
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हैं चुनाव नजदीक सुनो भइ साधो
- ऋषभदेव शर्मा
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| हैं चुनाव नजदीक, सुनो भइ साधो नेता माँगें भीख, सुनो भइ साधो गंगाजल का पात्र, आज सिर धारें कल थूकेंगे पीक, सुनो भइ साधो
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गरमागरम थपेड़े लू के
- आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
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| गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है, इतनी गरमी कभी न देखी, ऐसा पहली बार हुआ है। नींबू - पानी, ठंडा - बंडा, ठंडी बोतल डरी - डरी है। चारों ओर बबंडर उठते, आँधी चलती धूल भरी है। नहीं भाड़ में सीरा भैया, भट्ठी-सा संसार हुआ है, गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है। आते - जाते आतंकी से, सब अपना मुँह ढ़ाँप रहे हैं। बिजली आती-जाती रहती, एसी, कूलर काँप रहे हैं। शिमला नैनीताल चलें अब,मन में यही विचार हुआ है, गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है। अभी सुना भू-कम्प हुआ है, और सुनामी सागर तल पर। दूर-दूर तक दिखे न राहत, आफत की आहट है भू पर। बन्द द्वार कर घर में बैठो, जीना ही दुश्वार हुआ है, गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है। बादल फटा, बहे घर द्वारे, नगर-नगर में पानी-पानी। सृष्टि-सन्तुलन अस्त व्यस्त है, ये सब कुछ अपनी नादानी। मानव-मन पागल है कितना,समझाना बेकार हुआ है, गरमागरम थपेड़े लू के, पारा सौ के पार हुआ है।
-आनन्द विश्वास |
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छोटी कविताएं
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| कलयुग
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कुंती की याचना
- राजेश्वर वशिष्ठ
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| मित्रता का बोझ किसी पहाड़-सा टिका था कर्ण के कंधों पर पर उसने स्वीकार कर लिया था उसे किसी भारी कवच की तरह हाँ, कवच ही तो, जिसने उसे बचाया था हस्तिनापुर की जनता की नज़रों के वार से जिसने शांत कर दिया था द्रौणाचार्य और पितामह भीष्म को उस दिन वह अर्जुन से युद्ध तो नहीं कर पाया पर सारथी पुत्र राजा बन गया था अंग देश का दुर्योधन की मित्रता चाहे जितनी भारी हो पर सम्मान का जीवन तो यहीं से शुरु होता है!
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अदम गोंडवी की ग़ज़लें
- अदम गोंडवी
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| अदम गोंडवी को हिंदी ग़ज़ल में दुष्यन्त कुमार की परंपरा को आगे बढ़ाने वाला शायर माना जाता है। राजनीति, लोकतंत्र और व्यवस्था पर करारा प्रहार करती अदम गोंडवी की ग़ज़लें जनमानस की आवाज हैं। यहाँ उन्हीं की कुछ गज़लों का संकलन किया जा रहा है। |
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आँख पर पट्टी रहे | ग़ज़ल
- अदम गोंडवी
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| आँख पर पट्टी रहे और अक़्ल पर ताला रहे अपने शाहे-वक़्त का यूँ मर्तबा आला रहे
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कबीर | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| एक दिन आप घर से बाहर निकलेंगे और सड़क किनारे फ़ुटपाथ पर चिथड़ों में लिपटा बैठा होगा कबीर 'भाईजान , आप इस युग में कैसे ' --- यदि आप उसे पहचान कर पूछेंगे उससे तो वह शायद मध्य-काल में पाई जाने वाली आज-कल खो गई उजली हँसी हँसेगा उसके हाथों में पड़ा होगा किसी फटे हुए अख़बार का टुकड़ा जिस में बची हुई होगी एक बासी रोटी जिसे निगलने के बाद वह अख़बार के उसी टुकड़े पर छपी दंगे-फ़सादों की दर्दनाक ख़बरें पढ़ेगा और बिलख-बिलख कर रो देगा
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गुरुदेव | कबीर की साखियां
- कबीरदास | Kabirdas
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| सतगुरु सवाँ न को सगा, सोधी सईं न दाति । हरिजी सवाँ न को हितू, हरिजन सईं न जाति ।।१।। सद्गुरु के समान कोई सगा नहीं है। शुद्धि के समान कोई दान नहीं है। इस शुद्धि के समान दूसरा कोई दान नहीं हो सकता। हरि के समान कोई हितकारी नहीं है, हरि सेवक के समान कोई जाति नहीं है। बलिहारी गुरु आपकी, घरी घरी सौ बार । मानुष तैं देवता किया, करत न लागी बार ।।२।। मैं अपने गुरु पर प्रत्येक क्षण सैकड़ों बार न्यौछावर जाता हूँ जिसने मुझको बिना विलम्ब के मनुष्य से देवता कर दिया। सतगुरु की महिमा अनँत, अनँत किया उपगार । लोचन अनँत उघारिया, अनँत दिखावनहार ।।३।। सद्गुरु की महिमा अनन्त है। उसका उपकार भी अनन्त है। उसने मेरी अनन्त दृष्टि खोल दी जिससे मुझे उस अनन्त प्रभु का दर्शन प्राप्त हो गया। राम नाम कै पटंतरे, देबे कौं कुछ नाहिं । क्या लै गुरु संतोषिए, हौंस रही मन माँहि ।।४।। गुरु ने मुझे राम नाम का ऐसा दान दिया है कि मैं उसकी तुलना में कोई भी दक्षिणा देने में असमर्थ हूँ। सतगुरु कै सदकै करूँ, दिल अपनीं का साँच । कलिजुग हम सौं लड़ि पड़ा, मुहकम मेरा बाँच ।।५।। सद्गुरु के प्रति सच्चा समर्पण करने के बाद कलियुग के विकार मुझे विचलित न कर सके और मैंने कलियुग पर विजय प्राप्त कर ली। सतगुरु शब्द कमान ले, बाहन लागे तीर । एक जु बाहा प्रीति सों, भीतर बिंधा शरीर ।।६।। मेरे शरीर के अन्दर (अन्तरात्मा में) सद्गुरु के प्रेमपूर्ण वचन बाण की भाँति प्रवेश कर चुके हैं जिससे मुझे आत्म-ज्ञान प्राप्त हो गया है। सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक । लागत ही भैं मिलि गया, पड्या कलेजै छेक ।।७।। सद्गुरु सच्चे वीर हैं। उन्होंने अपने शब्दबाण द्वारा मेरे हृदय पर गहरा प्रभाव डाला है। पीछैं लागा जाइ था, लोक वेद के साथि। आगैं थैं सतगुर मिल्या, दीपक दीया हाथि ।।८।। मैं अज्ञान रूपी अन्धकार में भटकता हुआ लोक और वेदों में सत्य खोज रहा था। मुझे भटकते देखकर मेरे सद्गुरु ने मेरे हाथ में ज्ञानरूपी दीपक दे दिया जिससे मैं सहज ही सत्य को देखने में समर्थ हो गया। दीपक दीया तेल भरि, बाती दई अघट्ट । पूरा किया बिसाहना, बहुरि न आँवौं हट्ट ।।९।। कबीर दास जी कहते हैं कि अब मुझे पुन: इस जन्म-मरणरूपी संसार के बाजार में आने की आवश्यक्ता नहीं है क्योंकि मुझे सद्गुरु से ज्ञान प्राप्त हो चुका है। ग्यान प्रकासा गुरु मिला, सों जिनि बीसरिं जाइ । जब गोविंद कृपा करी, तब गुर मिलिया आई ।।१०।। गुरु द्वारा प्रदत्त सच्चे ज्ञान को मैं भुल न जाऊँ ऐसा प्रयास मुझे करना है क्योंकि ईश्वर की कृपा से ही सच्चे गुरु मिलते हैं। कबीर गुर गरवा मिल्या, रलि गया आटैं लौंन । जाति पाँति कुल सब मिटे, नाँव धरौगे कौंन ।।११।। कबीर कहते हैं कि मैं और मेरे गुरु आटे और नमक की तरह मिलकर एक हो गये हैं। अब मेरे लिये जाति-पाति और नाम का कोई महत्व नहीं रह गया है। जाका गुरु भी अँधला, चेला खरा निरंध । अंधहि अंधा ठेलिया, दोनों कूप पडंत ।।१२।। अज्ञानी गुरु का शिष्य भी अज्ञानी ही होगा। ऐसी स्थिति में दोनों ही नष्ट होंगे। नाँ गुर मिल्या न सिष भया, लालच खेल्याडाव । दोनौं बूड़े धार मैं, चढ़ि पाथर की नाव ।।१३।। साधना की सफलता के लिए ज्ञानी गुरु तथा निष्ठावान साधक का संयोग आवश्यक है। ऐसा संयोग न होने पर दोनों की ही दुर्गति होती है। जैसे कोई पत्थर की नाव पर चढ़ कर नदी पार करना चाहे। चौसठि दीवा जोइ करि, चौदह चंदा माँहि । तिहि घर किसकौ चाँन्दना, जिहि घर गोविंद नाँहि ।।१४।। ईश्वर भक्ति के बिना केवल कलाओं और विद्याओं की निपुणता मात्र से मनुष्य का कल्याण सम्भव नहीं है। भली भई जु गुर मिल्या, नातर होती हानि । दीपक जोति पतंग ज्यूँ, पड़ता आप निदान ।।१५।। कबीर दास जी कहते हैं कि सौभाग्यवश मुझे गुरु मिल गया अन्यथा मेरा जीवन व्यर्थ ही जाता तथा मैं सांसारिक आकर्षणों में पड़कर नष्ट हो जाता। माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं पडंत । कहै कबीर गुर ग्यान तैं, एक आध उबरंत ।।१६।। माया का आकर्षण इतना प्रबल है कि कोई विरला ही गुरु कृपा से इससे बच पाता है। संसै खाया सकल जग, संसा किनहुँ न खद्ध । जे बेधे गुरु अष्षिरां, तिनि संसा चुनिचुनि खद्ध ।।१७।। अधिकांश मनुष्य संशय से ग्रस्त रहते हैं। किन्तु गुरु उपदेश से संशय का नाश संभव है। सतगुर मिल्या त का भया, जे मनि पाड़ी भोल । पांसि विनंठा कप्पड़ा, क्या करै बिचारी चोल ।।१८।। सद्गुरु मिलने पर भी यह आवश्यक है कि साधना द्वारा मन को निम्रल किया जाय अन्यथा गुरु मिलन का संयोग भी व्यर्थ चला जाता है। बूड़ा था पै ऊबरा, गुरु की लहरि चमंकि । भेरा देख्या जरजरा, (तब) ऊतरि पड़े फरंकि ।।१९।। कबीर दास जी कहते हैं कि कर्मकाण्ड रूपी नाव से भवसागर पार करना कठिन था। अत: मैंने कर्मकाण्ड छोड़कर गुरु द्वारा बताये गये मार्ग से आसानी से सिद्धि प्राप्त कर ली। गुरु गोविंद तौ एक है, दूजा यहु आकार । आपा मेट जीवत मरै, तौ पावै करतार ।।२०।। गुरु और ईश्वर में कोई भेद नहीं है। जो साधक अहंता का भाव त्याग देता है वह मोक्ष को प्राप्त करता है। कबीर सतगुर ना मिल्या, रही अधूरी सीख। स्वाँग जती का पहिरि करि, घरि घरि माँगे भीख।।२१।। सद्गुरु के मार्गदर्शन के अभाव में साधना अधूरी रह जाती है और ऐसे लोग संन्यासी का वेश बनाकर केवल भिक्षा मांगते रहते हैं। सतगुर साँचा, सूरिवाँ, तातैं लोहि लुहार। कसनी दे कंचन किया, ताई लिया ततसार।।२२।। इस साखी में कबीर दास जी ने सद्गुरु के लिए सोनार और लोहार का दृष्टान्त दिया है। सोनार की भाँति गुरु शिष्य को साधना की कसौटी पर परखता है फिर लोहार की भाँति तपाकर शिष्य के मन को सही आकार देता है। निहचल निधि मिलाइ तत, सतगुर साहस धीर । निपजी मैं साझी घना, बाँटे नहीं कबीर ।।२३।। कबीर दास जी कहते हैं कि सद्गुरु की कृपा से आत्मज्ञान का आनन्द मुझे मिला है किन्तु चाह कर भी मैं इस आनन्द को दूसरों के साथ बाँट नहीं सकता क्योंकि आत्मानुभूति के लिए व्यक्ति को स्वयं साधना करनी पड़ती है। सतगुर हम सूँ रीझि करि, कहा एक परसंग । बरसा बादल प्रेम का, भीजि गया सब अंग ।।२४।। सद्गुरु ने प्रसन्न होकर हमसे एक रहस्य की बात बतलायी, जिससे प्रेम का बादल इस प्रकार बरसा कि हम उसमें भींग गये। कबीर बादल प्रेम का, हम परि बरस्या आइ । अंतरि भीगी आतमाँ, हरी भई बनराई ।।२५।। कबीर कहते हैं कि सद्गुरु के बताये हुए मार्ग से प्रेम का बादल उमड़कर हमारे ऊपर बरसने लगा। हमारी अन्तरात्मा भींग गयी और जीवनरूपी वनराशि हरी हो गयी। |
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मिट्टी की महिमा
- शिवमंगल सिंह सुमन
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| निर्मम कुम्हार की थापी से कितने रूपों में कुटी-पिटी, हर बार बिखेरी गई, किन्तु मिट्टी फिर भी तो नहीं मिटी।
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सत्य की महिमा - कबीर की वाणी
- कबीरदास | Kabirdas
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| साँच बराबर तप नहीं, झूँठ बराबर पाप। जाके हिरदे साँच है, ताके हिरदे आप॥
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उदयभानु हंस की ग़ज़लें
- उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans
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| उदयभानु हंस का ग़ज़ल संकलन |
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हमने अपने हाथों में
- उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans
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| हमने अपने हाथों में जब धनुष सँभाला है, बाँध कर के सागर को रास्ता निकाला है।
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कलयुग में गर होते राम
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| अच्छे युग में हुए थे राम कलयुग में गर होते राम, बहुत कठिन हो जाते काम! गर दशरथ बनवास सुनाते जाते राम, ना जाने जाते दशरथ वहीं ढेर हो जाते।
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जीवन की आपाधापी में
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।
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कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
- सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi
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| लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती नन्ही चींटीं जब दाना ले कर चढ़ती है चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है मन का विश्वास रगॊं मे साहस भरता है चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है मेहनत उसकी बेकार नहीं हर बार होती कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती डुबकियाँ सिंधु में गोताखोर लगाता है जा-जा कर खाली हाथ लौट कर आता है मिलते न सहज ही मोती गहरे पानी में बढ़ता दूना विश्वास इसी हैरानी में मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो जब तक न सफल हो नींद-चैन को त्यागो तुम संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती
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दिन अच्छे आने वाले हैं
- गयाप्रसाद शुक्ल सनेही
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| जब दुख पर दुख हों झेल रहे, बैरी हों पापड़ बेल रहे, हों दिन ज्यों-त्यों कर ढेल रहे, बाकी न किसी से मेल रहे, तो अपने जी में यह समझो, दिन अच्छे आने वाले हैं ।
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हरिवंशराय बच्चन की नये वर्ष पर कविताएं
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| यहाँ हरिवंशराय बच्चन की नये वर्ष पर लिखी गई कुछ कविताएं संकलित की हैं। विश्वास है पाठकों को अच्छी लगेंगी। |
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साथी, नया वर्ष आया है!
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| साथी, नया वर्ष आया है! वर्ष पुराना, ले, अब जाता, कुछ प्रसन्न सा, कुछ पछताता, दे जी-भर आशीष, बहुत ही इससे तूने दुख पाया है! साथी, नया वर्ष आया है!
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उठो धरा के अमर सपूतो
- द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी
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| उठो धरा के अमर सपूतो पुनः नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो।
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नववर्ष
- सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi
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| स्वागत! जीवन के नवल वर्ष आओ, नूतन-निर्माण लिये, इस महा जागरण के युग में जाग्रत जीवन अभिमान लिये;
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कुंअर बेचैन ग़ज़ल संग्रह
- कुँअर बेचैन
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| कुंअर बेचैन ग़ज़ल संग्रह - यहाँ डॉ० कुँअर बेचैन की बेहतरीन ग़ज़लियात संकलित की गई हैं। विश्वास है आपको यह ग़ज़ल-संग्रह पठनीय लगेगा। |
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अपना जीवन.... | ग़ज़ल
- कुँअर बेचैन
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| अपना जीवन निहाल कर लेते औरों का भी ख़याल कर लेते
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हिन्दी के सुमनों के प्रति पत्र
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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| मैं जीर्ण-साज बहु छिद्र आज, तुम सुदल सुरंग सुवास सुमन, मैं हूँ केवल पतदल-आसन, तुम सहज बिराजे महाराज।
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निराला की ग़ज़लें
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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| निराला का ग़ज़ल संग्रह - इन पृष्ठों में निराला की ग़ज़लें संकलित की जा रही हैं। निराला ने विभिन्न विधाओं में साहित्य-सृजन किया है। यहाँ उनके ग़ज़ल सृजन को पाठकों के समक्ष लाते हुए हमें बहुत प्रसन्नता हो रही है।
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नये बरस में
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| नये बरस में कोई बात नयी चल कर लें तुम ने प्रेम की लिखी है कथायें तो बहुत किसी बेबस के दिल की 'आह' जाके चल सुन लें तू अगर साथ चले जाके उसका ग़म हर लें नये बरस में कोई बात नयी चल कर लें.....
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मातृ-मन्दिर में
- सुभद्रा कुमारी
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| वीणा बज-सी उठी, खुल गये नेत्र और कुछ आया ध्यान। मुड़ने की थी देर, दिख पड़ा उत्सव का प्यारा सामान॥
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पथ से भटक गया था राम | भजन
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| पथ से भटक गया था राम नादानी में हुआ ये काम छोड़ गए सब संगी साथी संकट में प्रभु तुम लो थाम तू सबके दुःख हरने वाला बिगड़े संवारे सबके काम तेरा हर पल ध्यान धरुं मैं ऐसा पिला दे प्रेम का जाम
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मंजुल भटनागर की कविताएं
- मंजुल भटनागर
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| इस पृष्ठ पर मंजुल भटनागर की कविताएं संकलित की जा रही हैं। नि:संदेह रचनाएं पठनीय हैं, विश्वास है आप इनका रस्वादन करेंगे।
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ओ उन्मुक्त गगन के पाखी
- मंजुल भटनागर
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| ओ उन्मुक्त गगन के पाखी मेरे आंगन आ के देख
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कब लोगे अवतार हमारी धरती पर
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| फैला है अंधकार हमारी धरती पर हर जन है लाचार हमारी धरती पर हे देव! धरा है पूछ रही... कब लोगे अवतार हमारी धरती पर !
