वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं। - मैथिलीशरण गुप्त।

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सागर के वक्ष पर (काव्य)    Print  
Author:स्वामी विवेकानंद
 

नील आकाश में बहते हैं मेघदल,
श्वेत कृष्ण बहुरंग,
तारतम्य उनमें तारल्य का दीखता,
पीत भानु-मांगता है विदा,
जलद रागछटा दिखलाते ।

बहती है अपने ही मन से समीर,
गठन करता प्रभंजन,
गढ़ क्षण में ही, दूसरे क्षण में मिटता है,
कितने ही तरह के सत्य जो असम्भव हैं -
जड़ जीव, वर्ण तथा रूप और भाव बहु ।

आती वह तुलाराशि जैसी,
फिर बाद ही लखो महानाग,
देखो विक्रम दिखाता सिंह,
लखो युगल प्रेमियों को,
किन्त मिल जाते सब
अन्त में आकाश में ।

नीचे सिन्धु गाता बहु तान,
महीमान किंतु नहीं वह,
भारत, तुम्हारी अम्बुराशि विख्यात है,
रूप-राग जलमय हो जाते हैं,
गाते हैं यहाँ किन्तु
करते नहीं गर्जन।


- स्वामी विवेकानंद
[ विवेकानन्द साहित्य]
'सागर के वक्ष पर' स्वामीजी की बंग्ला कविता, 'सागरे वक्षे' का अनुवाद है। नीचे हम अँग्रेज़ी कविता भी प्रकाशित कर रहे हैं ताकि आप इसे भी पढ़ सकें।

 

#

On the Sea's Bosom

In blue sky floats a multitude of clouds --
White, black, of many shades and thicknesses;
An orange sun, about to say farewell,
Touches the massed cloud-shapes with streaks of red.

The wind blows as it lists, a hurricane
Now carving shapes, now breaking them apart:
Fancies, colours, forms, inert creations --
A myriad scenes, though real, yet fantastic.

There light clouds spread, heaping up spun cotton;
See next a huge snake, then a strong lion;
Again, behold a couple locked in love.
All vanish, at last, in the vapoury sky.

Below, the sea sings a varied music,
But not grand, O India, nor ennobling:
Thy waters, widely praised, murmur serene
In soothing cadence, without a harsh roar.

- Swami Vivekananda

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