वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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ज्ञान (कथा-कहानी)    Print  
Author:स्वामी विवेकानंद
 

एक बार स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस से पूछा, "बहुत-से पंडित अनेक शास्त्रों का पाठ करते हैं। वेद-पाठ में ही संपूर्ण जीवन बिता देते है तथापि उन्हें ज्ञान-लाभ क्यों नहीं होता?"

स्वामी जी ने हँसते हुए उत्तर दिया, "चील, गिद्ध आदि पक्षी उड़ते तो बहुत ऊँचाई पर हैं, लेकिन उनकी दृष्टि पृथ्वी पर पड़े मांस के टुकड़ों पर ही रहती है। ठीक उसी प्रकार वेद-शास्त्रों एवं ग्रंथों का पाठ करने से क्या लाभ होगा? यदि मन हमेशा सांसारिक वस्तुओं की ओर ही लगा रहे।"

[भारत-दर्शन संकलन]

 

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