अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं। - अनंतशयनम् आयंगार।

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लौटना - सुशांत सुप्रिय की कहानी (कथा-कहानी)    Print  
Author:सुशांत सुप्रिय
 

समुद्र का रंग आकाश जैसा था । वह पानी में तैर रही थी । छप्-छप्, छप्-छप् । उसे तैरना कब आया ? उसने तो तैरना कभी नहीं सीखा । फिर यह क्या जादू था ? लहरें उसे गोद में उठाए हुए थीं । एक लहर उसे दूसरी लहर की गोद में सौंप रही थी । दूसरी लहर उसे तीसरी लहर के हवाले कर रही थी । सामने, पीछे, दाएँ, बाएँ दूर तक फैला समुद्र था । समुद्र-ही समुद्र। एक अंतहीन नीला विस्तार ।

"सिस्टर , रोगी का ब्लड-प्रेशर चेक करो ।" पास ही कहीं से आता हुआ एक भारी स्वर ।

"डाक्टर, पेशेंट का ब्लड-प्रेशर बहुत 'लो' है ।"

"सिस्टर, नब्ज़ जाँचो ।"

"नब्ज़ बेहद धीमी चल रही है, सर ।"

लहरें नेहा को समुद्र की अतल गहराइयों में लिए जा रही हैं । वह लहरों पर सवार हो कर नीचे जाती जा रही है । नीचे, और नीचे । वहाँ जहाँ कोई गोताखोर पहले कभी नहीं जा पाया । कमाल की बात यह है कि उसके पास कोई अॉक्सीजन -सिलिंडर नहीं है । नीचे समुद्र का तल सूरज-सा चमक रहा है । उसे अपने पास बुला रहा है । उसे आग़ोश में लेना चाह रहा है । आह ! समुद्र का जल कितना साफ़ है । कितना स्वच्छ है । कितना पारदर्शी ।
नर्सें और डॉक्टर आपस में बातें कर रहे हैं ।

"सिस्टर , क्या पेशेंट यूरिन पास कर रही है ?" एक भारी स्वर पूछ रहा है ।

"नहीं , डॉक्टर ।" दूसरा मुलायम स्वर जवाब दे रहा है ।


पानी में बुलबुले उठ रहे हैं । नेहा बुलबुलों के जाल में क़ैद होती जा रही है । बुलबुलों के भीतर आवाज़ें बंद हैं, जो उनके फूटते ही फैलती जा रही हैं । रोगी के चारो ओर डॉक्टरों और नर्सों की टोली जमा है । उसकी पलकें उठा कर आँखों में टॉर्च की रोशनी मारी जा रही है ।

"डॉक्टर, इसे साँस लेने में तकलीफ़ हो रही है ।" वही मुलायम स्वर ।

समुद्र का तल नेहा को अपने पास बुला रहा है । वह तेज़ी से गोता लगाती हुई
नीचे की ओर जा रही है । पर तल पास क्यों नहीं आ रहा ?

"डॉक्टर, रोगी का हार्ट-बीट सही नहीं आ रहा ।" वही मुलायम आवाज़ समुद्र की लहरों में डूब-उतरा रही है ।

नेहा बेहद थक गई है । वह देर तक सोना चाहती है । उसकी आँखें मुँद रही
हैं । उसके हाथ-पैर शिथिल होते जा रहे हैं । उसे ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने उसके सीने पर एक बड़ा-सा भारी पत्थर रख दिया हो । उसके चारो ओर एक मनहूस अँधेरा छाता जा रहा है । अचानक यह काली रात कहाँ से आ गई है ? ये चाँद और सितारे कहाँ छिप गए हैं ? उसकी साँसें क्यों उखड़ रही हैं...।

"डॉक्टर, शी इज़ सिंकिंग ।"

"सिस्टर, पुट हर ऑन लाइफ़-सपोर्ट सिस्टम ... क्विक्ली ।" भारी स्वर जैसे बहुत दूर से यह कह रहा है ।

