राष्ट्रभाषा हिंदी का किसी क्षेत्रीय भाषा से कोई संघर्ष नहीं है।' - अनंत गोपाल शेवड़े

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दो फ़कीर

 (कथा-कहानी) 
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रचनाकार:

 शेख़ सादी

दो फ़कीर थे। उनकी आपस में गहरी दोस्ती थी पर दोनों की शक्ल-सूरत और खान-पान में बड़ा अन्तर था। एक मोटा-मुस्टंड़ा था व दिन में कई-कई बार खाने पर हाथ साफ़ करता था। पर दूसरा कई-कई दिन उपवास करता था, इसलिए वह दुबला-पतला था।

एक बार राजा के लोगों को इन फ़कीरों पर शक हुआ कि शायद ये किसी दुश्मन के जासूस हैं। बस, फिर क्या था ? दोनों को पकड़ लिया गया और जेल की काल-कोठरी में डाल दिया गया। कई दिनों बाद जेल के दरवाज़े खुले।

जेल के अधिकारियों ने देखा कि दोनों कैदी धरती पर लुढ़के पड़े थे। उन्होंने देखा कि मोटा-तगड़ा कैदी तो दम तोड़ चुका था, पर दूसरा दुबला-पतला कैदी आँखें मूँदें पड़ा था और कदमों की आहट पाकर उठ बैठा था। लोगों की हैरानी का ठिकाना ना रहा।

सबको हैरान देखकर एक बुद्धिमान व्यक्ति ने कहा, ‘‘ठीक तो है। मोटा-तगड़ा फ़कीर देखने में ही तगड़ा था। असल में उसमें सहने की ताकत दूसरे से कम थी। वह दिन में कई बार खाता था पर जब उसको कई दिन तक खाने को कुछ न मिला तो वह कैसे जिंदा रहता ? हाँ, यह जो जीवित बचा है, इसने कई बार फाके फाके किये होंगे। इसने भूख को रोक सकने की आदत डाल रखी थी जो इस कठिनाई में काम आई।''

 

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