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स्वामी विवेकानंद की कविताएं
- स्वामी विवेकानंद
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| यहाँ स्वामी विवेकानंद की कविताएं संकलित की गई हैं।
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काली माता
- स्वामी विवेकानंद
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| छिप गये तारे गगन के, बादलों पर चढ़े बादल, काँपकर गहरा अंधेरा, गरजते तूफान में, शत लक्ष पागल प्राण छूटे जल्द कारागार से--द्रुम जड़ समेत उखाड़कर, हर बला पथ की साफ़ करके ।
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खड़ा हिमालय बता रहा है
- सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi
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| खड़ा हिमालय बता रहा है डरो न आंधी पानी में। खड़े रहो तुम अविचल हो कर सब संकट तूफानी में।
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भारतीय | फीज़ी पर कविता
- जोगिन्द्र सिंह कंवल
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| लम्बे सफर में हम भारतीयों को कभी पत्थर कभी मिले बबूल
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कभी गिरमिट की आई गुलामी
- जोगिन्द्र सिंह कंवल
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| उस समय फीज़ी में तख्तापलट का समय था। फीज़ी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार जोगिन्द्र सिंह कंवल फीज़ी की राजनैतिक दशा और फीज़ी के भविष्य को लेकर चिंतित थे, तभी तो उनकी कलम बोल उठी:
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सात सागर पार
- जोगिन्द्र सिंह कंवल
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| सात सागर पार करके भी ठिकाना न मिला सौ साल प्यार करके भी निभाना न मिला
कई जनमों से तो बिछड़े थे एक मां से हम दूसरी मां के आंचल में भी सिर छिपाना न मिला
पीढ़ियां खेली हैं ऐ देश तेरी गोद में फिर भी तेरी ममता का हमें नजराना न मिला
हम ने बंजर धरती में खिला दिए रंगीन फूल तेरी पूजा के लिये दो फूल चढ़ाना न मिला
खून पसीने से बनाया था जन्नत का चमन इस की किसी डाल पर भी आशियाना न मिला
हम तो पागल हो गये मंजिलों की खोज में इतनी भटकन के बाद भी कोई ठिकाना न मिला
हम ने क्या पाप किया समझ में आता नहीं वर्षों की लगन का हमें, कोई इवज़ाना न मिला
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गिरमिट के समय
- कमला प्रसाद मिश्र | Kamla Prasad Mishra
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| दीन दुखी मज़दूरों को लेकर था जिस वक्त जहाज सिधारा चीख पड़े नर नारी, लगी बहने नयनों से विदा-जल-धारा भारत देश रहा छूट अब मिलेगा इन्हें कहीं और सहारा फीजी में आये तो बोल उठे सब आज से है यह देश हमारा
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मुक्ता
- सोहनलाल द्विवेदी | Sohanlal Dwivedi
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| ज़ंजीरों से चले बाँधने आज़ादी की चाह। घी से आग बुझाने की सोची है सीधी राह!
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ग्रामवासिनी
- शारदा मोंगा
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| भारत माता ग्रामवासिनी, शस्य श्यामला सुखद सुहासिनी,
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चाहता हूँ देश की....
- रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
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| मन समर्पित, तन समर्पित और यह जीवन समर्पित चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूं
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पुरखों की पुण्य धरोहर
- रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
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| जो फूल चमन पर संकट देख रहा सोता मिट्टी उस को जीवन-भर क्षमा नहीं करती ।
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नहीं मांगता
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| नहीं मांगता, प्रभु, विपत्ति से, मुझे बचाओ, त्राण करो विपदा में निर्भीक रहूँ मैं, इतना, हे भगवान, करो।
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तुलसी बाबा
- त्रिलोचन
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| तुलसी बाबा, भाषा मैंने तुमसे सीखी मेरी सजग चेतना में तुम रमे हुए हो । कह सकते थे तुम सब कड़वी, मीठी, तीखी ।
प्रखर काल की धारा पर तुम जमे हुए हो । और वृक्ष गिर गए, मगर तुम थमे हुए हो । कभी राम से अपना कुछ भी नहीं दुराया, देखा, तुम उन के चरणों पर नमे हुए हो । विश्व बदर था हाथ तुम्हारे उक्त फुराया, तेज तुम्हारा था कि अमंगल वृक्ष झुराया, मंगल का तरु उगा; देख कर उसकी छाया, विघ्न विपद् के घन सरके, मुँह कहीं चुराया । आठों पहर राम के रहे, राम गुन गाया ।
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आज तुम्हारा जन्मदिवस
- नामवर सिंह | 28 जुलाई
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| आज तुम्हारा जन्मदिवस, यूँ ही यह संध्या भी चली गई, किंतु अभागा मैं न जा सका समुख तुम्हारे और नदी तट भटका-भटका कभी देखता हाथ कभी लेखनी अबन्ध्या।
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हम स्वेदश के प्राण
- गयाप्रसाद शुक्ल सनेही
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| प्रिय स्वदेश है प्राण हमारा, हम स्वदेश के प्राण।
अाँखों में प्रतिपल रहता है, ह्रदयों में अविचल रहता है यह है सबल, सबल हैं हम भी इसके बल से बल रहता है,
और सबल इसको करना है, करके नव निर्माण। हम स्वदेश के प्राण।
यहीं हमें जीना मरना है, हर दम इसका दम भरना है, सम्मुख अगर काल भी आये चार हाथ उससे करना है,
इसकी रक्षा धर्म हमारा, यही हमारा त्राण। हम स्वदेश के प्राण।
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सुभाषचन्द्र
- गयाप्रसाद शुक्ल सनेही
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| तूफान जुल्मों जब्र का सर से गुज़र लिया कि शक्ति-भक्ति और अमरता का बर लिया । खादिम लिया न साथ कोई हमसफर लिया, परवा न की किसी की हथेली पर सर लिया । आया न फिर क़फ़स में चमन से निकल गया । दिल में वतन बसा के वतन से निकल गया ।।
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हौसला
- देवेन्द्र कुमार मिश्रा
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| कागज की नाव बही और डूब गई बात डूबने की नहीं उसके हौसले की है और कौन मरा कितना जिया सवाल ये नहीं बात तो हौसले की है बात तो जीने की है कितना जिया ये बात बेमानी है किस तरह जिया कागज़ी नाव का हौसला देखिये डूबना नहीं।
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भगत सिंह को पसंद थी ये ग़ज़ल
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| उन्हें ये फिक्र है हर दम नई तर्ज़-ए-जफ़ा क्या है हमें ये शौक़ है देखें सितम की इंतिहा क्या है
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भगतसिंह पर लिखी कविताएं
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| इन पृष्ठों में भगतसिंह पर लिखी काव्य रचनाओं को संकलित करने का प्रयास किया जा तहा है। विश्वास है आपको सामग्री पठनीय लगेगी। |
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रंग दे बसंती चोला गीत का इतिहास
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| 'रंग दे बसंती चोला' अत्यंत लोकप्रिय देश-भक्ति गीत है। यह गीत किसने रचा? इसके बारे में बहुत से लोगों की जिज्ञासा है और वे समय-समय पर यह प्रश्न पूछते रहते हैं।
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ज्ञान का पाठ
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| डॉ० कलाम को समर्पित....
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वृन्द के नीति-दोहे
- वृन्द
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| स्वारथ के सब ही सगे, बिन स्वारथ कोउ नाहिं । जैसे पंछी सरस तरु, निरस भये उड़ि जाहिं ।। १ ।।
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आनन्द विश्वास के हाइकु
- आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
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| 1. मन की बात सोचो, समझो और मनन करो।
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हिंदी रूबाइयां
- उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans
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कलगी बाजरे की
- अज्ञेय | Ajneya
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| हरी बिछली घास। दोलती कलगी छरहरी बाजरे की। अगर मैं तुमको ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता, या शरद् के भोर की नीहार न्हायी कुँई। टटकी कली चंपे की, वगैरह, तो नहीं, कारण कि मेरा हृदय उथला या सूना है या कि मेरा प्यार मैला है बल्कि केवल यही : ये उपमान मैले हो गए हैं। देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच। कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है मगर क्या तुम नहीं पहचान पाओगी : तुम्हारे रूप के, तुम हो, निकट हो, इसी जादू के निजी किस सहज गहरे बोध से, किस प्यार से मैं कह रहा हूँ- अगर मैं यह कहूँ- बिछली घास हो तुम लहलहाती हवा में कलगी छरहरे बाजरे की? आज हम शहरातियों को पालतू मालंच पर सँवरी जुही के फूल-से सृष्टि के विस्तार का, ऐश्वर्य का, औदार्य का कहीं सच्चा, कहीं प्यारा एक प्रतीक बिछली घास है या शरद् की साँझ के सूने गगन की पीठिका पर दोलती कलगी अकेली बाजरे की। और सचमुच, इन्हें जब-जब देखता हूँ यह खुला वीरान संसृति का घना हो सिमट जाता है और मैं एकांत होता हूँ समर्पित। शब्द जादू हैं- मगर क्या यह समर्पण कुछ नहीं है?
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अकाल और उसके बाद
- नागार्जुन | Nagarjuna
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| कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास‚ कई दिनों तक कानी कुतिया सोई उसके पास कई दिनों तह लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त‚ कही दिनों तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त।
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चंपा काले-काले अक्षर नहीं चीन्हती
- त्रिलोचन
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| चम्पा काले काले अच्छर नहीं चीन्हती मैं जब पढ़ने लगता हूँ वह आ जाती है खड़ी खड़ी चुपचाप सुना करती है उसे बड़ा अचरज होता है: इन काले चिन्हों से कैसे ये सब स्वर निकला करते हैं|
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हमारी हिंदी
- रघुवीर सहाय | Raghuvir Sahay
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| हमारी हिंदी एक दुहाजू की नई बीवी है बहुत बोलनेवाली बहुत खानेवाली बहुत सोनेवाली
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पहचान
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| अपनी गली मोहल्ला अपना, अपनी बाणी खाना अपना, थी अपनी भी इक पहचान।
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कुछ झूठ बोलना सीखो कविता!
- जयप्रकाश मानस | Jaiprakash Manas
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| कविते! कुछ फरेब करना सिखाओ कुछ चुप रहना वरना तुम्हारे कदमों पर चलनेवाला कवि मार दिया जाएगा खामखां महत्वपूर्ण यह भी नहीं कि तुम उसे जीवन देती हो
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एक अदद घर
- जयप्रकाश मानस | Jaiprakash Manas
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| जब माँ नींव की तरह बिछ जाती है पिता तने रहते हैं हरदम छत बनकर भाई सभी उठा लेते हैं स्तम्भों की मानिंद बहन हवा और अंजोर बटोर लेती है जैसे झरोखा बहुएँ मौसमी आघात से बचाने तब्दील हो जाती हैं दीवाल में तब नई पीढ़ी के बच्चे खिलखिला उठते हैं आँगन-सा आँगन में खिले किसी बारहमासी फूल-सा तभी गमक-गमक उठता है एक अदद घर समूचे पड़ोस में सारी गलियों में सारे गाँव में पूरी पृथ्वी में
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जूठे पत्ते
- बालकृष्ण शर्मा नवीन | Balkrishan Sharma Navin
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| क्या देखा है तुमने नर को, नर के आगे हाथ पसारे? क्या देखे हैं तुमने उसकी, आँखों में खारे फ़व्वारे? देखे हैं? फिर भी कहते हो कि तुम नहीं हो विप्लवकारी? तब तो तुम पत्थर हो, या महाभयंकर अत्याचारी।
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जनतंत्र का जन्म
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी, मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है; दो राह, समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो, सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।
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हिन्दी भाषा
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
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| छ्प्पै
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कुण्डली
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| बोलो इस संसार में, किसको किससे प्रेम। हर कोई अब खेलता, अपनी-अपनी 'गेम'।। अपनी-अपनी 'गेम', बने हैं सभी खिलाड़ी। निकलें पूरे बाप, दिखें जो बड़े अनाड़ी ।। नहीं देखता कोय, फिर क्यों पूरा तोलो ? आई अपने काम, कहाँ ये दुनिया बोलो ।।
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निदा फ़ाज़ली के दोहे
- निदा फ़ाज़ली
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| बच्चा बोला देख कर मस्जिद आली-शान । अल्लाह तेरे एक को इतना बड़ा मकान ।।
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माँ | ग़ज़ल
- निदा फ़ाज़ली
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| बेसन की सोंधी रोटी पर, खट्टी चटनी जैसी माँ याद आती है चौका, बासन, चिमटा, फूंकनी जैसी माँ
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अपना ग़म लेके | ग़ज़ल
- निदा फ़ाज़ली
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| अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये
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घर से निकले ....
- निदा फ़ाज़ली
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| घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे
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राम रतन धन पायो | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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कबीर के दोहे | Kabir's Couplets
- कबीरदास | Kabirdas
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| कबीर के दोहे सर्वाधिक प्रसिद्ध व लोकप्रिय हैं। हम कबीर के अधिक से अधिक दोहों को संकलित करने हेतु प्रयासरत हैं।
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फागुन के दिन चार
- मीराबाई | Meerabai
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| फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
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सामने गुलशन नज़र आया | ग़ज़ल
- डॉ सुधेश
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| सामने गुलशन नज़र आया गीत भँवरे ने मधुर गाया ।
फूल के संग मिले काँटे भी ज़िन्दगी का यही सरमाया ।
उन की महफ़िल में क़दम मेरा मैं बडी गुस्ताखी कर आया ।
आँख में भर कर उसे देखा फिर रहा हूँ तब से भरमाया ।
चोट ऐसी वक्त ने मारी गीत होंठों ने मधुर गाया ।
धुंध ऐसी सुबह को छाई शाम का मन्जर नज़र आया ।
आँख टेढ़ी जब हुई उन की ज़िन्दगी ने बस क़हर ढाया ।
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कबीर वाणी
- कबीरदास | Kabirdas
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| माला फेरत जुग गया फिरा ना मन का फेर कर का मनका छोड़ दे मन का मन का फेर मन का मनका फेर ध्रुव ने फेरी माला धरे चतुरभुज रूप मिला हरि मुरली वाला कहते दास कबीर माला प्रलाद ने फेरी धर नरसिंह का रूप बचाया अपना चेरो
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कबीर की हिंदी ग़ज़ल
- कबीरदास | Kabirdas
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| क्या कबीर हिंदी के पहले ग़ज़लकार थे? यदि कबीर की निम्न रचना को देखें तो कबीर ने निसंदेह ग़ज़ल कहीं है:
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कबीर भजन
- कबीरदास | Kabirdas
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| उमरिया धोखे में खोये दियो रे। धोखे में खोये दियो रे। पांच बरस का भोला-भाला बीस में जवान भयो। तीस बरस में माया के कारण, देश विदेश गयो। उमर सब .... चालिस बरस अन्त अब लागे, बाढ़ै मोह गयो। धन धाम पुत्र के कारण, निस दिन सोच भयो।। बरस पचास कमर भई टेढ़ी, सोचत खाट परयो। लड़का बहुरी बोलन लागे, बूढ़ा मर न गयो।। बरस साठ-सत्तर के भीतर, केश सफेद भयो। वात पित कफ घेर लियो है, नैनन निर बहो। न हरि भक्ति न साधो की संगत, न शुभ कर्म कियो। कहै कबीर सुनो भाई साधो, चोला छुट गयो।। |
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युग-चेतना | कविता
- ओमप्रकाश वाल्मीकि | Om Prakash Valmiki
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| मैंने दुख झेले सहे कष्ट पीढ़ी-दर-पीढ़ी इतने फिर भी देख नहीं पाए तुम मेरे उत्पीड़न को इसलिए युग समूचा लगता है पाखंडी मुझको ।
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बिहारी के होली दोहे
- बिहारी | Bihari
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| होली पर बिहारी के कुछ दोहे
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बहुत वासनाओं पर मन से | गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| बहुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर, तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर । संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।
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कबीर दोहे -3
- कबीरदास | Kabirdas
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| (41) गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय॥
(42) गुरु कीजिए जानि के, पानी पीजै छानि । बिना विचारे गुरु करे, परे चौरासी खानि॥
(43) सतगुरू की महिमा अनंत, अनंत किया उपकार। लोचन अनंत उघाडिया, अनंत दिखावणहार॥
(44) गुरु किया है देह का, सतगुरु चीन्हा नाहिं । भवसागर के जाल में, फिर फिर गोता खाहि॥
(45) शब्द गुरु का शब्द है, काया का गुरु काय। भक्ति करै नित शब्द की, सत्गुरु यौं समुझाय॥
(46) बलिहारी गुर आपणैं, द्यौंहाडी कै बार। जिनि मानिष तैं देवता, करत न लागी बार।।
(47) कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और । हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर ॥
(48) जो गुरु ते भ्रम न मिटे, भ्रान्ति न जिसका जाय। सो गुरु झूठा जानिये, त्यागत देर न लाय॥
(49) यह तन विषय की बेलरी, गुरु अमृत की खान। सीस दिये जो गुरु मिलै, तो भी सस्ता जान॥
(50) गुरु लोभ शिष लालची, दोनों खेले दाँव। दोनों बूड़े बापुरे, चढ़ि पाथर की नाँव॥
गुरू महिमा पर कबीर दोहे (Kabir Dohe on Guru) |
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ताज़े-ताज़े ख़्वाब | ग़ज़ल
- कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
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| ताज़े-ताज़े ख़्वाब सजाये रखता है यानी इक उम्मीद जगाये रखता है
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किसी के दुख में .... | ग़ज़ल
- ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek
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| किसी के दुख में रो उट्ठूं कुछ ऐसी तर्जुमानी दे मुझे सपने न दे बेशक, मेरी आंखों को पानी दे
मुझे तो चिलचिलाती धूप में चलने की आदत है मेरे भगवान, मेरे शहर को शामें सुहानी दे
ये रद्दी बीनते बच्चे जो गुम कर आए हैं सपने किसी दिन के लिए तू इनको परियों की कहानी दे
ख़ुदाया, जी रहा हूं यूं तो मैं तेरे ज़माने में चराग़ों की तरह मिट जाऊं ऐसी ज़िन्दगानी दे
जिसे हम ओढ़ के करते थे अकसर प्यार की बातें तू सबकुछ छीन ले मेरा वही चादर पुरानी दे
मेरे भगवान, तुझसे मांगना अच्छा नहीं लगता अगर तू दे सके तो ख़ुश्क दरिया को रवानी दे
यहां इंसान कम, ख़रीदार आते हैं नज़र ज्यादा ये मैंने कब कहा था मुझको ऐसी राजधानी दे।
-ज्ञानप्रकाश विवेक
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जाहिल मेरे बाने
- भवानी प्रसाद मिश्र | Bhawani Prasad Mishra
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| मैं असभ्य हूँ क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूँ मैं असभ्य हूँ क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूँ मैं असभ्य क्योंकि चीरकर धरती धान उगाता हूँ मैं असभ्य हूँ क्योंकि ढोल पर बहुत जोर से गाता
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इस नदी की धार में | दुष्यंत कुमार
- दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
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| इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है एक चिनगारी कहीं से ढूँढ लाओ दोस्तों इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है एक खंडहर के हृदय-सी, एक जंगली फूल-सी आदमी की पीर गूंगी ही सही, गाती तो है एक चादर साँझ ने सारे नगर पर डाल दी यह अँधेरे की सड़क उस भोर तक जाती तो है निर्वसन मैदान में लेटी हुई है जो नदी पत्थरों से, ओट में जा-जाके बतियाती तो है दुख नहीं कोई कि अब उपलब्धियों के नाम पर और कुछ हो या न हो, आकाश-सी छाती तो है
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मैं रहूँ या न रहूँ | ग़ज़ल
- राजगोपाल सिंह
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| मैं रहूँ या न रहूँ, मेरा पता रह जाएगा शाख़ पर यदि एक भी पत्ता हरा रह जाएगा
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कड़वा सत्य | कविता
- विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar
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जै जै प्यारे भारत देश
- महावीर प्रसाद द्विवेदी | Mahavir Prasad Dwivedi
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| जै जै प्यारे देश हमारे तीन लोक में सबसे न्यारे । हिमगिरी-मुकुट मनोहर धारे जै जै सुभग सुवेश ।। जै जै... ।।१।। हम बुलबुल तू गुल है प्यारा तू सुम्बुल, तू देश हमारा । हमने तन-मन तुझ पर वारा तेज पुंज-विशेष ।। जै जै ... ।।२।। तुझ पर हम निसार हो जावें तेरी रज हम शीश चढ़ावें । जगत पिता से यही मनावें होवे तू देशेश ।। जै जै... ।।३।। जै जै हे देशों के स्वामी नामवरों में भी हे नामी । हे प्रणम्य तुझको प्रणमामी जीते रहो हमेश ।। जै जै... ।।४।। आँख अगर कोई दिखलावे उसका दर्प-दलन हो जावे । फल अपने कर्मों का पावे बने नामनि शेष ।। जै जै... ।।५।। बल दो हमें ऐक्य सिखलाओ सँभलो देश होश में आवो । मातृभूमि-सौभाग्य बढ़ाओ मेटो सकल कलेश ।। जै जै... ।।६।। हिन्दू मुसल्मान ईसाई यश गावें सब भाई-भाई । सब के सब तेरे शैदाई फूलो-फलो स्वदेश ।। जै जै... ।।७।। इष्टदेव आधार हमारे तुम्हीं गले के हार हमारे । भुक्ति-मुक्ति के द्वार हमारे जै जै जै जै देश ।। जै जै... ।।८।।
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मैं दिल्ली हूँ | दो
- रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
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| जब चाहा मैंने तूफ़ानों के, अभिमानों को कुचल दिया । हँसकर मुरझाई कलियों को, मैंने उपवन में बदल दिया ।।
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भारत वर्ष की श्रेष्ठता | भारत-भारती
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| भू-लोक का गौरव प्रकृति का पुण्य लीला-स्थल कहाँ ? फैला मनोहर गिरी हिमालय और गंगाजल जहाँ । सम्पूर्ण देशों से अधिक किस देश का उत्कर्ष है , उसका कि जो ऋषिभूमि है, वह कौन ? भारत वर्ष है ।।१५।।
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अँधेरे में
- गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh
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| जिंदगी के... कमरों में अँधेरे लगाता है चक्कर कोई एक लगातार; आवाज पैरों की देती है सुनाई बार-बार... बार-बार, वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता, किंतु वह रहा घूम तिलस्मी खोह में गिरफ्तार कोई एक, भीत-पार आती हुई पास से, गहन रहस्यमय अंधकार ध्वनि-सा अस्तित्व जनाता अनिवार कोई एक, और मेरे हृदय की धक्-धक् पूछती है - वह कौन सुनाई जो देता, पर नहीं देता दिखाई ! इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से फूले हुए पलस्तर, खिरती है चूने-भरी रेत खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह - खुद-ब-खुद कोई बड़ा चेहरा बन जाता है, स्वयमपि मुख बन जाता है दिवाल पर, नुकीली नाक और भव्य ललाट है, दृढ़ हनु कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति। कौन वह दिखाई जो देता, पर नहीं जाना जाता है ! कौन मनु ?
