हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

Find Us On:

English Hindi
Loading
मैं दिल्ली हूँ | पाँच (काव्य)    Print  
Author:रामावतार त्यागी | Ramavtar Tyagi
 

प्राणों से हाथ पड़ा धोना, मेरे कितने ही लालों को ।
बच्चों के प्राणों को हरते, देखा शैतानी भालों को ।।

लूटा मुझको; नोचा मुझको, जितना भी जिसके हाथ लगा।
रंगीन बहारें बीत गई, किस्मत सोई पतझार जगा ।।

मेरे माथे के भूमर को, गौरी ने आकर तोड़ दिया ।
मुझको घायल हिरनी जैसा, केवल रोने को छोड़ दिया ।।

लेकिन जाने इस धरती ने मुझको, कैसा वरदान दिया ।
जिस पतझर ने लूटा मुझको, उसने ही फिर श्रृंगार किया ।।

गौरी ने मुझको कुतबुद्दीन, ऐबक के हाथों सौंप दिया ।
उसने फिर मेरे घर लाकर, खुशियों का पौधा रोप दिया।।

फिर से रौनक; फिर से खुशियाँ, मेरे अाँगन में झूम गयीं।
मेरी सज-धज की चर्चाए, सारी दुनिया में घूम गयीं।।

यह लाटकुतुब की रोज मुझे, उसकी ही याद दिलाती है।
यह चुपके-चुपके मुझको, मेरी गाथा रोज सुनाती है।।

मानव की अमर कला की यह, अद्भुत सी एक निशानी है।
मेरा लम्बा इतिहास इसे, आगे का याद जुबानी है।।

अलतमश अभी तक याद मुझे, बलवन का राज नहीं भूला ।
अब तक काँटों में लिपटा वह, रजिया का ताज नहीं भूला ।।

वह मेरी प्यारी बेटी थी, मेरे सिंहासन की रानी ।
उसकी वह अद्भुत सुन्दरता उसका वह साहस लासानी ।।

मेरी गद्दी पर बैठी जो, वह शायद पहली नारी थी।
उसकी निर्भयता के आगे, पुरुषों की हिम्मत हारी थी ।।

नारी के सोए साहस को, उसने आवाज लगाई थी ।
पुरुषों की ताक़त से उसने, डटकर तलवार चलाई थी ।।

उसको मैं भूल नहीं सकती, रजिया थी एक भवानी थी ।
उस दिन पहले-पहले मैंने, असली नारी पहचानी थी ।।

लेकिन जुल्मों का क्या कहना, जुल्मों ने उसको मार दिया ।
नारी के जीवन में फिर से, किस्मत ने भर अँधियार दिया ।।

वह वंश गुलामों का डूबा, वह राज गया; वह ताज गया ।
आया खिलजी राजाओं का, फिर मेरे घर में राज नया ।।

वह शाह अलाउद्दीन जिसे, सबने जालिम ठहराया था ।
मुझको उसने भी रूप दिया, मेरा घरबार सजाया था ।।

- रामावतार त्यागी [ क्रमश:]

 

Back

Comment using facebook

 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
  Captcha
 

 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश