हिंदी और नागरी का प्रचार तथा विकास कोई भी रोक नहीं सकता'। - गोविन्दवल्लभ पंत।

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हम लोग | फीज़ी पर कहानी (कथा-कहानी)  Click To download this content    
Author:जोगिन्द्र सिंह कंवल

"बिमल, सोचता हूँ मैं वापस चला जाऊं'', प्रोफेसर महेश कुमार ने निराशा भरे स्वर में कहा ।

मुझे उसके इस सुझाव का कारण पता था । फिर भी जान-बूझकर मैंने प्रश्न किया -  "क्यों?"

''कल सूवा में गड़बड़ी हुई है । नैन्दी से कुछ आतंकवादियों ने एयर न्यूज़ीलैंड के विमान को हाइजैक करने की कोशिश की है । अगले सप्ताह तक पता नहीं यहाँ क्या कुछ न हो जाए ।''

"हालात सुधर भी तो सकते हैं, प्रोफेसर साहब ।''

''मैं जानता हूँ कि आप मुझसे जाने के लिये नहीं कहेंगे, क्योंकि मैं आप का मेहमान हूँ । कोई भी शिष्ट व्यक्ति अपने मेहमान से ऐसा नहीं कहेगा, पर मैं भली-भाँति समझ सकता हूँ कि आपको मेरी चिन्ता है । मैं परदेसी हूँ । इस तरह की राजनीतिक उथल-पुथल के समय वर्तमान सरकार मुझे पकड़ भी सकती है ।''

''वह कैसे? आप ने कौन-सा अपराध किया है?''

''भारत सरकार का खुफिया एजेंट समझ कर । तब तुम्हें भी परेशानी हो सकती है ।''

मैं प्रोफेसर महेश की बात सुनकर ज़ोर से हँसा तो वह बोला -

''आप तो मेरी बात को हँसी में उड़ा रहे हैं । पर मैं सब कुछ गंभीरतापूर्वक कह रहा हूँ ।''

''ठीक है ।  मैं आप को नहीं रोकूँगा? मैं आपके मन की दशा समझता हूँ । घर में पत्नी और बच्चे चिन्ता करते होंगे ।" मैंने कहा।

"यहाँ जो कुछ हो रहा है उसकी ख़बर तो हर जगह पहुँच गई होगी । भारत में भी ।  दिल्ली में हमारे घर भी । मेरे मित्र भी चिंता में डूबे होंगे ।  दूसरे, मैं यहाँ जिस काम के लिये आया हूँ,  वह भी तो नहीं हो सकेगा ।  ऐसे माहौल में कहीं भी जाकर लोगों से मिल पाने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता।" प्रोफेसर महेश ने बड़ी अधीरता से कहा।

मैं कुछ चुप रहा । उसके चेहरे पर उदासी की फैलती रेखाओं को देखा । फिर मैंने धीरे से कहा- "आप की इस बात से तो मैं सहमत हूँ लेकिन यह एजेंट-वेजेंट वाली बात बिल्कुल बेकार है ।"

मेरी बात सुनकर उसके होठों पर संतोष-भरी एक हल्की-सी मुस्कान फैल गई । अपनी बात पर ज़ोर देते हुए कहा - ''हम अपने ही घर में क़ैदियों की तरह बंद रहेंगे । जिन लोगों से हमें मिलना
है, वे तो फीजी के लगभग हर शहर में हैं । इन परिस्थितियों में क्या हम कहीं जा सकते हैं? ''

प्रोफेसर महेश का विचार ठीक था । हम कितनी देर तक बातों में उलझे रहे, पता ही नहीं चला । बातों-बातों में दिन ढल गया ।

वह बहुत उदास शाम थी । बोझल और थकी सी । बाहर सड़कों पर सनसनाहट और वीरानगी । घर के भीतर हम लोग रेड़ियो से कान लगा कर समाचार सुन रहे थे । परिवार का कोई भी सदस्य कुर्सी या सोफे पर नहीं बैठा था । सब नीचे आसन जमाये हुए थे क्योंकि हमने रेड़ियो को उसके ऊंचे स्थान से उतार कर फर्श पर रखा हुआ था । कोई भी रेडियो और अपने बीच किसी दूरी को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं था । कोई पालथी मार कर बैठा था कोई लेट रहा था । मैं और प्रोफेसर महेश दीवार के साथ पीठ टिका कर और पाँव पसार कर बैठे हुए थे । वातावरण में फैल रही अफवाहें मनों में दहशत पैदा कर रही थीं । तरह-तरह की शंकायें जन्म ले रही थीं । कल क्या होगा? इस प्रश्न का उत्तर हमारी कल्पना से बाहर था ।

प्रोफेसर महेश दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले पन्द्रह वर्षो से अध्यापन और शोध कार्य में जुटा हुआ है । वैसे रहनेवाला वह उत्तर प्रदेश के बनारस जिले का है लेकिन दिल्ली में रहते-रहते वहीं का हो गया है । एक आकर्षण जो उसे अपने इलाके से बाँधे रखता है वह उसका गाँव रामपुर है । बनारस से तीस मील पूर्व की ओर । साफ सुथरी छोटी सी बस्ती । हरियाली से घिरी हुई । छोटे-छोटे कच्चे मकान । परिश्रमी और हँसमुख लोग । जब शहर के शोर-शराबे से प्रोफेसर का जी उकता जाता है तो वह अपने गाँव के शांत तथा उल्लासपूर्ण वातावरण में चला जाता है ।


- जोगिन्द्र सिंह कंवल

क्रमश:

 

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