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कबीर की कुंडलियां - 1
- कबीरदास | Kabirdas
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| गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पांय बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो दिखाय गोविन्द दियो दिखाय ज्ञान का है भण्डारा सत मारग पर पांव अपन गुरु ही ने डारा गोबिन्द लियो बिठाय हिये खुद गुरु के चरनन माथा दीन्हा टेक कियो कुल जीवन अर्पन
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परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 2
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| (खण्ड दो)
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माँ | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| इस धरती पर अपने शहर में मैं एक उपेक्षित उपन्यास के बीच में एक छोटे-से शब्द-सा आया था वह उपन्यास एक ऊँचा पहाड़ था मैं जिसकी तलहटी में बसा एक छोटा-सा गाँव था वह उपन्यास एक लंबी नदी था मैं जिसके बीच में स्थित एक सिमटा हुआ द्वीप था वह उपन्यास पूजा के समय बजता हुआ एक ओजस्वी शंख था मैं जिसकी ध्वनि-तरंग का हज़ारवाँ हिस्सा था हालाँकि वह उपन्यास विधाता की लेखनी से उपजी एक सशक्त रचना थी आलोचकों ने उसे कभी नहीं सराहा जीवन के इतिहास में उसका उल्लेख तक नहीं हुआ आख़िर क्या वजह है कि हम और आप जिन महान् उपन्यासों के शब्द बनकर इस धरती पर आए उन उपन्यासों को कभी कोई पुरस्कार नहीं मिला ?
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हिन्दू या मुस्लिम के | ग़ज़ल
- अदम गोंडवी
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| हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िए
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सीता का हरण होगा
- उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans
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| कब तक यूं बहारों में पतझड़ का चलन होगा? कलियों की चिता होगी, फूलों का हवन होगा ।
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जानकी के लिए
- राजेश्वर वशिष्ठ
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| मर चुका है रावण का शरीर स्तब्ध है सारी लंका सुनसान है किले का परकोटा कहीं कोई उत्साह नहीं किसी घर में नहीं जल रहा है दिया विभीषण के घर को छोड़ कर।
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नव वर्ष
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| नव वर्ष हर्ष नव जीवन उत्कर्ष नव।
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कोई फिर कैसे.... | ग़ज़ल
- कुँअर बेचैन
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| कोई फिर कैसे किसी शख़्स की पहचान करे सूरतें सारी नकाबों में सफ़र करती हैं
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हे दयालु ईश मेरे दुख मेरे हर लीजिए | भजन
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| हे दयालु ईश मेरे दुख मेरे हर लीजिए दूं परीक्षा लंबी कितनी, कुछ तो करुणा कीजिए। हे दयालु ईश मेरे दुख मेरे हर लीजिए ।।
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सागर के वक्ष पर
- स्वामी विवेकानंद
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| नील आकाश में बहते हैं मेघदल, श्वेत कृष्ण बहुरंग, तारतम्य उनमें तारल्य का दीखता, पीत भानु-मांगता है विदा, जलद रागछटा दिखलाते ।
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भूमण्डलीय तापक्रम वृद्धि
- शारदा मोंगा
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| प्रश्न चिन्ह? खतरा अत्यधिक, जलप्रदूषण के खतरों से, जीव जगत को बचावो, पानी व्यर्थ न बहावो, पानी है जीवनदाता, पानी की हर बूँद बचाओ.
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अरे भीरु
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| अरे भीरु, कुछ तेरे ऊपर, नहीं भुवन का भार इस नैया का और खिवैया, वही करेगा पार । आया है तूफ़ान अगर तो भला तुझे क्या आर चिन्ता का क्या काम चैन से देख तरंग-विहार । गहन रात आई, आने दे, होने दे अंधियार-- इस नैया का और खिवैया वही करेगा पार ।
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हरि बिन कछू न सुहावै | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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नर हो न निराश करो मन को
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| नर हो न निराश करो मन को कुछ काम करो कुछ काम करो जग में रहके निज नाम करो यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो कुछ तो उपयुक्त करो तन को नर हो न निराश करो मन को । संभलो कि सुयोग न जाए चला कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला समझो जग को न निरा सपना पथ आप प्रशस्त करो अपना अखिलेश्वर है अवलम्बन को नर हो न निराश करो मन को । जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो उठके अमरत्व विधान करो दवरूप रहो भव कानन को नर हो न निराश करो मन को । निज गौरव का नित ज्ञान रहे हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे सब जाय अभी पर मान रहे मरणोत्तर गुंजित गान रहे कुछ हो न तजो निज साधन को नर हो न निराश करो मन को ।
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मुक्तिबोध की कविता
- गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh
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| मैं बना उन्माद री सखि, तू तरल अवसाद प्रेम - पारावार पीड़ा, तू सुनहली याद तैल तू तो दीप मै हूँ, सजग मेरे प्राण। रजनि में जीवन-चिता औ' प्रात मे निर्वाण शुष्क तिनका तू बनी तो पास ही मैं धूल आम्र में यदि कोकिला तो पास ही मैं हूल फल-सा यदि मैं बनूं तो शूल-सी तू पास विँधुर जीवन के शयन को तू मधुर आवास सजल मेरे प्राण है री, सजग मेरे प्राण तू बनी प्राण! मै तो आलि चिर-म्रियमाण।
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मैं अपनी ज़िन्दगी से | ग़ज़ल
- कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
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| मैं अपनी ज़िन्दगी से रूबरू यूँ पेश आता हूँ ग़मों से गुफ़्तगू करता हूँ लेकिन मुस्कुराता हूँ
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ऋतु फागुन नियरानी हो
- कबीरदास | Kabirdas
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| ऋतु फागुन नियरानी हो, कोई पिया से मिलावे । सोई सुदंर जाकों पिया को ध्यान है, सोई पिया की मनमानी, खेलत फाग अगं नहिं मोड़े, सतगुरु से लिपटानी । इक इक सखियाँ खेल घर पहुँची, इक इक कुल अरुझानी । इक इक नाम बिना बहकानी, हो रही ऐंचातानी ।।
पिय को रूप कहाँ लगि बरनौं, रूपहि माहिं समानी । जौ रँगे रँगे सकल छवि छाके, तन- मन सबहि भुलानी। यों मत जाने यहि रे फाग है, यह कछु अकथ- कहानी । कहैं कबीर सुनो भाई साधो, यह गति विरलै जानी ।।
- कबीर |
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मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ | दुष्यंत कुमार
- दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
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| मैं जिसे ओढ़ता -बिछाता हूँ वो गज़ल आपको सुनाता हूँ।
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अजनबी नज़रों से | ग़ज़ल
- राजगोपाल सिंह
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| अजनबी नज़रों से अपने आप को देखा न कर आइनों का दोष क्या है? आइने तोड़ा न कर
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चीन्हे किए अचीन्हे कितने | गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| हुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर, तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर । संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।
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शब्द और शब्द | कविता
- विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar
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हमारा उद्भव | भारत-भारती
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| शुभ शान्तिमय शोभा जहाँ भव-बन्धनों को खोलती, हिल-मिल मृगों से खेल करती सिंहनी थी डोलती! स्वर्गीय भावों से भरे ऋषि होम करते थे जहाँ, उन ऋषिगणों से ही हमारा था हुआ उद्भव यहाँ ।। १८ ।।
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मैं दिल्ली हूँ | तीन
- रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
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| गूंजी थी मेरी गलियों में, भोले बचपन की किलकारी । छूटी थी मेरी गलियों में, चंचल यौवन की पिचकारी ॥
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माँ पर दोहे | मातृ-दिवस
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| जब तक माँ सिर पै रही बेटा रहा जवान। उठ साया जब तै गया, लगा बुढ़ापा आन॥
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परशुराम की प्रतीक्षा | खण्ड 3
- रामधारी सिंह दिनकर | Ramdhari Singh Dinkar
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| (खण्ड तीन)
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प्राण वन्देमातरम्
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| हम भारतीयों का सदा है, प्राण वन्देमातरम् । हम भूल सकते है नही शुभ तान वन्देमातरम् । ।
देश के ही अन्नजल से बन सका यह खून है । नाड़ियों में हो रहा संचार वन्देमातरम् । ।
स्वाधीनता के मंत्र का है सार वन्देमातरम् । हर रोम से हर बार हो उबार वन्देमातरम् ।।
घूमती तलवार हो सरपर मेरे परवा नही । दुश्मनो देखो मेरी ललकार वन्देमातरम् ।।
धार खूनी खच्चरों की बोथरी हो जायगी । जब करोड़ों की पड़े झंकार वन्देमातरम् ।।
टांग दो सूली पै मुझको खाल मेरी खींच लो । दम निकलते तक सुनो हुंकार वन्देमातरम् । ।
देश से हम को निकालो भेज दो यमलोक को । जीत ले संसार को गुंजार वन्देमातरम् ।।
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काजू भुने पलेट में | ग़ज़ल
- अदम गोंडवी
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| काजू भुने पलेट में, विस्की गिलास में उतरा है रामराज विधायक निवास में
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लौटना | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| बरसों बाद लौटा हूँ अपने बचपन के स्कूल में जहाँ बरसों पुराने किसी क्लास-रूम में से झाँक रहा है स्कूल-बैग उठाए एक जाना-पहचाना बच्चा
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सपने अगर नहीं होते | ग़ज़ल
- उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans
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| मन में सपने अगर नहीं होते, हम कभी चाँद पर नहीं होते ।
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राम का नाम बड़ा सुखदाई | भजन
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| राम का नाम बड़ा सुखदाई तेरे प्रेम में हुआ शौदाई।
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मैं तटनी तरल तरंगा, मीठे जल की निर्मल गंगा
- शारदा मोंगा
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| मैं तटनी तरल तरंगा मीठे जल की निर्मल गंगा
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अनसुनी करके
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| अनसुनी करके तेरी बात न दे जो कोई तेरा साथ तो तुही कसकर अपनी कमर अकेला बढ़ चल आगे रे-- अरे ओ पथिक अभागे रे ।
देखकर तुझे मिलन की बेर सभी जो लें अपने मुख फेर न दो बातें भी कोई क रे सभय हो तेरे आगे रे-- अरे ओ पथिक अभागे रे ।
तो अकेला ही तू जी खोल सुरीले मन मुरली के बोल अकेला गा, अकेला सुन । अरे ओ पथिक अभागे रे अकेला ही चल आगे रे ।
जायँ जो तुझे अकेला छोड़ न देखें मुड़कर तेरी ओर बोझ ले अपना जब बढ़ चले गहन पथ में तू आगे रे-- अरे ओ पथिक अभागे रे ।
तो तुही पथ के कण्टक क्रूर अकेला कर भय-संशय दूर पैर के छालों से कर चूर । अरे ओ पथिक अभागे रे अकेला ही चल आगे रे ।
और सुन तेरी करुण पुकार अंधेरी पावस-निशि में द्वार न खोलें ही न दिखावें दीप न कोई भी जो जागे रे- अरे ओ पथिक अभागे रे ।
तो तुही वज्रानल में हाल जलाकर अपना उर-कंकाल अकेला जलता रह चिर काल । अरे ओ पथिक अभागे रे अकेला बढ़ चल आगे रे ।
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कवि
- भवानी प्रसाद मिश्र | Bhawani Prasad Mishra
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| कलम अपनी साध और मन की बात बिल्कुल ठीक कह एकाध।
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भगत सिंह - गीत
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| फांसी का झूला झूल गया मर्दाना भगत सिंह । दुनियां को सबक दे गया मस्ताना भगत सिंह ।। फांसी का झूला......
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झूठी जगमग जोति | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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भरोसा इस क़दर मैंने | ग़ज़ल
- कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
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| भरोसा इस क़दर मैंने तुम्हारे प्यार पर रक्खा शरारों पर चला बेख़ौफ़, सर तलवार पर रक्खा
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मौज-मस्ती के पल भी आएंगे | ग़ज़ल
- राजगोपाल सिंह
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| मौज-मस्ती के पल भी आएंगे पेड़ होंगे तो फल भी आएंगे
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विपदाओं से मुझे बचाओ, यह न प्रार्थना | गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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हमारे पूर्वज | भारत-भारती
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| उन पूर्वजों की कीर्ति का वर्णन अतीव अपार है, गाते नहीं उनके हमीं गुण गा रहा संसार है । वे धर्म पर करते निछावर तृण-समान शरीर थे, उनसे वही गम्भीर थे, वरवीर थे, ध्रुव धीर थे ।। १९।।
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मैं दिल्ली हूँ | चार
- रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
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| क्यों नाम पड़ा मेरा 'दिल्ली', यह तो कुछ याद न आता है । पर बचपन से ही दिल्ली, कहकर मझे पुकारा जाता है ॥
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छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम्
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| छीन सकती है नहीं सरकार वन्देमातरम् । हम गरीबों के गले का हार वन्देमातरन् ॥१॥
सर चढ़ों के सर में चक्कर उस समय आता जरूर । कान मे पहुँची जहाँ झन्कार वन्देमातरम् ॥२॥
हम वही है जो कि होना चाहिए इस वक़्त पर । आज तो चिल्ला रहा संसार वन्देमातरम् ॥३॥
जेल मे चक्की घसीटें, भूख से ही मर रहा । उस समय भी बक रहा बेज़ार वन्देमातरम् ॥४॥
मौत के मुहँ पर खड़ा है, कह रहा जल्लाद से- भोंक दे सीने में वह तलवार वन्दे मातरम ॥५॥
डाक्टरों ने नब्ज देखी, सिर हिला कर कह दिया । हो गया इसको तो यह आज़ार वन्देमातरम् ॥६॥
ईद, होली, दसहरा, सुबरात से भी सौगुना । है हमारा लाड़ला त्योहार वन्देमातरम् ॥७॥
जालिमों का जुल्म भी काफूर सा उड़ जायेगा । फैसला होगा सरे दरबार- वन्देमातरम् ॥ ८ ॥
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घर में ठंडे चूल्हे पर | ग़ज़ल
- अदम गोंडवी
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| घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है बताओ कैसे लिख दूँ धूप फाल्गुन की नशीली है
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एक ठहरी हुई उम्र | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| मैं था तब इक्कीस का और वह थी अठारह की
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जी रहे हैं लोग कैसे | ग़ज़ल
- उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans
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| जी रहे हैं लोग कैसे आज के वातावरण में, नींद में दु:स्वप्न आते, भय सताता जागरण में।
बेशरम जब आँख हो तो सिर्फ घूंघट क्या करेगा ? आदमी नंगा खड़ा है सभ्यता के आवरण में ।
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जग में अजब है तेरा नाम | भजन
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| जग में अजब है तेरा नाम बिगड़े संवारे तू सब काम। जग में अजब है तेरा नाम॥
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उर्मिला
- राजेश्वर वशिष्ठ
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| टिमटिमाते दियों से जगमगा रही है अयोध्या सरयू में हो रहा है दीप-दान संगीत और नृत्य के सम्मोहन में हैं सारे नगरवासी हर तरफ जयघोष है ---- अयोध्या में लौट आए हैं राम! अंधेरे में डूबा है उर्मिला का कक्ष अंधेरा जो पिछले चौदह वर्षों से रच बस गया है उसकी आत्मा में जैसे मंदिर के गर्भ-गृह में जमता चला जाता है सुरमई धुँआ और धीमा होता जाता है प्रकाश! वह किसी मनस्विनी-सी उदास ताक रही हैं शून्य में सोचते हुए --- राम और सीता के साथ अवश्य ही लौट आए होंगे लक्ष्मण पर उनके लिए उर्मिला से अधिक महत्वपूर्ण है अपने भ्रातृधर्म का अनुशीलन उन्हें अब भी तो लगता होगा ---- हमारे समाज में स्त्रियाँ ही तो बनती हैं धर्मध्वज की यात्रा में अवांछित रुकावट --- सोच कर सिसक उठती है उर्मिला चुपके से काजल के साथ बह जाती है नींद जो अब तक उसके साथ रह रही थी सहचरी-सी! अतीत घूमता है किसी चलचित्र-सा गाल से होकर टपकते आँसुओं में बहने लगते हैं कितने ही बिम्ब!
