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लगभग बाईस दिनों तक 'कोमा' में रहने के बाद जब उसे होश आया था तो जिस जीवनदायिनी को उसने अपने करीब, बहुत निकट पाया था, वे थी, मारथा मम्मी। अस्पताल के अन्य मरीजों के लिए सिस्टर मारथा । वह पुणे जा रहा था... खंडाला घाट की चढ़ाई पर अचानक वह दुर्घटनाग्रस्त हो गया । ज़ख्मी अवस्था में नौ घंटे तक पड़े रहने के बाद एक यात्री ने अपनी गाड़ी से उसे सुसान अस्पताल में दाखिल करवाया...पूरे चार महीने बाद वह अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया । चलते समय वह मारथा मम्मी से लिपटकर बच्चे की तरह रोया । उन्होंने उसके माथे पर ममत्व के सैकड़ों चुंबन टांक दिए - 'गॉड ब्लेस यू माय चाइल्ड.. ।' डॉ कोठारी से उसने कहा भी था, ''डॉक्टर साहब ! आज अगर मैं इस अस्पताल से मैं जिंदा लौट रहा हूँ तो आपकी दवाइयों और इंजेक्शनों के बल पर नहीं, मारथा मम्मी के प्यार के बल पर । ''
उस रोज वे उसे गेट तक छोड़ने आई थी और जब तक उसकी गाड़ी अस्पताल के गेट से बाहर नहीं हो गई, वे अपलक खड़ी विदाई में हाथ हिलाती रही थी....
वही मारथा मम्मी... आज जब अरसे बाद वह उनसे वार्ड में मिलने पहुँचा तो उन्हें देखकर खुशी से पगला उठा । वे एक मरीज के पलंग से सटी उसकी कलाई थामे धड़कनों का अंदाजा लगा रही थी । उन्होंने मरीज की कलाई हौले से बिस्तर पर टिकाई कि उसने उन्हें अचानक पीछे से बाजुओं में उठा लिया ।
''अरे, अरे, क्या करता है तुम... इडियट... छोड़ो मेरे को! ये अस्पताल है ना ।''
वह सकपका उठा । उन्हें फ़र्श पर खड़ा करते हुए उसने अचरज से मारथा मम्मी को देखा, ''मैं आपका बेटा अशोक, मम्मी पहचाना नहीं आपने मुझे...!''
''पेचाना, पेचाना... पन अभी मेरे को टाइम नई... डियूटी पर ऐसा नई आने का मिलने कू । अब्बी जाओ तुम... देखता नई पेशेंट कितना तकलीफ़ में हय... '' उन्होंने उसे तिक्त स्वर में झिड़का ।
वह उनके अनपेक्षित व्यवहार से स्तब्ध हो उठा, तिलमिलाया-खिसियाया-सा फ़ौरन मुड़ने लगा कि तभी उसी मरीज़ की प्राणवेला कराह सुनकर क्षणांश को ठिठक गया । मरीज़ के पपड़ियाए होंठ पीड़ा से बिलबिलाते बुदबुदा रहे थे । ''माँ... ओ... माँ.. .हा...आ...''
''माय चाइल्ड ऑय अम विद यू। हैव पेशन्स... हैव पेशन्स... '' उसकी मारथा मम्मी अत्यंत स्नेहिल स्वर में उस मरीज़ का सीना सहला रही थीं ।
वह मुड़ा और तेज़ी से वार्ड से बाहर हो गया ।
- चित्र मुद्गल [विविधा भाग - १ ]
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