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सपने अगर नहीं होते | ग़ज़ल (काव्य)  Click To download this content    
Author:उदयभानु हंस | Uday Bhanu Hans

मन में सपने अगर नहीं होते,
हम कभी चाँद पर नहीं होते ।

सिर्फ़ जंगल में ढूँढ़ते क्यों हो ?
भेड़िए अब किधर नहीं होते ।

जिनके ऊँचे मकान होते हैं,
दर-असल उनके घर नहीं होते ।

प्यार का व्याकरण लिखें कैसे,
भाव होते हैं, स्वर नहीं होते ।

कब की दुनिया मसान बन जाती,
उसमें शायर अगर नहीं होते ।

वक्त की धुन पे नाचने वाले
नामवर हों, अमर नहीं होते ।

मूल्य जीवन के क्या कुँवारे थे?
उनके क्यों वंशधर नहीं होते ?

किस तरह वो ख़ुदा को पाएंगे,
खुद से जो बे-ख़बर नहीं होते ?

पूछते हो पता ठिकाना क्या,
हम फ़कीरों के घर नहीं होते।

 

- उदयभानु 'हंस', राजकवि हरियाणा
  साभार-दर्द की बांसुरी [ग़ज़ल संग्रह]

 

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