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रात भर का वह गहरा अँधेरा
- शारदा मोंगा
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| रात भर का वह गहरा अँधेरा, गहन अवसाद था बहुतेरा,
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शहीद भगत सिंह
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| भारत के लिये तू हुआ बलिदान भगत सिंह । था तुझको मुल्को-कौम का अभिमान भगत सिंह ।।
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कबीर दोहे -4
- कबीरदास | Kabirdas
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अब तो मेरा राम | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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कबीर दोहे -4
- कबीरदास | Kabirdas
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| समझाये समझे नहीं, पर के साथ बिकाय । मैं खींचत हूँ आपके, तू चला जमपुर जाए ॥ 51 ॥
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पुराने ख़्वाब के फिर से | ग़ज़ल
- कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
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| पुराने ख़्वाब के फिर से नये साँचे बदलती है सियासत रोज़ अपने खेल में पाले बदलती है
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टूट गयी खटिया
- शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
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| हे वोटर महाराज, आप नहीं आये आखिर अपनी हरकत से बाज़ नोट हमारे दाब लिये और वोट नहीं डाला दिखा नर्मदा घाट सौंप दी हाथों में माला डूब गये आंसू में मेरे छप्पर और छानी ऊपर से तुम दिखलाते हो चुल्लू भर पानी मिले ना लड्डू लोकतंत्र के दाव गया खाली सूख गई क़िस्मत की बगिया रूठ गया माली बाप-कमाई साफ़ हो गई हाफ़ हुई काया लोकतंत्र के स्वप्न महल का खिसक गया पाया चाट गई सब चना चबैना ये चुनाव चकिया गद्दी छीनी प्रतिद्वन्दी ने चमचों ने तकिया चाय पानी और बोतलवाले करते हैं फेरे बीस हज़ार, बीस खातों में चढे नाम मेरे झंडा गया भाड़ में मेरा, हाय पड़ा महंगा बच्चो ने चड्डी सिलवा ली, बीवी ने लहंगा टूट गई रिश्वत की डोरी, डूब गई लुटिया बिछने से पहले ही मेरी टूट गई खटिया
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विकसित करो हमारा अंतर | गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| विकसित करो हमारा अंतर अंतरतर हे !
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आदर्श | भारत-भारती
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| आदर्श जन संसार में इतने कहाँ पर हैं हुए ? सत्कार्य्य-भूषण आर्य्यगण जितने यहाँ पर हैं हुए । हैं रह गये यद्यपि हमारे गीत आज रहे सहे । पर दूसरों के भी वचन साक्षी हमारे हो रहे ।। ३० ।।
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शब्द वन्देमातरम्
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| फ़ैला जहाँ में शोर मित्रो! शब्द वन्देमातरम् । हिंद हो या मुसलमान सब कहते वन्देमातरम् ॥
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जिस्म क्या है | ग़ज़ल
- अदम गोंडवी
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| जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये
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हर बार | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| हर बार अपनी तड़पती छाया को अकेला छोड़ कर लौट आता हूँ मैं जहाँ झूठ है , फ़रेब है , बेईमानी है , धोखा है -- हर बार अपने अस्तित्व को खींच कर ले आता हूँ दर्द के इस पार जैसे-तैसे एक नई शुरुआत करने कुछ नए पल चुरा कर फिर से जीने की कोशिश में हर बार ढहता हूँ , बिखरता हूँ किंतु हर हत्या के बाद वहीं से जी उठता हूँ जहाँ से मारा गया था जहाँ से तोड़ा गया था वहीं से घास की नई पत्ती-सा फिर से उग आता हूँ शिकार किए जाने के बाद भी हर बार एक नई चिड़िया बन जाता हूँ एक नया आकाश नापने के लिए ...
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काग़ज़ी कुछ कश्तियाँ | ग़ज़ल
- राजगोपाल सिंह
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| काग़ज़ी कुछ कश्तियाँ नदियों में तैराते रहे जब तलक़ ज़िन्दा रहे बचपन को दुलराते रहे
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मैं दिल्ली हूँ | पाँच
- रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
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| प्राणों से हाथ पड़ा धोना, मेरे कितने ही लालों को । बच्चों के प्राणों को हरते, देखा शैतानी भालों को ।।
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कबीर की ज्ञान, भक्ति और नीति साखियाँ
- कबीरदास | Kabirdas
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| यहाँ कबीर की ज्ञान, भक्ति और नीति के विषयों से सम्बद्ध साखियाँ संकलित हैं। इनमें आत्मा की अमरता, संसार की असारता, गुरु की महिमा तथा दया, सन्तोष और विनम्रता जैसे सद्गुणों पर बल दिया गया है।
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म्हारे तो गिरधर गोपाल | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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| म्हारे तो गिरधर गोपाल म्हारे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई॥ जाके सिर मोर मुगट मेरो पति सोई। तात मात भ्रात बंधु आपनो न कोई॥ छाँडि दई कुद्दकि कानि कहा करिहै कोई॥ संतन ढिग बैठि बैठि लोकलाज खोई॥ चुनरीके किये टूक ओढ लीन्हीं लोई। मोती मूँगे उतार बनमाला पोई॥ अंसुवन जू सींचि सींचि प्रेम बेलि बोई। अब तो बेल फैल गई आणँद फल होई॥ भगति देखि राजी हुई जगत देखि रोई। दासी मीरा लाल गिरधर तारो अब मोही॥
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कवि फ़रोश | पैरोडी
- शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
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| जी हाँ, हुज़ूर, मैं कवि बेचता हूँ मैं तरह-तरह के कवि बेचता हूँ मैं किसिम-किसिम के कवि बेचता हूँ।
जी, वेट देखिए, रेट बताऊं मैं पैदा होने की डेट बताऊं मैं जी, नाम बुरा, उपनाम बताऊं मैं जी, चाहे तो बदनाम बताऊं मैं जी, इसको पाया मैंने दिल्ली में जी, उसको पकड़ा त्रिचनापल्ली में जी, कलकत्ते में इसको घेरा है जी, वह बंबइया अभी बछेरा है जी, इसे फंसाया मैंने पूने में जी, तन्हाई में, उसको सूने में ये बिना कहे कविता सुनवाता है जी, उसे सुनो, तो चाय पिलाता है जो, लोग रह गए धँधे में कच्चे जी, उन लोगों ने बेच दिए बच्चे जी, हुए बिचारे कुछ ऐसे भयभीत जी, बेच दिए घबरा के अपने गीत।
- मैं सोच समझ कर कवि बेचता हूँ
- जी हाँ, हुज़ूर, मैं कवि बेचता हूँ।
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आर्य-स्त्रियाँ
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| केवल पुरुष ही थे न वे जिनका जगत को गर्व था, गृह-देवियाँ भी थीं हमारी देवियाँ ही सर्वथा । था अत्रि-अनुसूया-सदृश गार्हस्थ्य दुर्लभ स्वर्ग में, दाम्पत्य में वह सौख्य था जो सौख्य था अपवर्ग में ।। ३९ ।।
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आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख | ग़ज़ल
- दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
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| आज सड़कों पर लिखे हैं सैंकड़ों नारे न देख घर अँधेरा देख तू, आकाश के तारे न देख।
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होली व फाग के दोहे
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| भर दीजे गर हो सके, जीवन अंदर रंग। वरना तो बेकार है, होली का हुड़दंग॥
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जो डलहौज़ी न कर पाया | ग़ज़ल
- अदम गोंडवी
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| जो डलहौज़ी न कर पाया वो ये हुक़्क़ाम कर देंगे कमीशन दो तो हिन्दोस्तान को नीलाम कर देंगे
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छटपटाहट भरे कुछ नोट्स | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| ( एक ) आज चारो ओर की बेचैनी से बेपरवाह जो लम्बी ताने सो रहे हैं वे सुखी हैं जो छटपटा कर जाग रहे हैं वे दुखी हैं ( दो ) आज हमारी बनाई इमारतें कितनी ऊँची हो गई हैं लेकिन हमारा अपना क़द कितना घट गया है ( तीन ) आज विश्व एक ग्लोबीय गाँव बन गया है हमने स्पेस-शटल बुलेट और शताब्दी रेलगाड़ियाँ बना ली हैं एक जगह से दूसरी जगह की दूरी कितनी कम हो गई है लेकिन आदमी और आदमी के बीच की दूरी कितनी बढ़ गई है ( चार ) आज दीयों के उजाले कितने धुँधले हो गए हैं आज क़तार में खड़ा आख़िरी आदमी कितना अकेला है ( पाँच ) आज लम्बी-चौड़ी गाड़ियों में घूम रहे हैं छोटे लोग बड़े-बड़े बंगलों में रह रहे हैं लघु-मानव बौने लोग डालने लगे हैं लम्बी परछाइयाँ
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बदलीं जो उनकी आँखें
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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| बदलीं जो उनकी आँखें, इरादा बदल गया । गुल जैसे चमचमाया कि बुलबुल मसल गया ।
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जितने पूजाघर हैं | ग़ज़ल
- राजगोपाल सिंह
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| जितने पूजाघर हैं सबको तोड़िये आदमी को आदमी से जोड़िये
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मक़सद
- राजगोपाल सिंह
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| उनका मक़सद था आवाज़ को दबाना अग्नि को बुझाना सुगंध को क़ैद करना
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रंग भरी राग | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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मेरो दरद न जाणै कोय
- मीराबाई | Meerabai
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| हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय। घायल की गति घायल जाणै जो कोई घायल होय। जौहरि की गति जौहरी जाणै की जिन जौहर होय। सूली ऊपर सेज हमारी सोवण किस बिध होय। गगन मंडल पर सेज पिया की किस बिध मिलणा होय। दरद की मारी बन-बन डोलूं बैद मिल्या नहिं कोय। मीरा की प्रभु पीर मिटेगी जद बैद सांवरिया होय।
- मीरा बाई
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हमारी सभ्यता
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| शैशव-दशा में देश प्राय: जिस समय सब व्याप्त थे, निःशेष विषयों में तभी हम प्रौढ़ता को प्राप्त थे । संसार को पहले हमीं ने ज्ञान-भिक्षा दान की, आचार की, व्यवहार की, व्यापार की, विज्ञान की ।। ४५ ।।
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कबीर की कुंडलियां
- कबीरदास | Kabirdas
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| कबीर ने कुंडलियां भी कही हों इसका कहीं उल्लेख नहीं मिलता लेकिन कबीर की कुंडलियां भी प्रचलित हैं। ये कुंडलियां शायद उनके प्रशंसकों या उनके शिष्यों ने कबीर की साखियों को आधार बना लिखी हों। यदि आपके पास इसकी और जानकारी हो या आपने इसपर शोध किया हो तो कृपया जानकारी साझा करें। |
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कोई और | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| एक सुबह उठता हूँ और हर कोण से ख़ुद को पाता हूँ अजनबी आँखों में पाता हूँ एक अजीब परायापन अपनी मुस्कान लगती है न जाने किसकी बाल हैं कि पहचाने नहीं जाते अपनी हथेलियों में किसी और की रेखाएँ पाता हूँ मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि ऐसा भी होता है हम जी रहे होते हैं किसी और का जीवन हमारे भीतर कोई और जी रहा होता है
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किनारा वह हमसे
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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| किनारा वह हमसे किये जा रहे हैं। दिखाने को दर्शन दिये जा रहे हैं।
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लूटकर ले जाएंगे | ग़ज़ल
- राजगोपाल सिंह
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| लूटकर ले जाएंगे सब देखते रह जाओगे पत्थरों की वन्दना करने से तुम क्या पाओगे
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कुछ दोहे
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| आँखों से रूकता नहीं बहता उनके नीर । अपनी-अपनी है पड़ी, कौन बँधाये धीर ।।
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आज के दोहे
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| हमने चुप्पी तान ली, नहीं करेंगे जंग । फिर भी दुनिया ना हटे, करती रहती तंग ।।
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राग होरी सिन्दूरा | मीरा के पद
- मीराबाई | Meerabai
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श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया
- मीराबाई | Meerabai
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श्याम पिया मोरी रंग दे चुनरिया ।। टेर ।।
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मन्त्र वन्देमातरम्
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| शुद्ध सुन्दर अति मनोहर मन्त्र वन्देमातरम् । मृदुल सुखकर दुःसहारी शब्द वन्देमातरम् ॥
मन्त्र यह है, तन्त्र यह है, यन्त्र वन्देमातरम् । सिद्धिदायक, बुद्धिदायक एक वन्देमातरम् ।।
ओजमय बल कान्तिमय, सुखशान्ति वन्देमातरम् । मति प्रदायक अति सहायक मन्त्र वन्देमातरम् ।।
हर घड़ी हर बार हो हर ठाम वन्द्देमातरम् । हर दम हमेशा बोलिये प्रिय मन्त्र वन्देमातरम् ॥
हर काम मे हर बात में दिन रात वन्देमातरम् । जपिये निरन्तर शुद्ध मन से नित्य वन्देमातरम ॥
सोते समय, खाते समय, कल गान वन्देमातरम् । आठो पहर दिल मे उठे मृदु तान वन्देमानरम् ।।
मुख में, हृदय में रात दिन हो जाप्य वन्देमातरन् । नाड़ियों के रक्त का संचार वन्देमातरम्।।
तेग़ से सिर भी कटे, भूलो न वन्देमातरम् । मौत की घड़ियां गुँजादो शुद्ध वन्देमातरम् ॥
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जब दुख मेरे पास बैठा होता है | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| जब दुख मेरे पास बैठा होता है मैं सब कुछ भूल जाता हूँ पता नहीं सूरज और चाँद कब आते हैं और कब ओझल हो जाते हैं बादल आते भी हैं या नहीं क्या मालूम हवा गुनगुना रही होती है या शोक-गीत गा रही होती है न जाने दिशाएँ सूखे बीज-सी बज रही होती हैं या चुप होती हैं विसर्जित कर अपना सारा शोर-शराबा जब दुख मेरे पास बैठा होता है मुझे अपनी परछाईं भी नज़र नहीं आती केवल एक सलेटी अहसास होता है शिराओंं में इस्पात के भर जाने का केवल एक पीली गंध होती है भीतर कुछ सड़ जाने की और पुतलियाँ भारी हो जाती हैं न जाने किन दृश्यों के बोझ से
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कबीर की साखियां | संकलन
- कबीरदास | Kabirdas
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| कबीर की साखियां बहुत लोकप्रिय हैं। यह पृष्ठ कबीर का साखी संग्रह है।
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बग़ैर बात कोई | ग़ज़ल
- राजगोपाल सिंह
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| बग़ैर बात कोई किसका दुख बँटाता है वो जानता है मुझे इसलिए रुलाता है
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होली - मैथिलीशरण गुप्त
- मैथिलीशरण गुप्त | Mathilishran Gupt
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| जो कुछ होनी थी, सब होली! धूल उड़ी या रंग उड़ा है, हाथ रही अब कोरी झोली। आँखों में सरसों फूली है, सजी टेसुओं की है टोली। पीली पड़ी अपत, भारत-भू, फिर भी नहीं तनिक तू डोली !
- मैथिलीशरण गुप्त
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ये सारा जिस्म झुककर
- दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
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| ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा मैं सज़दे में नहीं था आप को धोखा हुआ होगा
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आजकल हम लोग ... | ग़ज़ल
- राजगोपाल सिंह
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| आजकल हम लोग बच्चों की तरह लड़ने लगे चाबियों वाले खिलौनों की तरह लड़ने लगे ठूँठ की तरह अकारण ज़िंदगी जीते रहे जब चली आँधी तो पत्तों की तरह लड़ने लगे
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होरी खेलत हैं गिरधारी
- मीराबाई | Meerabai
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| होरी खेलत हैं गिरधारी। मुरली चंग बजत डफ न्यारो। संग जुबती ब्रजनारी॥
चंदन केसर छिड़कत मोहन अपने हाथ बिहारी।
भरि भरि मूठ गुलाल लाल संग स्यामा प्राण पियारी। गावत चार धमार राग तहं दै दै कल करतारी॥
फाग जु खेलत रसिक सांवरो बाढ्यौ रस ब्रज भारी। मीराकूं प्रभु गिरधर मिलिया मोहनलाल बिहारी॥
- मीरा बाई
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गुजरात : 2002 | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| जला दिए गए मकान में मैं नमाज़ पढ़ रहा हूँ उस मकान में जो अब नहीं है जिसे दंगाइयों ने जला दिया था वहाँ जहाँ कभी मेरे अपनों की चहल-पहल थी उस मकान में अब कोई नहीं है दरअसल वह मकान भी अब नहीं है जला दिए गए उसी नहीं मौजूद मकान में मैं नमाज़ पढ़ रहा हूँ यह सर्दियों का एक बिन चिड़ियों वाला दिन है जब सूरज जली हुई रोटी-सा लग रहा है और शहर से संगीत नदारद है उस जला दिए गए मकान में एक टूटा हुआ आइना है मैं जिसके सामने खड़ा हूँ लेकिन जिसमें अब मेरा अक्स नहीं है आप समझ रहे हैं न ? जला दिए गए उसी नहीं मौजूद मकान में मैं लौटता हूँ बार-बार वह मैं जो दरअसल अब नहीं हूँ क्योंकि उस मकान में अपनों के साथ मैं भी जला दिया गया था
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पांच कविताएं | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| विडम्बना कितनी रोशनी है फिर भी कितना अँधेरा है कितनी नदियाँ हैं फिर भी कितनी प्यास है कितनी अदालतें हैं फिर भी कितना अन्याय है कितने ईश्वर हैं फिर भी कितना अधर्म है कितनी आज़ादी है फिर भी कितने खूँटों से बँधे हैं हम
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खेलो रंग अबीर उडावो - होली कविता
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
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| खेलो रंग अबीर उड़ावो लाल गुलाल लगावो । पर अति सुरंग लाल चादर को मत बदरंग बनाओ । न अपना रग गँवाओ ।
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कर्मवीर
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
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| देख कर बाधा विविध बहु विघ्न घबराते नहीं रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले सब जगह सब काल में वे ही मिले फूले फले । आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही मानते जो भी हैं सुनते हैं सदा सबकी कही जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही भूल कर वे दूसरों का मुँह कभी तकते नहीं कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं । जो कभी अपने समय को यों बिताते हैं नहीं काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं आज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं यत्न करने से कभी जो जी चुराते हैं नहीं बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिए वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए । व्योम को छूते हुए दुर्गम पहाड़ों के शिखर वे घने जंगल जहाँ रहता है तम आठों पहर गर्जते जल-राशि की उठती हुई ऊँची लहर आग की भयदायिनी फैली दिशाओं में लपट ये कंपा सकती कभी जिसके कलेजे को नहीं भूलकर भी वह नहीं नाकाम रहता है कहीं ।
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आज का आदमी | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| मैं ढाई हाथ का आदमी हूँ मेरा ढाई मील का ' ईगो ' है मेरा ढाई इंच का दिल है दिल पर ढाई मन का बोझ है
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एक बूँद | Ek Boond
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
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| एक बूँद
ज्यों निकल कर बादलों की गोद से थी अभी एक बूँद कुछ आगे बढ़ी। सोचने फिर-फिर यही जी में लगी, आह ! क्यों घर छोड़कर मैं यों कढ़ी ?