और फिर अचानक चारो ओर उजाला हो जाता है । नेहा समुद्र-तल पर पहुँच गई है । वहाँ सब कुछ चमक रहा है । जगमग-जगमग । उसे अब कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा । यह क्या जादू है ? वह अपने दर्द से मुक्त कैसे हो गई? उसकी थकान अचानक कैसे दूर हो गई ? नेहा कुछ नहीं समझ पा रही है। चारो ओर रोशनी के असंख्य पुंज जगमगा रहे हैं । वह उन्हें छूना चाहती है । उन्हीं में से एक पुंज बन जाना चाहती है । क्या असीम आकर्षण है उनमें । यह क्या ? रोशनी के पुंज जानी-पहचानी शक्लों में बदल रहे हैं ।

"माँ ? बाबूजी ? आप यहाँ ? पर आप तो कई साल पहले चल बसे थे ? आप दोनो मुझे छोड़ कर यहाँ क्यों चले आए ? आप दोनो के जाने के बाद मैं कितना रोई थी ...।"

"आ जा बेटी , आ जा । अब तू हमारे साथ रहेगी ...।"

व्हेल मछलियाँ नाच रही हैं ।

शार्क मछलियाँ गीत गा रही हैं ।

समुद्री कछुए भी गुनगुना रहे हैं ।

"तुम हममें से एक हो ...।"

लहरें नेहा को सीने से लगाकर थपकियाँ दे रही हैं ।

लहरों के बीच प्रकाश-पुंज-सी माँ मुस्करा रही है । लहरों के बीच प्रकाश-पुंज-से पिता हाथ हिला कर पास बुला रहे हैं । पिता का सीना आकाश जितना बड़ा है । माँ की मुस्कान धरती जितनी बड़ी है ।

"मैंने आप दोनो को बहुत ढूँढ़ा ।"

"अपने भीतर ढूँढ़ा , बिटिया ?"

नेहा माँ का आँचल पकड़कर उस से खेल रही है । पिता का आशीष भरा हाथ उसके सिर पर है । वह फिर से छोटी बच्ची बन गई है । पिता ने उसे गोद में उठा लिया है । पिता की गोद में समुद्र की लहरें भरी हैं । पिता की गोद में रंग-बिरंगी मछलियाँ तैर रही हैं । नेहा उन लहरों में छप्-छप् कर रही है ।

"केस बिगड़ रहा है ।" वही भारी आवाज़ फिर से चेतना के दरवाज़े पर दस्तक दे रही है ।

"माँ , तुम कितनी सुंदर लग रही हो । बाबूजी , आप कितने बाँके लग रहे
हैं ।"

"धत्, पगली ... ।"

आइ. सी. यू. के बाहर नेहा का पति भुवन और दूसरे सगे-सम्बन्धी बेचैनी से चहलक़दमी कर रहे हैं ।

कुछ नर्सें और एक डॉक्टर आइ. सी. यू. से निकल कर तेज़ी से चलते हुए जा रहे हैं ।

"क्या हुआ , डॉक्टर साहब ?" भुवन की आवाज़ में चिंता है ।

"पेशेंट इज़ क्रिटिकल । बट वी आर ट्राइंग आवर बेस्ट । प्रे फ़ॉर हर ।"

भुवन दोनो हाथ जोड़ कर गायत्री मंत्र का जाप करने लगा है -- " ऊँ भूर्भुव: स्व: तत्स वितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात
"

भुवन के पिता साँई बाबा की प्रार्थना कर रहे हैं ...

"माँ-बाबूजी , मैं आपको ' श्रीरामचन्द्रजी कृपालु भजु मन ' वाली स्तुति सुनाऊँ ? " नेहा कह रही है ।

"हाँ , बेटी । सुनाओ न ।"

"श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भव भय दारुणं ।
नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुणं
।"

लहरें भी स्वर में स्वर मिला रही हैं । समुद्र के सभी जीव-जन्तु हाथ जोड़े एक स्वर में गा रहे हैं ...

"कंदर्प अगणित अमित छवि , नवनील नीरद सुंदरं ।
पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं
।"

चारो दिशाएँ श्री रामजी की स्तुति का गान कर रही हैं । एक-एक स्वर का उच्चारण स्पष्ट सुनाई दे रहा है ।

"जानि गौरि अनुकूल , सिय हिय हरषु न जाइ कहि ।
मंजुल मंगल मूल, वाम अंग फरकन लगे ।।"

"सिस्टर , एनी इम्प्रूवमेंट ?" आइ. सी. यू से बाहर निकल कर तेज़ी से भागी जा रही एक नर्स से भुवन पूछ रहा है ।

"प्रार्थना कीजिए ।"

भुवन की आँखों में आँसू हैं । किंतु उसके हाथ प्रार्थना की मुद्रा में जुड़ गए हैं । उसके होठ श्रीराम-स्तुति जैसा कुछ बुदबुदा रहे हैं ...

