वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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भई, भाषण दो ! भई, भाषण दो !! (काव्य)    Print  
Author:गोपालप्रसाद व्यास | Gopal Prasad Vyas
 

यदि दर्द पेट में होता हो
या नन्हा-मुन्ना रोता हो
या आंखों की बीमारी हो
अथवा चढ़ रही तिजारी हो
तो नहीं डाक्टरों पर जाओ
वैद्यों से अरे न टकराओ
है सब रोगों की एक दवा--
भई, भाषण दो ! भई, भाषण दो !!

हर गली, सड़क, चौराहे पर
भाषण की गंगा बहती है,
हर एक समझदार नर-नारी के
कानों में कहती रहती है--
मत पुण्य करो, मत पाप करो,
मत राम-नाम का जाप करो,
कम-से-कम दिन में एक बार--
भई, भाषण दो ! भई, भाषण दो !!

भाषण देने से सुनो, स्वयं
नदियों पर पुल बंध जाएंगे
बंध जाएंगे बीसियों बांध
ऊसर हजार उग आएंगे।
तुम शब्द-शक्ति के इस महत्व को
मत विद्युत से कम समझो।
भाषण का बटन दबाते ही
बादल पानी बरसाएंगे।

इसलिए न मैला चाम करो
दिन-भर-प्यारे, आराम करो !
संध्या को भोजन से पहले
छोड़ो अपने कपड़े मैले,
तन को संवार, मन को उभार
कुछ नए शब्द लेकर उधार
प्रत्येक विषय पर आंख मूंद--
भई, भाषण दो ! भई भाषण दो !!

- गोपालप्रसाद व्यास
('हास्य सागर' 1966)

 

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