देव मेरे भाग्य में क्या है बदा, मैं बचूँगी या मिलूँगी धूल में ? या जलूँगी फिर अंगारे पर किसी, चू पडूँगी या कमल के फूल में ?
बह गयी उस काल एक ऐसी हवा वह समुन्दर ओर आई अनमनी। एक सुन्दर सीप का मुँह था खुला वह उसी में जा पड़ी मोती बनी ।
लोग यों ही हैं झिझकते, सोचते जबकि उनको छोड़ना पड़ता है घर किन्तु घर का छोड़ना अक्सर उन्हें बूँद लौं कुछ और ही देता है कर ।
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध |
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अहसास | सुशांत सुप्रिय की कविता
- सुशांत सुप्रिय
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| जब से मेरी गली की कुतिया झबरी चल बसी थी गली का कुत्ता कालू सुस्त और उदास रहने लगा था कभी वह मुझे किसी दुखी दार्शनिक-सा लगता कभी किसी हताश भविष्यवेत्ता-सा कभी वह मुझे कोई उदास कहानीकार लगता कभी किसी पीड़ित संत-सा वह मुझे और न जाने क्या-क्या लगता कि एक दिन अचानक गली में आ गई एक और कुतिया गली के बच्चों ने जिसका नाम रख दिया चमेली मैंने पाया कि चमेली को देखते ही ख़ुशी से उछलते-कूदते हुए रातोंरात बदल गया हमारा कालू कितना आदमी-सा लगने लगा था वह जानवर भी अपनी प्रसन्नता में
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सूर के पद | Sur Ke Pad
- सूरदास | Surdas
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| सूरदास के पदों का संकलन - इस पृष्ठ के अंतर्गत सूर के पदों का संकलन यहाँ उपलब्ध करवाया जा रहा है। यदि आपके पास सूरदास से संबंधित सामग्री हैं तो कृपया 'भारत-दर्शन' के साथ साझा करें।
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मन न भए दस-बीस - सूरदास के पद
- सूरदास | Surdas
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| मन न भए दस-बीस
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हरि संग खेलति हैं सब फाग - सूरदास के पद
- सूरदास | Surdas
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| हरि संग खेलति हैं सब फाग। इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।। सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन। बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।। डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग। अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।। एक कोध गोविन्द ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि। छांडि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि।। मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाई। भरि अरगजा अबीर कनक घट, देतिं सीस तैं नाईं।। छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि। सोभित हैं तनु सांझ समै घन, आये हैं मनु पूरि।। दसहूं दिसा भयो परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद। सुर बिमान कौतुहल भूले, निरखत स्याम बिनोद।।
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झाँसी की रानी
- सुभद्रा कुमारी
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| सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में भी आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
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सुखी आदमी
- केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal
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| आज वह रोया यह सोचते हुए कि रोना कितना हास्यास्पद है वह रोया मौसम अच्छा था धूप खिली हुई सब ठीक-ठाक सब दुरुस्त बस खिड़की खोलते ही सलाखों से दिख गया ज़रा-सा आसमान और वह रोया फूटकर नहीं जैसे जानवर रोता है माँद में वह रोया।
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मुरझाया फूल | कविता
- सुभद्रा कुमारी
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| यह मुरझाया हुआ फूल है, इसका हृदय दुखाना मत । स्वयं बिखरने वाली इसकी, पंखुड़ियाँ बिखराना मत ॥ जीवन की अन्तिम घड़ियों में, देखो, इसे रुलाना मत ॥
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तुलसी की चौपाइयां
- तुलसीदास | Tulsidas
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| किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनूरूप।। जथा अनेक वेष धरि नृत्य करइ नट कोइ । सोइ सोइ भाव दिखावअइ आपनु होइ न सोइ ।।
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ठुकरा दो या प्यार करो | सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता
- सुभद्रा कुमारी
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| देव! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं । सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं ॥ धूमधाम से साजबाज से मंदिर में वे आते हैं । मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुएँ लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं ॥ मैं ही हूँ गरीबिनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लायी । फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आयी ॥ धूप दीप नैवेद्य नहीं है झांकी का शृंगार नहीं । हाय! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं ॥ मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ? है स्वर में माधुर्य नहीं । मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं ॥ नहीं दान है, नहीं दक्षिणा ख़ाली हाथ चली आयी ॥ पूजा की विधि नहीं जानती फिर भी नाथ! चली आयी ॥ पूजा और पुजापा प्रभुवर ! इसी पुजारिन को समझो । दान दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो ॥ मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी हृदय दिखाने आयी हूँ । जो कुछ है, बस यही पास है इसे चढ़ाने आयी हूँ ॥ चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो । यह तो वस्तु तुम्हारी ही है, ठुकरा दो या प्यार करो ॥
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स्वतंत्रता का दीपक
- गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
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कवि की बरसगाँठ
- गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
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| उन्तीस वसन्त जवानी के, बचपन की आँखों में बीते झर रहे नयन के निर्झर, पर जीवन घट रीते के रीते
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मेरा नया बचपन
- सुभद्रा कुमारी
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| बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी। गया, ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी।।
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मेरा धन है स्वाधीन कलम
- गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
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| राजा बैठे सिंहासन पर, यह ताजों पर आसीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम जिसने तलवार शिवा को दी रोशनी उधार दिवा को दी पतवार थमा दी लहरों को ख़ंजर की धार हवा को दी अग-जग के उसी विधाता ने, कर दी मेरे आधीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम रस-गंगा लहरा देती है मस्ती-ध्वज फहरा देती है चालीस करोड़ों की भोली किस्मत पर पहरा देती है संग्राम-क्रांति का बिगुल यही है, यही प्यार की बीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम कोई जनता को क्या लूटे कोई दुखियों पर क्या टूटे कोई भी लाख प्रचार करे सच्चा बनकर झूठे-झूठे अनमोल सत्य का रत्नहार, लाती चोरों से छीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम बस मेरे पास हृदय-भर है यह भी जग को न्योछावर है लिखता हूँ तो मेरे आगे सारा ब्रह्मांड विषय-भर है रँगती चलती संसार-पटी, यह सपनों की रंगीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम लिखता हूँ अपनी मरज़ी से बचता हूँ क़ैंची-दर्ज़ी से आदत न रही कुछ लिखने की निंदा-वंदन ख़ुदग़र्ज़ी से कोई छेड़े तो तन जाती, बन जाती है संगीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम तुझ-सा लहरों में बह लेता तो मैं भी सत्ता गह लेता ईमान बेचता चलता तो मैं भी महलों में रह लेता हर दिल पर झुकती चली मगर, आँसू वाली नमकीन कलम मेरा धन है स्वाधीन कलम |
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विजयादशमी
- सुभद्रा कुमारी
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| विजये ! तूने तो देखा है, वह विजयी श्री राम सखी ! धर्म-भीरु सात्विक निश्छ्ल मन वह करुणा का धाम सखी !!
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गोपालदास नीरज के गीत | जलाओ दीये | Neeraj Ke Geet
- गोपालदास ‘नीरज’
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| जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए । नई ज्योति के धर नये पंख झिलमिल, उड़े मर्त्य मिट्टी गगन-स्वर्ग छू ले, लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी, निशा की गली में तिमिर राह भूले, खुले मुक्ति का वह किरण-द्वार जगमग, उषा जा न पाए, निशा आ ना पाए। जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए। सृजन है अधूरा अगर विश्व भर में, कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी, मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी, कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी, चलेगा सदा नाश का खेल यों ही, भले ही दिवाली यहाँ रोज आए। जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए । मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ़ जग में, नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा, उतर क्यों न आएँ नखत सब नयन के, नहीं कर सकेंगे हृदय में उजारा, कटेगे तभी यह अँधेरे घिरे अब स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए। जलाओ दीये पर रहे ध्यान इतना अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए। |
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बरस-बरस पर आती होली
- गोपाल सिंह नेपाली | Gopal Singh Nepali
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| बरस-बरस पर आती होली, रंगों का त्यौहार अनूठा चुनरी इधर, उधर पिचकारी, गाल-भाल पर कुमकुम फूटा लाल-लाल बन जाते काले, गोरी सूरत पीली-नीली, मेरा देश बड़ा गर्वीला, रीति-रसम-ऋतु रंग-रगीली, नीले नभ पर बादल काले, हरियाली में सरसों पीली !
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अब तो मजहब कोई | नीरज के गीत
- गोपालदास ‘नीरज’
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| अब तो मजहब कोई, ऐसा भी चलाया जाए जिसमें इनसान को, इनसान बनाया जाए
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जितना कम सामान रहेगा | नीरज का गीत
- गोपालदास ‘नीरज’
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| जितना कम सामान रहेगा उतना सफ़र आसान रहेगा
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तुम दीवाली बनकर
- गोपालदास ‘नीरज’
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| तुम दीवाली बनकर जग का तम दूर करो, मैं होली बनकर बिछड़े हृदय मिलाऊँगा!
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गोपालदास नीरज के दोहे
- गोपालदास ‘नीरज’
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| (1) कवियों की और चोर की गति है एक समान दिल की चोरी कवि करे लूटे चोर मकान
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धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ
- गोपालदास ‘नीरज’
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| दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा, धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ !
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मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जायेगा
- गोपालदास ‘नीरज’
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| मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जायेगा!
रोज रात को नींद चुरा ले जायेगी पपिहों की टोली, रोज प्रात को पीर जगाने आयेगी कोयल की बोली, रोज दुपहरी में तुमसे कुछ कथा कहेंगी सूनी गलियाँ, रोज साँझ को आँख भिगो जायेंगी कुछ मुरझाई कलियाँ, यह सब होगा, पर न दुःखी तुम होना मेरी मुक्त-केशिनी !
तुम सिसकोगी वहाँ, यहाँ यह पग बोझीला हो जायेगा। मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जायेगा।। कभी लगेगा तुम्हें कि जैसे दूर कहीं गाता हो कोई, कभी तुम्हें मालूम पड़ेगा आँचल छू जाता हो कोई, कभीसुनोगी तुम कि कहीं से किसी दिशा ने तुम्हें पुकारा, कभी दिखेगा तुम्हें कि जैसे बात कर रहा हो हर तारा पर न तड़पना, पर न बिलखना, पर न आँख भर-भर लाना तुम तुम्हें तड़पता देख विरह-शुक और हठीला हो जायेगा ! मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जायेगा।।
याद सुखद उसकी बस जग में होकर भी दूर, पास हो, किन्तु व्यर्थ उसकी सुधि करना जिसके मिलने की न आस हो, मैं अब इतनी दूर कि जितनी सागर से मरूथल की दूरी, और अभी क्या ठीक कहाँ ले जाये जीवन की मजबूरी, गीत-हंस के हाथ इसलिए मुझको मत भेजना संदेशा, मुझको मिटता देख, तुम्हारा स्वर दर्दीला हो जायेगा मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जायेगा।।
मैंने कब यह चाहा मुझको याद करो, जग को तुम भूलो ? मेरी यही रही ख्वाहिश बस मैं जिस जगह झरूँ, तुम फूलो शूल मुझे दो जिससे वे चुभ सकें न किसी अन्य के पग में, और फूल जाओ-ले आओ बिखराओ जन-जन के मग में, यही प्रेम की रीति कि सब कुछ देता, केन्तु न कुछ लेता है, यदि तुमने कुछ दिया प्रेम का बन्धन ढीला हो जायेगा। मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जायेगा।।
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रैदास के पद
- रैदास | Ravidas
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| अब कैसे छूटे राम रट लागी। प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥ प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥ प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥ प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥ प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै 'रैदासा'॥ |
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सोऽहम् | कविता
- चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri
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| करके हम भी बी० ए० पास हैं अब जिलाधीश के दास । पाते हैं दो बार पचास बढ़ने की रखते हैं आस ॥१॥
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खिड़की बन्द कर दो
- गोपालदास ‘नीरज’
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| खिड़की बन्द कर दो अब सही जाती नहीं यह निर्दयी बरसात-खिड़की बन्द कर दो।
यह खड़ी बौछार, यह ठंडी हवाओं के झकोरे, बादलों के हाथ में यह बिजलियों के हाथ गोरे कह न दें फिर प्राण से कोई पुरानी बात - खिड़की बन्द कर दो।
वो अकेलापन कि अपनी साँस लगती फाँस जैसी, काँपती पीली शिखा दिखती दिये की लाश जैसी, जान पड़ता है न होगा इस निशा का प्राप्त - खिड़की बन्द कर दो।
था यही वह वक्त मेरे वक्ष में जब सिर छिपाकर, था कहा तुमने तुम्हारी प्रीति है मेरी महावर, बन गई कालिख तुम्हें पर अब वही सौगात - खिड़की बन्द कर दो।
अब न तुम वह , अब न मैं वह, वे न मन में कामनायें, आँसुओं में घुल गई अनमोल सारी भावनायें, किसलिए चाहूँ चढ़े फिर उम्र की बारात - खिड़की बन्द कर दो।
रो न मेरे मन, न गीला आसुओं से कर बिछौना, हाथ मत फैला पकड़ने को लड़कपन का खिलौना, मेंह-पानी में निभाता कौन किसका साथ - खिड़की बन्द कर दो।
- गोपालदास 'नीरज' |
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सुनीति | कविता
- चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri
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| निज गौरव को जान आत्मआदर का करना निजता की की पहिचान, आत्मसंयम पर चलना ये ही तीनो उच्च शक्ति, वैभव दिलवाते, जीवन किन्तु न डाल शक्ति वैभव के खाते । (आ जाते ये सदा आप ही बिना बुलाए ।) चतुराई की परख यहाँ-परिणाम न गिनकर, जीवन को नि:शक चलाना सत्य धर्म पर, जो जीवन का मन्त्र उसी हर निर्भय चलना, उचित उचित है यही मान कर समुचित ही करना, यो ही परमानंद भले लोगों ने पाए ।।
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अब के सावन में
- गोपालदास ‘नीरज’
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| अब के सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई
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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ग़ज़ल
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra
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| गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में बुझे दिल की लगी भी तो ए यार होली में।
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रैदास के दोहे
- रैदास | Ravidas
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| जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात। रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।
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रैदास की साखियाँ
- रैदास | Ravidas
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| हरि सा हीरा छाड़ि कै, करै आन की आस । ते नर जमपुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ।। १ ।।
अंतरगति रार्चैँ नहीं, बाहर कथैं उदास । ते नर जम पुर जाहिँगे, सत भाषै रैदास ।। २ ।।
रैदास कहें जाके ह्रदै, रहै रैन दिन राम । सो भगता भगवंत सम, क्रोध न ब्यापै काम ।। ३
जा देखे घिन उपजै, नरक कुंड मेँ बास । प्रेम भगति सों ऊधरे, प्रगटत जन रैदास ।। ४
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भारतेंदु की कविता
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra
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| निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन। पै निज भाषा-ज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
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मीरा के पद - Meera Ke Pad
- मीराबाई | Meerabai
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| दरद न जाण्यां कोय
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मीरा के पद - Meera Ke Pad
- मीराबाई | Meerabai
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| अब तो हरि नाम लौ लागी
सब जग को यह माखनचोर, नाम धर्यो बैरागी। कहं छोडी वह मोहन मुरली, कहं छोडि सब गोपी। मूंड मुंडाई डोरी कहं बांधी, माथे मोहन टोपी। मातु जसुमति माखन कारन, बांध्यो जाको पांव। स्याम किशोर भये नव गोरा, चैतन्य तांको नांव। पीताम्बर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै। दास भक्त की दासी मीरा, रसना कृष्ण रटे॥
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मीरा के होली पद
- मीराबाई | Meerabai
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| फागुन के दिन चार होली खेल मना रे॥
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भारतेन्दु की मुकरियां
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra
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| सब गुरुजन को बुरो बतावै । अपनी खिचड़ी अलग पकावै ।। भीतर तत्व न झूठी तेजी । क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेजी ।।
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मीरा के भजन
- मीराबाई | Meerabai
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| मीरा के भजनों का संग्रह।
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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ग़ज़ल
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र | Bharatendu Harishchandra
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| आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया । ऐ फ़लक क्या क्या हमारे दिल में अरमाँ रह गया ॥
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दोहे | रसखान के दोहे
- रसखान | Raskhan
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| प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ। जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥
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रसखान की पदावलियाँ | Raskhan Padawali
- रसखान | Raskhan
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| मानुस हौं तो वही रसखान बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन। जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥ पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन। जो खग हौं तो बसेरो करौं मिलि कालिंदीकूल कदम्ब की डारन॥ या लकुटी अरु कामरिया पर, राज तिहूँ पुर को तजि डारौं। आठहुँ सिद्धि, नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराय बिसारौं॥ रसखान कबौं इन आँखिन सों, ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं। कोटिक हू कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं॥ सेस गनेस महेस दिनेस, सुरेसहु जाहि निरंतर गावै। जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुबेद बतावैं॥ नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तऊ पुनि पार न पावैं। ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं॥ |
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रसखान के फाग सवैय्ये
- रसखान | Raskhan
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| रसखान के फाग सवैय्ये
मिली खेलत फाग बढयो अनुराग सुराग सनी सुख की रमकै। कर कुंकुम लै करि कंजमुखि प्रिय के दृग लावन को धमकैं।। रसखानि गुलाल की धुंधर में ब्रजबालन की दुति यौं दमकै। मनौ सावन सांझ ललाई के मांझ चहुं दिस तें चपला चमकै।।
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ज़िंदगी
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| लाचारी है, बीमारी है, ...फिर भी ज़िंदगी सभी को प्यारी है!
