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दीक्षा | कहानी

 (कथा-कहानी) 
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रचनाकार:

 स्वामी विवेकानंद

एक व्यक्ति बहुत दुष्ट था। एक दिन जब वह दुष्कर्म करते हुए पकड़ा गया तो दंडस्वरूप उसकी नाक काट कर उसे भगा दिया गया। अब वह व्यक्ति अपने नक-कटे मुँह को लेकर लोगों के सामने कैसे जाता! यह मुँह किसी को दिखाने के योग्य कहाँ रह गया था ? उसका मन अपार दु:ख से भर-सा गया था। अंत में बहुत सोच विचार करने के पश्चात् उसने निश्चय किया कि जंगल ही उसके लिए उपयुक्त स्थान है। वह जंगल में वास करने लगा।

उसने किसी तरह से बाघ की खाल हासिल की और साधु का भेष बनाया। उस खाल को बिछा अपना आसन जमा कर बैठ गया। किसी को आता देखकर तुरंत गंभीर ध्यान की मुद्रा बना लेता। लोग उसे बड़ा सिद्ध महात्मा समझने लगे और धीरे-धीरे उसकी ख्याति फैल गई। उसके दर्शन के लिए लोगों का ताँता बँध गया। एक लोगों का झुंड जाता, दूसरा चला आता। वह किसी व्यक्ति या दर्शक के साथ बातचीत न करता, इस भय से कि कहीं उसकी नाक काटने की बात का पता न चल जाए। सभी समझने लगे कि यह ‘मौनी साधु' है। इससे लोगों की उस पर श्रद्धा और बढ़ गई। श्रद्धालु लोग उसके खाने को भोजन, वस्त्र, रुपया-पैसा आदि उपहार के रूप में देने लग गए। अब उसे लगा कि यह तो जीवन-यापन का सरल-साधन बन गया है। इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए।

इस नककटे साधु की ख्याति दिनों-दिन दूर-दूर तक फैल गई।  बहुत से लोग उपदेश का आग्रह करने लगे। एक नवयुवक उस से बहुत प्रभावित हो गया। युवक ने सोचा कि यदि वह इस महात्मा को अपना गुरु बना सके तो उसका जीवन धन्य हो जाएगा। ऐसे उच्च साधु का शिष्य होना परम सौभाग्य की बात है। ऐसा मौनव्रतधारी, ध्यान-परायण साधु उसने कभी न देखा था।

एक दिन लड़के ने साधु से कहा, "बाबा! मैंने आप जैसा श्रेष्ठ साधु कहीं देखा नहीं। आप मुझे सन्यास की दीक्षा देकर अपना शिष्य बना लीजिए। मुझ पर अवश्य कृपा कीजिए।"

साधु बड़ी विपदा में पड़ गया। किंतु युवक प्रतिदिन उसके पास आकर आग्रह करने लगा। इस प्रकार कईं दिन व्यतीत हो गए। नौजवान लड़का प्रतिदिन उसके पास आता और शिष्य बनने के लिए कातर भाव से अनुरोध करता। अंत में नौबत यहाँ तक आ पहुँची कि उसे शिष्य न बनाने पर साधू को अपनी प्रतिष्ठा भंग होने का भय सताने लगा।  साधु ने सोचा कि अब वह क्या करे? सोचते-सोचते अंत में उसने एक उपाय ढूंढ लिया। एक दिन युवक को अकेला पाकर साधु ने अपना मौत त्याग उस युवक से वार्तालाप किया। इस से युवक को न जाने कितना आनंद प्राप्त हुआ। नकटे साधु ने कहा,"अच्छा, कल भोर के समय मैं तुम्हें सन्यास की दीक्षा दूँगा। एक उस्तरा साथ ले आना।"

दूसरे दिन भोर होने से पहले ही युवा उस्तरा हाथ में लेकर साधु के पास आ गया।
साधु ने पूछा, "उस्तरा ले आए हो ?"

"हाँ, महाराज! यह रहा।"

युवक ने अत्यंत भक्ति-भाव से उस्तरा साधु के हाथ में देकर प्रणाम किया। साधु ने कहा, "मेरे साथ आओ। यहाँ यह काम नहीं होगा। उपयुक्त स्थान पर जाकर तुम्हें दीक्षा दी जाएगी।"

युवक को साथ लेकर साधु जंगल में पहुँचा। वहाँ एक अच्छा-सा स्थान देखकर युवक से बोला, "यहाँ आँखें बंद करके बैठ जाओ। मैं तुम्हें दीक्षा देता हूँ।"

युवक ने आज्ञा का पालन किया साधु ने तुरंत उस्तरे से युवक की नाक काट डाली। साधु के इस व्यवहार से युवक के होश ठिकाने ना रहे। नकटा गुरु शिष्य से गंभीर भाव से बोला, "देखो बेटा, यही मेरी दीक्षा है। मुझे भी इसी प्रकार दीक्षा मिली थी और मैं भी इसी प्रकार सन्यासी बना था। तुम्हें भी मैंने उसी ढंग से सन्यासी बना दिया है। अब से तुम भी मेरी तरह से साधुता या फ़कीरी करके खाएगा। सुविधा पाकर तुम भी अन्य लोगों को इसी ढंग से दीक्षा दिया करना।"

यह कहकर नकटा साधु अपने स्थान पर चला गया। शिष्य ने लज्जा के मारे अपनी दीक्षा की कहानी किसी को नहीं बताई। फिर भी गुरु के उपदेश के पालन का भरसक प्रयत्न करता रहा।

इस प्रकार से देश में नकटे साधुओं का एक पूरा संप्रदाय स्थापित हो गया।

 

[ स्वामी विवेकानंद पवहारी बाबा से इतने प्रभावित हुए थे कि वे उनसे दीक्षा लेना चाहते थे। बार-बार जब यही आग्रह करते रहे तो पवहारी बाबा ने स्वामी विवेकानंद को यह कहानी सुनाई थी।

उपरोक्त कहानी समाप्त करके पवहारी बाबा ने स्वामी विवेकानंद से पूछा, "मैं लोगों को क्या शिक्षा दूँ? क्या आप कहते हैं कि अंत में मैं भी इसी प्रकार नकटे साधुओं का एक दल तैयार कर डालूं? ]

भारत-दर्शन संकलन

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