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जन्म-दिन
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| यूँ तो जन्म-दिन मैं यूँ भी नहीं मनाता पर इस बार... जन्म-दिन बहुत रुलाएगा जन्म-दिन पर 'माँ' बहुत याद आएगी चूँकि... इस बार... 'जन्म-दिन मुबारक' वाली चिरपरिचित आवाज नहीं सुन पाएगी... पर...जन्म-दिन के आस-पास या शायद उसी रात... वो ज़रूर सपने में आएगी... फिर... 'जन्म-दिन मुबारिक' कह जाएगी इस बार मैं हँसता हुआ न बोल पाऊंगा... आँख खुल जाएगी... 'क्या हुआ?' बीवी पूछेगी और... उत्तर में मेरी आँख भर जाएगी। [16 जून 2013 को माँ छोड़ कर जो चल दी]
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रिश्ते
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| कुछ खून से बने हुए कुछ आप हैं चुने हुए और कुछ... हमने बचाए हुए हैं टूटने-बिखरने को हैं.. बस यूं समझो.. दीवार पर टंगें कैलंडर की तरह, सजाए हुए हैं।
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रोहित कुमार 'हैप्पी' के दोहे
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| रोहित कुमार 'हैप्पी' के दोहों का संकलन।
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मायने रखता है ज़िंदगी में
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| किसी का आना किसी का चले जाना मायने रखता है ज़िंदगी में।
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एक ऐसी भी घड़ी आती है / ग़ज़ल
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| एक ऐसी भी घड़ी आती है जिस्म से रूह बिछुड़ जाती है
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हिन्दी–दिवस नहीं, हिन्दी डे
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| हिन्दी दिवस पर एक नेता जी बतिया रहे थे, 'मेरी पब्लिक से ये रिक्वेस्ट है कि वे हिन्दी अपनाएं इसे नेशनवाइड पापुलर लेंगुएज बनाएं और हिन्दी को नेशनल लेंगुएज बनाने की अपनी डयूटी निभाएं।'
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मुट्ठी भर रंग अम्बर में
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| मुट्ठी भर रंग अम्बर में किसने है दे मारा आज तिरंगा दीखता है अम्बर मोहे सारा
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बिहारी के दोहे | Bihari's Couplets
- बिहारी | Bihari
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| रीति काल के कवियों में बिहारी सर्वोपरि माने जाते हैं। सतसई बिहारी की प्रमुख रचना हैं। इसमें 713 दोहे हैं। बिहारी के दोहों के संबंध में किसी ने कहा हैः सतसइया के दोहरा ज्यों नावक के तीर। देखन में छोटे लगैं घाव करैं गम्भीर।।
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उसे यह फ़िक्र है हरदम
- भगत सिंह
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आओ होली खेलें संग
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| कही गुब्बारे सिर पर फूटे पिचकारी से रंग है छूटे हवा में उड़ते रंग कहीं पर घोट रहे सब भंग!
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श्रमिक दिवस पर दो हाइकु
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| ये मज़दूर कितना मजबूर घर से दूर!
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काका हाथरस्सी का हास्य काव्य
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार
बिना टिकट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर जहाँ 'मूड' आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू पकड़ें टी. टी. गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू गुंडागर्दी, भ्रष्टाचार बढ़ा दिन-दूना प्रजातंत्र की स्वतंत्रता का देख नमूना
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हिंदी-प्रेम
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| हिंदी-हिंदू-हिंद का, जिनकी रग में रक्त सत्ता पाकर हो गए, अँगरेज़ी के भक्त अँगरेज़ी के भक्त, कहाँ तक करें बड़ाई मुँह पर हिंदी-प्रेम, ह्रदय में अँगरेज़ी छाई शुभ चिंतक श्रीमान, राष्ट्रभाषा के सच्चे ‘कानवेण्ट' में दाख़िल करा दिए हैं बच्चे
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काका हाथरसी की कुंडलियाँ
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| पत्रकार दादा बने, देखो उनके ठाठ। कागज़ का कोटा झपट, करें एक के आठ।। करें एक के आठ, चल रही आपाधापी । दस हज़ार बताएं, छपें ढाई सौ कापी ।। विज्ञापन दे दो तो, जय-जयकार कराएं। मना करो तो उल्टी-सीधी न्यूज़ छपाएं ।।
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महंगाई
- काका हाथरसी | Kaka Hathrasi
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| जन-गण मन के देवता, अब तो आंखें खोल महंगाई से हो गया, जीवन डांवाडोल जीवन डाँवाडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालू कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन-आलू कहं 'काका' कवि, दूध-दही को तरसे बच्चे आठ रुपये के किलो टमाटर, वह भी कच्चे
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डा रामनिवास मानव के दोहे
- डा रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav
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| डॉ. 'मानव' दोहा, बालकाव्य तथा लघुकथा विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं तथा विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। उनके कुछ दोहे यहां दिए जा रहे हैं:
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डा रामनिवास मानव के हाइकु
- डा रामनिवास मानव | Dr Ramniwas Manav
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| डॉ. 'मानव' हाइकु, दोहा, बालकाव्य तथा लघुकथा विधाओं के सुपरिचित राष्ट्रीय हस्ताक्षर हैं तथा विभिन्न विधाओं में लेखन करते हैं। उनके कुछ हाइकु यहाँ दिए जा रहे हैं:
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कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें
- कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar
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| कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें |
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गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| यहाँ हम रवीन्द्रनाथ टैगोर (रवीन्द्रनाथ ठाकुर) की सुप्रसिद्ध रचना 'गीतांजलि'' को श्रृँखला के रूप में प्रकाशित करने जा रहे हैं। 'गीतांजलि' गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर (1861-1941) की सर्वाधिक प्रशंसित रचना है। 'गीतांजलि' पर उन्हें 1910 में नोबेल पुरस्कार भी मिला था। |
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दिन अँधेरा-मेघ झरते | रवीन्द्रनाथ ठाकुर
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| यहाँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना "मेघदूत' के आठवें पद का हिंदी भावानुवाद (अनुवादक केदारनाथ अग्रवाल) दे रहे हैं। देखने में आया है कि कुछ लोगो ने इसे केदारनाथ अग्रवाल की रचना के रूप में प्रकाशित किया है लेकिन केदारनाथ अग्रवाल जी ने स्वयं अपनी पुस्तक 'देश-देश की कविताएँ' के पृष्ठ 215 पर नीचे इस विषय में टिप्पणी दी है।
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चल तू अकेला! | रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो तू चल अकेला, चल अकेला, चल अकेला, चल तू अकेला! तेरा आह्वान सुन कोई ना आए, तो चल तू अकेला, जब सबके मुंह पे पाश.. ओरे ओरे ओ अभागी! सबके मुंह पे पाश, हर कोई मुंह मोड़के बैठे, हर कोई डर जाय! तब भी तू दिल खोलके, अरे! जोश में आकर, मनका गाना गूंज तू अकेला! जब हर कोई वापस जाय.. ओरे ओरे ओ अभागी! हर कोई बापस जाय.. कानन-कूचकी बेला पर सब कोने में छिप जाय...
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रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं - गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविताओं का संकलन। |
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नारी के उद्गार
- सुदर्शन | Sudershan
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| 'माँ' जय मुझको कहा पुरुष ने, तु्च्छ हो गये देव सभी । इतना आदर, इतनी महिमा, इतनी श्रद्धा कहाँ कमी? उमड़ा स्नेह-सिन्धु अन्तर में, डूब गयी आसक्ति अपार । देह, गेह, अपमान, क्लेश, छि:! विजयी मेरा शाश्वत प्यार ।।
'बहिन !' पुरुष ने मुझे पुकारा, कितनी ममता ! कितना नेह ! 'मेरा भैया' पुलकित अन्तर, एक प्राण हम, हों दो देह । कमलनयन अंगार उगलते हैं, यदि लक्षित हो अपमान । दीर्ध भुजाओं में भाई की है रक्षित मेरा सम्मान ।।
'बेटी' कहकर मुझे पुरुष ने दिया स्नेह, अन्तर-सर्वस्व । मेरा सुख, मेरी सुविधा की चिन्ता-उसके सब सुख ह्रस्व ।। अपने को भी विक्रय करके मुझे देख पायें निर्बाध । मेरे पूज्य पिताकी होती एकमात्र यह जीवन-साध ।।
'प्रिये !' पुरुष अर्धांग दे चुका, लेकर के हाथों में हाथ । यहीं नहीं-उस सर्वेश्वर के निकट हमारा शाश्वत साथ ।। तन-मन-जीवन एक हो गये, मेरा घर-उसका संसार । दोनों ही उत्सर्ग परस्पर, दोनों पर दोनों का मार ।।
'पण्या!' आज दस्यु कहता है ! पुरुष हो गया हाय पिशाच ! मैं अरक्षिता, दलिता, तप्ता, नंगा पाशवता का नाच !! धर्म और लज्जा लुटती है ! मैं अबला हूँ कातर, दीन ! पुत्र ! पिता ! भाई ! स्वामी ! सब तुम क्या इसने पौरुषहीन?
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प्यार भरी बोली | होली हास्य कविता
- जैमिनी हरियाणवी | Jaimini Hariyanavi
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| होली पर हास्य-कवि जैमिनी हरियाणवी की कविता
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वो था सुभाष, वो था सुभाष
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| वो भी तो ख़ुश रह सकता था महलों और चौबारों में। उसको लेकिन क्या लेना था, तख्तों-ताज-मीनारों से! वो था सुभाष, वो था सुभाष!
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पुष्प की अभिलाषा | माखनलाल चतुर्वेदी की कविता
- माखनलाल चतुर्वेदी
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| चाह नहीं मैं सुरबाला के, गहनों में गूँथा जाऊँ,
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मेंहदी से तस्वीर खींच ली
- माखनलाल चतुर्वेदी
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| मेंहदी से तस्वीर खींच ली किसकी मधुर! हथेली पर ।
प्राणों की लाली-सी है यह, मिट मत जाय हाथों में रसदान किये यह, छुट मत जाय यह बिगड़ी पहचान कहीं कुछ बन मत जाय रूठन फिसलन से मन चाही मन मत जाय!
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मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर, अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं, कान तुम्हारे तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता?
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दिन जल्दी-जल्दी ढलता है
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| हो जाय न पथ में रात कहीं, मंज़िल भी तो है दूर नहीं - यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है! दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
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एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए, कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए, इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े, और इन्हें झटके देने में कितनों ने निज प्राण गँवाए! किंतु शहीदों की आहों से शापित लोहा, कच्चा धागा। एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो।
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मरण काले
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| निराला के देहांत के पश्चात् उनके मृत शरीर का चित्र देखने पर हरिवंशराय बच्चन की लिखी कविता - मरा मैंने गरुड़ देखा, गगन का अभिमान, धराशायी,धूलि धूसर, म्लान! मरा मैंने सिंह देखा, दिग्दिगंत दहाड़ जिसकी गूँजती थी, एक झाड़ी में पड़ा चिर-मूक, दाढ़ी-दाढ़-चिपका थूक। मरा मैंने सर्प देखा, स्फूर्ति का प्रतिरूप लहरिल, पड़ा भू पर बना सीधी और निश्चल रेख। मरे मानव-सा कभी मैं दीन, हीन, मलीन, अस्तंगमितमहिमा, कहीं, कुछ भी नहीं पाया देख। क्या नहीं है मरण जीवन पर अवार प्रहार? - कुछ नहीं प्रतिकार। क्या नहीं है मरण जीवन का महा अपमान?- सहन में ही त्राण। क्या नहीं है मरण ऐसा शत्रु जिसके साथ, कितना ही सम कर, निबल निज को मान, सबको, सदा, करनी पड़ी उसकी शरण अंगीकार?- क्या इसी के लिए मैंने नित्य गाए गीत, अंतर में सँजोए प्रीति के अंगार, दी दुर्नीति को डटकर चुनौती, ग़लत जीती बाज़ियों से मैं बराबर हार ही करता गया स्वीकार, एक श्रद्धा के भरोसे न्याय, करुणा, प्रेम - सबके लिए निर्भर एक ही अज्ञात पर मैं रहा सहता बुद्धि व्यंग्य प्रहार? इस तरह रह अगर जीवन का जिया कुछ अर्थ, मरण में मैं मत लगूँ असमर्थ!
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साथी, घर-घर आज दिवाली!
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| साथी, घर-घर आज दिवाली!
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दो बजनिए | कविता
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| "हमारी तो कभी शादी ही न हुई, न कभी बारात सजी, न कभी दूल्हन आई, न घर पर बधाई बजी, हम तो इस जीवन में क्वांरे ही रह गए।"
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आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ
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नव वर्ष
- हरिवंश राय बच्चन | Harivansh Rai Bachchan
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| नव वर्ष हर्ष नव जीवन उत्कर्ष नव
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बाकी बच गया अंडा | कविता
- नागार्जुन | Nagarjuna
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| पाँच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंखार गोली खाकर एक मर गया, बाक़ी रह गये चार चार पूत भारत माता के, चारों चतुर-प्रवीन देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन तीन पूत भारत माता के, लड़ने लग गए वो अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच बच गए दो दो बेटे भारत माता के, छोड़ पुरानी टेक चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया है एक एक पूत भारत माता का, कंधे पर है झंडा पुलिस पकड़ के जेल ले गई, बाक़ी बच गया अंडा
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लोगे मोल? | कविता
- नागार्जुन | Nagarjuna
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| लोगे मोल? लोगे मोल? यहाँ नहीं लज्जा का योग भीख माँगने का है रोग पेट बेचते हैं हम लोग लोगे मोल? लोगे मोल?
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तीनों बंदर बापू के | कविता
- नागार्जुन | Nagarjuna
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| बापू के भी ताऊ निकले तीनों बंदर बापू के सरल सूत्र उलझाऊ निकले तीनों बंदर बापू के सचमुच जीवनदानी निकले तीनों बंदर बापू के ज्ञानी निकले, ध्यानी निकले तीनों बंदर बापू के जल-थल-गगन-बिहारी निकले तीनों बंदर बापू के लीला के गिरधारी निकले तीनों बंदर बापू के! सर्वोदय के नटवर लाल फैला दुनिया भर में जाल अभी जिएंगे ये सौ साल ढाई घर घोड़े की चाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवर लाल! लंबी उमर मिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के दिल की कली खिली है, खुश हैं तीनों बंदर बापू के बूढ़े हैं, फिर भी जवान हैं तीनों बंदर बापू के परम चतुर हैं, अति सुजान हैं तीनों बंदर बापू के सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के! खूब होंगे मालामाल खूब गलेगी उनकी दाल औरों की टपकेगी राल इनकी मगर तनेगी पाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवर लाल! सेठों क हित साध रहे हैं तीनों बंदर बापू के युग पर प्रवचन लाद रहे हैं तीनों बंदर बापू के सत्य-अहिंसा फाँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के पूँछों से छवि आँक रहे हैं तीनों बंदर बापू के दल से ऊपर, दल के नीचे तीनों बंदर बापू के मुस्काते हैं आंखें मीचे तीनों बंदर बापू के! छील रहे गीता की खाल उपनिषदें हैं इनकी ढाल उधर सजे मोती के थाल इधर जमे सतजुगी दलाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवर लाल! मड़ रहे दुनिया-जहान को तीनों बंदर बापू के चिढ़ा रहे हैं आसमान को तीनों बंदर बापू के करें रात-दिन टूर हवाई तीनों बंदर बापू के बदल-बदल कर चखें मलाई तीनों बंदर बापू के गांधी-छाप झूल डाले हैं तीनों बंदर बापू के असली हैं, सर्कस वाले हैं तीनों बंदर बापू के! दिल चटकीला, उजले बाल नाप चुके हैं गगन विशाल फूल गए हैं कैसे गाल मत पूछो तुम इनका हाल सर्वोदय के नटवर लाल! हमें अँगूठा दिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के कैसी हिकमत सिखा रहे हैं तीनों बंदर बापू के प्रेम-पगे हैं, शहद-सने हैं तीनों बंदर बापू के गुरुओं के भी गुरू बने हैं तीनों बंदर बापू के सौवीं बरसी मना रहे हैं तीनों बंदर बापू के बापू को ही बना रहे हैं तीनों बंदर बापू के।
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कालिदास! सच-सच बतलाना ! | कविता
- नागार्जुन | Nagarjuna
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| कालिदास! सच-सच बतलाना ! इंदुमती के मृत्यु शोक से अज रोया या तुम रोये थे ? कालिदास! सच-सच बतलाना ?
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बापू महान | कविता
- नागार्जुन | Nagarjuna
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| बापू महान, बापू महान! ओ परम तपस्वी परम वीर ओ सुकृति शिरोमणि, ओ सुधीर कुर्बान हुए तुम, सुलभ हुआ सारी दुनिया को ज्ञान बापू महान, बापू महान!!
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तेरे दरबार में क्या चलता है ? | कविता
- नागार्जुन | Nagarjuna
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| तेरे दरबार में क्या चलता है ? मराठी-हिन्दी गुजराती-कन्नड़ ? ताता गोदरेजवाली पारसी सेठों की बोली ? उर्दू—गोआनीज़ ? अरबी-फारसी.... यहूदियों वाली वो क्या तो कहलाती है, सो, तू वो भी भली भाँति समझ लेती तेरे दरबार में क्या नहीं समझा जाता है ! मोरी मइया, नादान मैं तो क्या जानूँ हूँ ! सेठों के लहजे में कहूँ तो—‘‘भूल-चूक लेणी-देणी.....’’ तेरे खास पुजारी गलत-सलत ही सही संस्कृत भाषा वाली विशुद्ध ‘देववाणी’ चलाते होंगे.... मगर मैया तू तो अंग्रेजी-फ्रेंच-पुर्तगीज चाइनीज और जापानी सब कुछ समझ लेती ही है नेल्सन मंडेला के यहाँ से लोग-बाग आते ही रहते हैं.... अरे वाह ! देखो मनहर, अम्बा ने सिर हिला दिया ! जै हो अम्बे ! नौ बरस की लम्बी सजा दे दी.... चलो, ये भी ठीक रहा !! देख मनहर भइया मुस्करा रही है ना ! चल मनहर मइया ने सिर हिला दिया, देख रे ! अब तो बार-बार भागा आऊँगा मनहर !
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घिन तो नहीं आती है ? | कविता
- नागार्जुन | Nagarjuna
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| पूरी स्पीड में है ट्राम खाती है दचके पे दचके सटता है बदन से बदन- पसीने से लथपथ छूती है निगाहों को कत्थई दाँतों की मोटी मुस्कान बेतरतीब मूँछों की थिरकन सच-सच बतलाओ घिन तो नहीं आती है? जी तो नहीं कढता है?
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भवानी प्रसाद मिश्र की कविताएं
- भवानी प्रसाद मिश्र | Bhawani Prasad Mishra
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| यहाँ भवानी प्रसाद मिश्र के समृद्ध कृतित्व में से कुछ ऐसी कविताएं चयनित की गई हैं जो समकालीन समाज ओर विचारधारा का समग्र चित्र प्रस्तुत करने में सक्षम होंगी। |
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दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें
- दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
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| दुष्यंत कुमार की ग़ज़लें |
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एक आशीर्वाद | कविता
- दुष्यंत कुमार | Dushyant Kumar
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जा तेरे स्वप्न बड़े हों। भावना की गोद से उतर कर जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें। चाँद तारों सी अप्राप्य ऊचाँइयों के लिये रूठना मचलना सीखें। हँसें मुस्कुराऐं गाऐं। हर दीये की रोशनी देखकर ललचायें उँगली जलायें। अपने पाँव पर खड़े हों। जा तेरे स्वप्न बड़े हों।
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विष्णु प्रभाकर की कविताएं
- विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar
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| कहानी, कथा, उपन्यास, यात्रा-संस्मरण, जीवनी, आत्मकथा, रूपक, फीचर, नाटक, एकांकी, समीक्षा, पत्राचार आदि गद्य की सभी संभव विधाओं के लिए प्रसिद्ध विष्णुजी ने कविताएं भी लिखी हैं।
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सुशांत सुप्रिय की कविताएं
- सुशांत सुप्रिय
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| सुशांत सुप्रिय की कविताएं का संकलन। |
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भिक्षुक | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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| वह आता - दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
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प्राप्ति | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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| तुम्हें खोजता था मैं, पा नहीं सका, हवा बन बहीं तुम, जब मैं थका, रुका । मुझे भर लिया तुमने गोद में, कितने चुम्बन दिये, मेरे मानव-मनोविनोद में नैसर्गिकता लिये; सूखे श्रम-सीकर वे छबि के निर्झर झरे नयनों से, शक्त शिराएँ हुईं रक्त-वाह ले, मिलीं - तुम मिलीं, अन्तर कह उठा जब थका, रुका । |
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तोड़ती पत्थर | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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वसन्त आया
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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| सखि, वसन्त आया । भरा हर्ष वन के मन, नवोत्कर्ष छाया। किसलय-वसना नव-वय-लतिका मिली मधुर प्रिय-उर तरु-पतिका, मधुप-वृन्द बन्दी- पिक-स्वर नभ सरसाया। लता-मुकुल-हार-गन्ध-भार भर बही पवन बन्द मन्द मन्दतर, जागी नयनों में वन- यौवन की माया। आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे, केशर के केश कली के छुटे, स्वर्ण-शस्य-अञ्चल पृथ्वी का लहराया।
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ख़ून की होली जो खेली
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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| रँग गये जैसे पलाश; कुसुम किंशुक के, सुहाए, कोकनद के पाए प्राण, ख़ून की होली जो खेली ।
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बापू, तुम मुर्गी खाते यदि | कविता | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु
- सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' | Suryakant Tripathi 'Nirala'
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| बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु! पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
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ओमप्रकाश बाल्मीकि की कविताएं
- ओमप्रकाश वाल्मीकि | Om Prakash Valmiki
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| ओमप्रकाश वाल्मीकि उन शीर्ष साहित्यकारों में से एक हैं जिन्होंने अपने सृजन से साहित्य में सम्मान व स्थान पाया है। आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। आपने कविता, कहानी, आ्त्मकथा व आलोचनात्मक लेखन भी किया है।
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बीस साल बाद
- सुदामा पांडेय धूमिल
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| मेरे चेहरे में वे आँखें लौट आयी हैं जिनसे मैंने पहली बार जंगल देखा है : हरे रंग का एक ठोस सैलाब जिसमें सभी पेड़ डूब गए हैं।
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बाजार का ये हाल है | हास्य व्यंग्य संग्रह
- शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
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| बाज़ार का ये हाल है - हास्य-व्यंग्य-संग्रह
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सौदागर ईमान के
- शैल चतुर्वेदी | Shail Chaturwedi
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| आँख बंद कर सोये चद्दर तान के, हम ही हैं वो सेवक हिन्दुस्तान के ।
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फूल और काँटा | Phool Aur Kanta
- अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध' | Ayodhya Singh Upadhyaya Hariaudh
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| हैं जनम लेते जगह में एक ही, एक ही पौधा उन्हें है पालता। रात में उन पर चमकता चांद भी, एक ही सी चांदनी है डालता।।
मेह उन पर है बरसता एक-सा, एक-सी उन पर हवाएं हैं बहीं। पर सदा ही यह दिखाता है हमें, ढंग उनके एक-से होते नहीं।।
छेद कर कांटा किसी की उंगलियां, फाड़ देता है किसी का वर वसन। प्यार-डूबी तितलियों का पर कतर, भौंरें का है बेध देता श्याम तन।।
फूल लेकर तितलियों को गोद में, भौंरें को अपना अनूठा रस पिला। निज सुगंधों औ निराले रंग से, है सदा देता कली जी की खिला।। |
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खूनी पर्चा
- वंशीधर शुक्ल
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| अमर भूमि से प्रकट हुआ हूं, मर-मर अमर कहाऊंगा, जब तक तुझको मिटा न लूंगा, चैन न किंचित पाऊंगा। तुम हो जालिम दगाबाज, मक्कार, सितमगर, अय्यारे, डाकू, चोर, गिरहकट, रहजन, जाहिल, कौमी गद्दारे, खूंगर तोते चश्म, हरामी, नाबकार और बदकारे, दोजख के कुत्ते खुदगर्जी, नीच जालिमों हत्यारे, अब तेरी फरेबबाजी से रंच न दहशत खाऊंगा, जब तक तुझको...।
तुम्हीं हिंद में बन सौदागर आए थे टुकड़े खाने, मेरी दौलत देख देख के, लगे दिलों में ललचाने, लगा फूट का पेड़ हिंद में अग्नी ईर्ष्या बरसाने, राजाओं के मंत्री फोड़े, लगे फौज को भड़काने, तेरी काली करतूतों का भंडा फोड़ कराऊंगा, जब तक तुझको...।
हमें फरेबो जाल सिखा कर, भाई भाई लड़वाया, सकल वस्तु पर कब्जा करके हमको ठेंगा दिखलाया, चर्सा भर ले भूमि, भूमि भारत का चर्सा खिंचवाया, बिन अपराध हमारे भाई को शूली पर चढ़वाया, एक एक बलिवेदी पर अब लाखों शीश चढ़ाऊंगा, जब तक तुझको....।
बंग-भंग कर, नन्द कुमार को किसने फांसी चढ़वाई, किसने मारा खुदी राम और झांसी की लक्ष्मीबाई, नाना जी की बेटी मैना किसने जिंदा जलवाई, किसने मारा टिकेन्द्र जीत सिंह, पद्मनी, दुर्गाबाई, अरे अधर्मी इन पापों का बदला अभी चखाऊंगा, जब तक तुझको....।
किसने श्री रणजीत सिंह के बच्चों को कटवाया था, शाह जफर के बेटों के सर काट उन्हें दिखलाया था, अजनाले के कुएं में किसने भोले भाई तुपाया था, अच्छन खां और शम्भु शुक्ल के सर रेती रेतवाया था, इन करतूतों के बदले लंदन पर बम बरसाऊंगा, जब तक तुझको....।
पेड़ इलाहाबाद चौक में अभी गवाही देते हैं, खूनी दरवाजे दिल्ली के घूंट लहू पी लेते हैं, नवाबों के ढहे दुर्ग, जो मन मसोस रो देते हैं, गांव जलाये ये जितने लख आफताब रो लेते हैं, उबल पड़ा है खून आज एक दम शासन पलटाऊंगा, जब तक तुझको...।
अवध नवाबों के घर किसने रात में डाका डाला था, वाजिद अली शाह के घर का किसने तोड़ा ताला था, लोने सिंह रुहिया नरेश को किसने देश निकाला था, कुंवर सिंह बरबेनी माधव राना का घर घाला था, गाजी मौलाना के बदले तुझ पर गाज गिराऊंगा, जब तक तुझको...।
किसने बाजी राव पेशवा गायब कहां कराया था, बिन अपराध किसानों पर कस के गोले बरसाया था, किला ढहाया चहलारी का राज पाल कटवाया था, धुंध पंत तातिया हरी सिंह नलवा गर्द कराया था, इन नर सिंहों के बदले पर नर सिंह रूप प्रगटाऊंगा, जब तक तुझको...।
डाक्टरों से चिरंजन को जहर दिलाने वाला कौन ? पंजाब केसरी के सर ऊपर लट्ठ चलाने वाला कौन ? पितु के सम्मुख पुत्र रत्न की खाल खिंचाने वाला कौन ? थूक थूक कर जमीं के ऊपर हमें चटाने वाला कौन ? एक बूंद के बदले तेरा घट पर खून बहाऊंगा ? जब तक तुझको...।
किसने हर दयाल, सावरकर अमरीका में घेरवाया है, वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र से प्रिय भारत छोड़वाया है, रास बिहारी, मानवेन्द्र और महेन्द्र सिंह को बंधवाया है, अंडमान टापू में बंदी देशभक्त सब भेजवाया है, अरे क्रूर ढोंगी के बच्चे तेरा वंश मिटाऊंगा, जब तक तुझको....।
अमृतसर जलियान बाग का घाव भभकता सीने पर, देशभक्त बलिदानों का अनुराग धधकता सीने पर, गली नालियों का वह जिंदा रक्त उबलता सीने पर, आंखों देखा जुल्म नक्श है क्रोध उछलता सीने पर, दस हजार के बदले तेरे तीन करोड़ बहाऊंगा, जब तक तुझको....।
-वंशीधर शुक्ल (1904-1980) |
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ओ शासक नेहरु सावधान
- वंशीधर शुक्ल
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| ओ शासक नेहरु सावधान, पलटो नौकरशाही विधान। अन्यथा पलट देगा तुमको, मजदूर, वीर योद्धा, किसान। |
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ओ शासक नेहरु सावधान
- वंशीधर शुक्ल
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| ओ शासक नेहरु सावधान, पलटो नौकरशाही विधान। अन्यथा पलट देगा तुमको, मजदूर, वीर योद्धा, किसान। |
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उठो सोने वालों
- वंशीधर शुक्ल
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| उठो सोने वालों सबेरा हुआ है। वतन के फ़क़ीरों का फेरा हुआ है॥
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उठ जाग मुसाफिर भोर भई
- वंशीधर शुक्ल
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| उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है जो जागत है सो पावत है, जो सोवत है वो खोवत है खोल नींद से अँखियाँ जरा और अपने प्रभु से ध्यान लगा यह प्रीति करन की रीती नहीं प्रभु जागत है तू सोवत है उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है जो कल करना है आज करले जो आज करना है अब करले जब चिडियों ने खेत चुग लिया फिर पछताये क्या होवत है उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है नादान भुगत करनी अपनी ऐ पापी पाप में चैन कहाँ जब पाप की गठरी शीश धरी फिर शीश पकड़ क्यों रोवत है उठ जाग मुसाफिर भोर भई, अब रैन कहाँ जो तू सोवत है
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जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है | ग़ज़ल
- डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
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| जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है यह सवेरा भी क्या सवेरा है
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प्रतिपल घूंट लहू के पीना | ग़ज़ल
- डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
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| प्रतिपल घूँट लहू के पीना, ऐसा जीवन भी क्या जीना ।
बहुत सरल है घाव लगाना, बहुत कठिन घावों का सीना ।
छेड़ गया सोई यादों को, सावन का मदमस्त महीना ।
पीठ न वीर दिखाते रण में, छलनी भी हो जाये सीना ।
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बात हम मस्ती में ऐसी कह गए | ग़ज़ल
- डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
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| बात हम मस्ती में ऐसी कह गए, होश वाले भी ठगे से रह गए।
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सामने आईने के जाओगे
- डा. राणा प्रताप सिंह गन्नौरी 'राणा'
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| सामने आईने के जाओगे? इतनी हिम्मत कहां से लाओगे?
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बचकर रहना इस दुनिया के लोगों की परछाई से
- विजय कुमार सिंघल
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| बचकर रहना इस दुनिया के लोगों की परछाई से इस दुनिया के लोग बना लेते हैं परबत राई से।
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जंगल-जंगल ढूँढ रहा है | ग़ज़ल
- विजय कुमार सिंघल
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| जंगल-जंगल ढूँढ रहा है मृग अपनी कस्तूरी को कितना मुश्किल है तय करना खुद से खुद की दूरी को
इसको भावशून्यता कहिये चाहे कहिये निर्बलता नाम कोई भी दे सकते हैं आप मेरी मजदूरी को
सम्बंधों के वो सारे पुल क्या जाने कब टूट गए जो अकसर कम कर देते थे मन से मन की दूरी को
दोष कोई सिर पर मढ़ देंगे झूठे किस्से गढ़ लेंगे कब तक लोग पचा पाएँगे मेरी इस मशहूरी को
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कवि प्रदीप की कविताएं
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| कवि प्रदीप का जीवन-परिचय व कविताएं
कवि प्रदीप का जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्यप्रदेश के छोटे से शहर में एक मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ। आपका वास्तविक नाम रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी था। आपको बचपन से ही हिन्दी कविता लिखने में रूचि थी।
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साँप!
- अज्ञेय | Ajneya
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| साँप!
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जो पुल बनाएँगें
- अज्ञेय | Ajneya
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| जो पुल बनाएँगें वे अनिवार्यत: पीछे रह जाएँगे सेनाएँ हो जाएगी पार मारे जाएँगे रावण जयी होंगें राम , जो निर्माता रहे इतिहास में बंदर कहलाएँगे
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योगफल
- अज्ञेय | Ajneya
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| सुख मिला : उसे हम कह न सके। दुख हुआ : उसे हम सह न सके। संस्पर्श बृहत् का उतरा सुरसरि-सा : हम बह न सके । यों बीत गया सब : हम मरे नहीं, पर हाय कदाचित् जीवित भी हम रह न सके।
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आओ फिर से दीया जलाएं | कविता
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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| आओ फिर से दिया जलाएं भरी दूपहरी में अधियारा सूरज परछाई से हारा अंतरतम का नेह निचोड़े बुझी हुई बाती सुलगाएं आओ कि से दीया जलाएं।
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एक बरस बीत गया | कविता
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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| एक बरस बीत गया झुलसाता जेठ मास शरद चाँदनी उदास सिसकी भरते सावन का अंतर्घट रीत गया एक बरस बीत गया
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यक्ष प्रश्न - अटल बिहारी वाजपेयी की कविता
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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पंद्रह अगस्त की पुकार
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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कैदी कविराय की कुंडलिया
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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गीत नहीं गाता हूँ | कविता
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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| बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं, टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ । गीत नही गाता हूँ ।
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ऊँचाई | कविता
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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| ऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ बर्फ, जो, कफ़न की तरह सफ़ेद और, मौत की तरह ठंडी होती है। खेलती, खिलखिलाती नदी, जिसका रूप धारण कर, अपने भाग्य पर बूंद-बूंद रोती है। ऐसी ऊँचाई, जिसका परस पानी को पत्थर कर दे, ऐसी ऊँचाई जिसका दरस हीन भाव भर दे, अभिनंदन की अधिकारी है, आरोहियों के लिये आमंत्रण है, उस पर झंडे गाड़े जा सकते हैं, किन्तु कोई गौरैया, वहाँ नीड़ नहीं बना सकती, ना कोई थका-मांदा बटोही, उसकी छाँव में पलभर पलक ही झपका सकता है। सच्चाई यह है कि केवल ऊँचाई ही काफ़ी नहीं होती, सबसे अलग-थलग, परिवेश से पृथक, अपनों से कटा-बँटा, शून्य में अकेला खड़ा होना, पहाड़ की महानता नहीं, मजबूरी है। ऊँचाई और गहराई में आकाश-पाताल की दूरी है। जो जितना ऊँचा, उतना एकाकी होता है, हर भार को स्वयं ढोता है, चेहरे पर मुस्कानें चिपका, मन ही मन रोता है। ज़रूरी यह है कि ऊँचाई के साथ विस्तार भी हो, जिससे मनुष्य, ठूँठ सा खड़ा न रहे, औरों से घुले-मिले, किसी को साथ ले, किसी के संग चले। भीड़ में खो जाना, यादों में डूब जाना, स्वयं को भूल जाना, अस्तित्व को अर्थ, जीवन को सुगंध देता है। धरती को बौनों की नहीं, ऊँचे कद के इंसानों की जरूरत है। इतने ऊँचे कि आसमान छू लें, नये नक्षत्रों में प्रतिभा की बीज बो लें, किन्तु इतने ऊँचे भी नहीं, कि पाँव तले दूब ही न जमे, कोई काँटा न चुभे, कोई कली न खिले। न वसंत हो, न पतझड़, हो सिर्फ ऊँचाई का अंधड़, मात्र अकेलेपन का सन्नाटा।
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दूध में दरार पड़ गई | कविता
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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| खून क्यों सफेद हो गया?
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कदम मिलाकर चलना होगा | कविता
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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| बाधाएं आती हैं आएं घिरें प्रलय की घोर घटाएं, पावों के नीचे अंगारे, सिर पर बरसें यदि ज्वालाएं, निज हाथों में हंसते-हंसते, आग लगाकर जलना होगा। कदम मिलाकर चलना होगा।
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पहचान | कविता
- अटल बिहारी वाजपेयी | Atal Bihari Vajpayee
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| पेड़ के ऊपर चढ़ा आदमी ऊंचा दिखाई देता है। जड़ में खड़ा आदमी नीचा दिखाई देता है।
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ज़िन्दगी
- अभिषेक गुप्ता
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| अधूरे ख़त अधूरा प्रेम अधूरे रिश्ते अधूरी कविता अधूरे ख्वाब अधूरा इंसान
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डूब जाता हूँ मैं जिंदगी के
- अभिषेक गुप्ता
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| डूब जाता हूँ मैं ज़िंदगी के उन तमाम अनुभावों में जब खोलता हूँ अपने जहन की एल्बम पन्ना दर पन्ना और जब झांकता हूँ उन यादों में कुछ यादें सकूं देती हैं कुछ यादें परेशान करती हैं कुछ प्रतिशोध की आग में जलाती हैं तो कहीं कुछ हौसला भी पाता हूँ जब झांकता हूँ उन यादों में कहीं कुछ पाने की ख़ुशी है तो कहीं कुछ खोने का भी है ग़म कहीं भरोसे का मरहम है तो कहीं छले जाने का मातम कहीं दुश्मनों की कतार है तो कहीं कुछ दोस्त भी पाता हूँ जब झांकता हूँ उन यादों मैं कहीं बचपन की नासमझी है तो कहीं जवानी में समझदार होने का दिखावा कहीं पुरानी परम्पराओं को तोड़ने की जिद है तो कहीं दुनिया से अलग महसूस होने का छलावा कहीं कुछ बदगुमानिया हैं तो कहीं कुछ संस्कार भी पाता हूँ जब झांकता हूँ उन यादों मैं
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विप्लव-गान | बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’
- बालकृष्ण शर्मा नवीन | Balkrishan Sharma Navin
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| कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाये, एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से आये, प्राणों के लाले पड़ जायें त्राहि-त्राहि स्वर नभ में छाये, नाश और सत्यानाशों का धुआँधार जग में छा जाये, बरसे आग, जलद जल जाये, भस्मसात् भूधर हो जाये, पाप-पुण्य सद्-सद् भावों की धूल उड़ उठे दायें-बायें, नभ का वक्षस्थल फट जाये, तारे टूक-टूक हो जायें, कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाये!
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आराम करो | हास्य कविता
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas
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| एक मित्र मिले, बोले, "लाला, तुम किस चक्की का खाते हो? इस डेढ़ छटांक के राशन में भी तोंद बढ़ाए जाते हो। क्या रक्खा माँस बढ़ाने में, मनहूस, अक्ल से काम करो। संक्रान्ति-काल की बेला है, मर मिटो, जगत में नाम करो।" हम बोले, "रहने दो लेक्चर, पुरुषों को मत बदनाम करो। इस दौड़-धूप में क्या रक्खा, आराम करो, आराम करो।
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दिवाली के दिन | हास्य कविता
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas
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| ''तुम खील-बताशे ले आओ, हटरी, गुजरी, दीवट, दीपक। लक्ष्मी - गणेश लेते आना, झल्लीवाले के सर पर रख।
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हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas
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| हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम ! शब्दकोश में प्रिये, और भी बहुत गालियाँ मिल जाएँगी जो चाहे सो कहो, मगर तुम मरी उमर की डोर गहो तुम ! हाय, न बूढ़ा मुझे कहो तुम !
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भई, भाषण दो ! भई, भाषण दो !!
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas
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| यदि दर्द पेट में होता हो या नन्हा-मुन्ना रोता हो या आंखों की बीमारी हो अथवा चढ़ रही तिजारी हो तो नहीं डाक्टरों पर जाओ वैद्यों से अरे न टकराओ है सब रोगों की एक दवा-- भई, भाषण दो ! भई, भाषण दो !!
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खूनी हस्ताक्षर
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas
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| वह खून कहो किस मतलब का, जिसमें उबाल का नाम नहीं ? वह खून कहो किस मतलब का, आ सके देश के काम नहीं ?
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नेताजी का तुलादान
- गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas
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| देखा पूरब में आज सुबह, एक नई रोशनी फूटी थी। एक नई किरन, ले नया संदेशा, अग्निबान-सी छूटी थी॥
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आज मेरे आँसुओं में, याद किस की मुसकराई? | गीत
- उपेन्द्रनाथ अश्क | Upendranath Ashk
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| आज मेरे आँसुओं में, याद किस की मुसकराई?
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उसने मेरा हाथ देखा | कविता
- उपेन्द्रनाथ अश्क | Upendranath Ashk
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| उसने मेरा हाथ देखा और सिर हिला दिया, "इतनी भाव प्रवीणता दुनियां में कैसे रहोगे! इसपर अधिकार पाओ, वरना लगातार दुख दोगे निरंतर दुख सहोगे!"
यह उधड़े मांस सा दमकता अहसास, मै जानता हूँ, मेरी कमज़ोरी है हल्की सी चोट इसे सिहरा देती है एक टीस है, जो अन्तरतम तक दौड़ती चली जाती है दिन का चैन और रातों की नींद उड़ा देती है! पर यही अहसास मुझे ज़िन्दा रखे है, यही तो मेरी शहज़ोरी है! वरना मांस जब मर जाता है, जब खाल मोटी होकर ढाल बन जाती है, हल्का सा कचोका तो दूर, आदमी गहरे वार बेशर्मी से हँसकर सह जाता है, जब उसका हर आदर्श दुनिया के साथ चलने की शर्त में ढल जाता है जब सुख सुविधा और संपदा उसके पांव चूमते हैं वह मज़े से खाता-पीता और सोता है तब यही होता है: सिर्फ कि वह मर जाता है!
वह जानता नहीं, लेकिन अपने कंधों पर अपना शव आप ढोता है।
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मुक्तिबोध की कविताएं
- गजानन माधव मुक्तिबोध | Gajanan Madhav Muktibodh
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| यहाँ मुक्तिबोध के कुछ कवितांश प्रकाशित किए गए हैं। हमें विश्वास है पाठकों को रूचिकर व पठनीय लगेंगे।
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सजनवा के गाँव चले
- आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
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| सूरज उगे या शाम ढले, मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।
सपनों की रंगीन दुनियाँ लिये, प्यासे उर में वसन्ती तमन्ना लिये। मेरे हँसते अधर, मेरे बढ़ते कदम, अश्रुओं की सजीली सी लड़ियाँ लिये।
कोई हँसे या कोई जले, मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।
आज पहला मिलन है अनोंखा मिलन, धीर धूलि हुआ, जाने कैसी लगन। रात होने लगी, साँस खोने लगी, चाँद तारे चमकते बहकते नयन।
कोई मिले या कोई छले, मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।
दो हृदय का मिलन बन गया अब रुदन, हैं बिलखते हृदय तो बरसते नयन। आत्मा तो मिली जा प्रखर तेज से, है यहाँ पर बिरह तो, वहाँ पर मिलन।
श्रेय मिले या प्रेय मिले, मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।
दुलहन आत्मा चल पड़ी देह से, दो नयन मिल गये जा परम गेह से। माँ की ममता लिये देह रोती रही, मग भिगोती रही प्यार के मेह से।
ममता हँसे या आँसू झरे, मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले। -आनन्द विश्वास |
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मैंने जाने गीत बिरह के
- आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
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| मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है, कदम-कदम पर मिली विवशता, साँसों में विश्वास नहीं है। छल से छला गया है जीवन, आजीवन का था समझौता। लहरों ने पतवार छीन ली, नैया जाती खाती गोता। किस सागर जा करूँ याचना, अब अधरों पर प्यास नहीं है, मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है।
मेरे सीमित वातायन में, अनजाने किया बसेरा। प्रेम-भाव का दिया जलाया, आज बुझा, कर दिया अंधेरा। कितने सागर बह-बह निकलें, आँखों को एहसास नहीं है, मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है।
मरुथल में बहतीं दो नदियाँ, कब तक प्यासा उर सींचेंगीं। सागर से मिलने को आतुर, दर-दर पर कब तक भटकेंगीं। तूफानों से लड़-लड़ जी लूँ, इतनी तो अब साँस नहीं है, मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है।
विश्वासों की लाश लिये मैं, कब तक सपनों के संग खेलूँ। सोई-सोई सी प्रतिमा को, सत्य समझ कब तक मैं बहलूँ। मिथ्या जग में सच हों सपने, मुझको यह एहसास नहीं है, मैंने जाने गीत बिरह के, मधुमासों की आस नहीं है।
- आनन्द विश्वास
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नानी वाली कथा-कहानी
- आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
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| नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुई पुरानी। बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी। बेटी-युग में बेटा-बेटी, सभी पढ़ेंगे, सभी बढ़ेंगे। फौलादी ले नेक इरादे, खुद अपना इतिहास गढ़ेंगे। देश पढ़ेगा, देश बढ़ेगा, दौड़ेगी अब, तरुण जवानी। नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुईं पुरानी। बेटा शिक्षित, आधी शिक्षा, दोनों शिक्षित पूरी शिक्षा। हमने सोचा,मनन करो तुम, सोचो समझो करो समीक्षा। सारा जग शिक्षामय करना,हमने सोचा मन में ठानी। नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुईं पुरानी। अब कोई ना अनपढ़ होगा, सबके हाथों पुस्तक होगी। ज्ञान-गंग की पावन धारा, सबके आँगन तक पहुँचेगी। पुस्तक और कलम की शक्ति,जग जाहिर जानी पहचानी। नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुईं पुरानी। बेटी-युग सम्मान-पर्व है, पुर्ण्य-पर्व है, ज्ञान-पर्व है। सब सबका सम्मान करे तो, जन-जन का उत्थान-पर्व है। सोने की चिड़िया तब बोले,बेटी-युग की हवा सुहानी। नानी वाली कथा-कहानी, अब के जग में हुई पुरानी। बेटी-युग के नए दौर की, आओ लिख लें नई कहानी।
- आनन्द विश्वास |
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आया मधुऋतु का त्योहार
- आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
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| खेत-खेत में सरसों झूमे, सर-सर बहे बयार, मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
धानी रंग से रंगी धरा, परिधान वसन्ती ओढ़े। हर्षित मन ले लजवन्ती, मुस्कान वसन्ती छोड़े। चारों ओर वसन्ती आभा, हर्षित हिया हमार, मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
सूने-सूने पतझड़ को भी, आज वसन्ती प्यार मिला। प्यासे-प्यासे से नयनों को, जीवन का आधार मिला। मस्त गगन है, मस्त पवन है, मस्ती का अम्बार, मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
ऐसा लगे वसन्ती रंग से, धरा की हल्दी आज चढ़ी हो। ऋतुराज ब्याहने आ पहुँचा, जाने की जल्दी आज पड़ी हो। और कोकिला कूँक-कूँक कर, गाये मंगल ज्योनार, मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
पीली चूनर ओढ़ धरा अब, कर सोलह श्रृंगार चली। गाँव-गाँव में गोरी नाचें, बाग-बाग में कली-कली। या फिर नाचें शेषनाग पर, नटवर कृष्ण मुरार, मस्त पवन के संग-संग आया मधुऋतु का त्योहार।
- आनन्द विश्वास
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होली की रात | Jaishankar Prasad Holi Night Poetry
- जयशंकर प्रसाद | Jaishankar Prasad
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| बरसते हो तारों के फूल छिपे तुम नील पटी में कौन? उड़ रही है सौरभ की धूल कोकिला कैसे रहती मीन।
चाँदनी धुली हुई हैं आज बिछलते है तितली के पंख। सम्हलकर, मिलकर बजते साज मधुर उठती हैं तान असंख।
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आँसू के कन
- जयशंकर प्रसाद | Jaishankar Prasad
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| वसुधा के अंचल पर
यह क्या कन-कन सा गया बिखर ! जल शिशु की चंचल क्रीड़ा-सा जैसे सरसिज दल पर ।
लालसा निराशा में दलमल वेदना और सुख में विह्वल यह क्या है रे मानव जीवन! कितना था रहा निखर।
मिलने चलते अब दो कन आकर्षण -मय चुम्बन बन दल की नस-नस में बह जाती लघु-मघु धारा सुन्दर।
हिलता-डुलता चंचल दल, ये सब कितने हैं रहे मचल कन-कन अनन्त अम्बुधि बनते कब रूकती लीला निष्ठुर ।
तब क्यों रे, फिर यह सब क्यों यह रोष भरी लीला क्यों ? गिरने दे नयनों से उज्ज्वल आँसू के कन मनहर वसुधा के अंचल पर ।
- जयशंकर प्रसाद
[ हंस, जनवरी १९३३] |
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महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति
- केदारनाथ अग्रवाल | Kedarnath Agarwal
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| महाकवि रवीन्द्रनाथ के प्रति कवि! वह कविता जिसे छोड़ कर चले गए तुम, अब वह सरिता काट रही है प्रान्त-प्रान्त की दुर्दम कुण्ठा--जड़ मति-कारा मुक्त देश के नवोन्मेष के जनमानस की होकर धारा। काल जहाँ तक प्रवहमान है और जहाँ तक दिक-प्रमान है गए जहाँ तक वाल्मीकि हैं गए जहाँ तक कालिदास हैं वहाँ-दूर तक प्रवहमान है आँसू-आह-गीत की धारा तुमने जिसको आयुदान दी और जिसका रूप सँवारा। आज तुम्हारा जन्म-दिवस है कवि, यह भारत चिरकृतज्ञ है।
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क्योंकि सपना है अभी भी
- धर्मवीर भारती | Dhramvir Bharti
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| ...क्योंकि सपना है अभी भी इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल कोहरे डूबी दिशाएं कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध धूमिल किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
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डॉ सुधेश की ग़ज़लें
- डॉ सुधेश
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| डॉ सुधेश दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी के प्रोफ़ेसर पद से सेवानिवृत्त हैं। आप हिंदी में विभिन्न विधाओ में सृजन करते हैं। यहाँ आपकी ग़ज़लेंसंकलित की गई हैं। |
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आज भी खड़ी वो...
- सपना सिंह ( सोनश्री )
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| निराला की कविता, 'तोड़ती पत्थर' को सपना सिंह (सोनश्री) आज के परिवेश में कुछ इस तरह से देखती हैं:
आज भी खड़ी वो...
तोडती पत्थर,
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छवि नहीं बनती
- सपना सिंह ( सोनश्री )
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| निराला पर सपना सिंह (सोनश्री) की कविता
निराला जी, निराले थे ।
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लोग क्या से क्या न जाने हो गए | ग़ज़ल
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| लोग क्या से क्या न जाने हो गए आजकल अपने बेगाने हो गए
बेसबब ही रहगुज़र में छोड़ना दोस्ती के आज माने हो गए
आदमी टुकडों में इतने बँट चुका सोचिए कितने घराने हो गए
वक्त ने की किसकदर तब्दीलियाँ जो हकीकत थे फसाने हो गए
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बिला वजह आँखों के कोर भिगोना क्या | ग़ज़ल
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| बिला वजह आँखों के कोर भिगोना क्या अपनी नाकामी का रोना रोना क्या बेहतर है कि समझें नब्ज़ ज़माने की वक़्त गया फिर पछताने से होना क्या भाईचारा -प्यार मुहब्बत नहीं अगर तब रिश्ते नातों को लेकर ढोना क्या जिसने जान लिया की दुनिया फ़ानी है उसे फूल या काटों भरा बिछौना क्या क़ातिल को भी क़ातिल लोग नहीं कहते ऐसे लोगों का भी होना होना क्या मज़हब ही जिसकी दरवेश- फक़ीरी है उसकी नज़रों में क्या मिट्टी सोना क्या जहाँ न कोई भी अपना हमदर्द मिले उस नगरी में रोकर आँखें खोना क्या मुफ़लिस जिसे बनाकर छोड़ा गर्दिश ने उस बेचारे का जगना भी सोना क्या फिक्र जिसे लग जाती उसकी मत पूछो उसको जंतर-मंतर जादू- टोना क्या
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नहीं कुछ भी बताना चाहता है | ग़ज़ल
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| नहीं कुछ भी बताना चाहता है भला वह क्या छुपाना चाहता है तिज़ारत की है जिसने आँसुओं की वही ख़ुद मुस्कुराना चाहता है
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परिंदे की बेज़ुबानी
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| बड़ी ग़मनाक दिल छूती परिंदे की कहानी है!
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नहीं है आदमी की अब | हज़ल
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| नहीं है आदमी की अब कोई पहचान दिल्ली में मिली है धूल में कितनों की ऊँची शान दिल्ली में
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हौसले मिटते नहीं
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| हौसले मिटते नहीं अरमाँ बिखर जाने के बाद मंजिलें मिलती है कब तूफां से डर जाने के बाद
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कौन यहाँ खुशहाल बिरादर
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| कौन यहाँ खुशहाल बिरादर बद-से-बदतर हाल बिरादर
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उलझे धागों को सुलझाना
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| उलझे धागों को सुलझाना मुश्किल है नफरतवाली आग बुझाना मुश्किल है
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माँ की ममता जग से न्यारी !
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| माँ की ममता जग से न्यारी !
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माँ की याद बहुत आती है !
- डॉ शम्भुनाथ तिवारी
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| माँ की याद बहुत आती है !
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कलम गहो हाथों में साथी
- हरिहर झा | Harihar Jha
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| कलम गहो हाथों में साथी शस्त्र हजारों छोड़
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लिखना बाकी है
- हरिहर झा | Harihar Jha
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मण्डी बनाया विश्व को
- हरिहर झा | Harihar Jha
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| लुढ़कता पत्थर शिखर से, क्यों हमें लुढ़का न देगा ।
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मदिरा ढलने पर | कविता
- हरिहर झा | Harihar Jha
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दीवाली का सामान
- भारत-दर्शन संकलन | Collections
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| हर इक मकां में जला फिर दिया दिवाली का
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ज्ञानप्रकाश विवेक की ग़ज़लें
- ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek
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| प्रस्तुत हैं ज्ञानप्रकाश विवेक की ग़ज़लें ! |
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हम भी काट रहे बनवास
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| हम भी काट रहे बनवास जावेंगे अयोध्या नहीं आस
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बाबा | हास्य कविता
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| दूर बस्ती से बाहर बैठा था एक फ़क़ीर पेट से भूखा था तन कांटे सा सूखा था।
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उसे कुछ मिला, नहीं !
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| कूड़े के ढेर से
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भिखारी| हास्य कविता
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| एक भिखारी दुखियारा भूखा, प्यासा भीख मांगता फिरता मारा-मारा! 'अबे काम क्यों नहीं करता?' 'हट......हट!!' कोई चिल्लाता, कोई मन भर की सीख दे जाता। पर.....पर.... भिखारी भीख कहीं ना पाता! भिखारी मंदिर के बाहर गया भक्तों को 'राम-राम' बुलाया किसी ने एक पैसा ना थमाया भगवन भी काम ना आया! मस्जिद पहुँचा आने-जाने वालों को दुआ-सलाम बजाया किसी ने कौडी ना दी मुसीबत में अल्लाह भी पार ना लाया! भिखारी बदहवास कोई ना बची आस जान लेवा हो गई भूख-प्यास। जाते-जाते ये भी आजमा लूँ गुरूद्वारे भी शीश नवा लूं! 'सरदार जी, भूखा-प्यासा हूं।।। 'ओए मेरा कसूर अ?' भिखारी को लगा किस्मत बडी दूर है। आगे बढा़.... तभी एक देसी ठेके से बाहर निकलता शराबी नजर आया भिखारी ने फिर अपना अलाप दोहराया।। 'बाबू भूखे को खाना मिल जाए तेरी जोडी बनी रहे, तू ऊँचा रूतबा पाए।'
'अरे भाई क्या चाहिए' 'बाबू दो रूपया --- भूखे पेट का सवाल है!' शराबी जेब में हाथ डाल बुदबुदाया।।। 'अरे, तू तो बडा बेहाल है!' 'बाबू दो रूपये......' 'अरे दो क्या सौ ले।' 'बाबू बस खाने को......दो ही.....दो ही काफ़ी है।' 'अरे ले पकड सौ ले... पेट भर के खाले...... बच जाए तो ठररे की चुस्की लगा ले।।।' हाथ पे सौ का नोट धर शराबी आगे बढ ग़या। भिखारी को मानो अल्लाह मिल गया। 'तेरी जोडी बनी रहे, तू ऊँचा रूतबा पाए!' भिखारी धीरे से घर की राह पकडता है। रस्ते में फिर मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारा पड़ता है। भिखारी धीरे से बुदबुदाता है....... 'वाह रे भगवन्....... तू भी खूब लीला रचाता है मांगने वालों से बचता फिरता, इधर-उधर छिप जाता है रहता कहीं हैं बताता कहीं है आज अगर ठेके न जाता खुदाया, मैं तो भूखों ही मर जाता! इधर-उधर भटकता रहता तेरा सही पता भी न पाता तेरा सही पता भी न पाता! तेरा सही पता भी न पाता!! - रोहित कुमार 'हैप्पी'
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संवाद | कविता
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| "अब तो भाजपा की सरकार आ गई ।" मैंने उस गुमसुम रिक्शा वाले से संवाद स्थापित किया ।
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रोहित कुमार हैप्पी के भजन
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| रोहित कुमार हैप्पी का भजन संग्रह। |
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आज़ादी
- रोहित कुमार 'हैप्पी'
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| भोग रहे हम आज आज़ादी, किसने हमें दिलाई थी! चूमे थे फाँसी के फंदे, किसने गोली खाई थी?
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बहुत वासनाओं पर मन से - गीतांजलि
- रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
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| बहुत वासनाओं पर मन से हाय, रहा मर, तुमने बचा लिया मुझको उनसे वंचित कर । संचित यह करुणा कठोर मेरा जीवन भर।
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