"... सियावर रामचन्द्र की जय ।
पवनसुत हनुमान की जय ।
उमापति महादेव की जय ।।"

"बिटिया तुम्हें अब भी पूरी स्तुति कंठस्थ है । तुम कितनी अच्छी आवाज़ में यह गाती हो ।" माँ-बाबूजी नेहा को आशीष दे रहे हैं ।

"पिताजी, आप ही ने तो बचपन में मुझे यह स्तुति सिखाई थी । याद है, हर रोज़ रात में सोने से पहले आप यह स्तुति हम सबको गा-गा कर सुनाते थे ।"

"बेटी, अब तुम हमारे पास रहो । हमें रोज़ यह स्तुति गा कर सुनाना ।"

"माँ-बाबूजी, मैं आप दोनो से बहुत प्यार करती हूँ । मैं यहाँ रहना तो चाहती हूँ पर वहाँ भुवन और बेटी पिकी मेरी राह देख रहे होंगे । मुझे लौटना होगा ...। "

... अब लहरें नेहा को कहीं दूर लिए जा रही हैं । यह अंतहीन नीला विस्तार न जाने कहाँ ख़त्म होगा -- वह सोचती है ।

अरे, यह कैसी सुरंग है । नेहा सुरंग में चलती चली जा रही है । दूसरी ओर तेज़ रोशनी है । वह दूसरी ओर से सुरंग से बाहर निकल आई है । उसके मुँह से बुलबुले निकल रहे हैं । उसके इर्द-गिर्द ऑक्टोपस और रंग-बिरंगी मछलियाँ तैर रही हैं । चारो ओर अजनबी प्रकाश-पुंज नज़र आ रहे हैं ।

अब नेहा के सामने एक नन्हा प्रकाश-पुंज खड़ा है ।

"अरे, पुलक, मेरे लाल ! मुझे पता था , तुम मुझे दोबारा मिलोगे, बेटा ! सब कहते थे, भगवान् ने तुम्हें अपने पास बुला लिया । पर मैंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ी थी । आ, अपनी माँ के सीने से लग जा, मेरे जिगर के टुकड़े । तू तो मेरा अंश है, बेटा ! मैंने नौ महीने तुझे अपनी कोख में जिया था । भगवान् इतना हृदयहीन कैसे हो सकता था कि एक माँ को उसके बच्चे से अलग कर दे । आ जा, बेटा, वहाँ तेरे पापा और बहन पिकी तेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं । मेरे साथ चल, मेरे लाल ! आज तेरे चेहरे पर कितना ओज है, बेटा । उस दिन जब स्कूल-बस का पहिया तेरी कमर पर से निकल गया था, तब तेरा गोरा चेहरा कैसे कोयले-सा काला हो गया था । जब वे तुझे मेरे पास लाए थे, तू ख़ून से लथपथ था । दर्द तेरे चेहरे पर पत्थर-सा जम गया था । पर मैं जानती थी, तू केवल गहरी नींद सो रहा था । मैं जानती थी तू जाग कर भला-चंगा हो जाएगा । आ जा, मेरे बेटे, अपनी माँ के सीने से लग जा । तू कुछ बोलता क्यों नहीं ? ये लहरें मुझे तुझ से दूर क्यों लिए जा रही हैं । कोई इन्हें रोको...

अचानक ये धूप कहाँ चली गई है ? यह अँधेरा गाढ़ा क्यों होता जा रहा है ? कोई मुझे इस बुलबुलों के भँवर से बचाओ ...। "


"डॉक्टर, आप क्या कहते हैं ? इज़ देयर एनी होप ? " एक भारी आवाज़ दूसरी से पूछ रही है ।

"मरीज़ की हालत बहुत ख़राब है । ज़्यादातर वाइटल-आर्गन्स ने काम करना बंद कर दिया है । अब तो यह केवल वेंटिलेटर के सहारे ज़िंदा है ।" दूसरी खुरदरी आवाज़ कह रही है ।


"बाहर इसके रिश्तेदार प्रे कर रहे हैं ।"

"अब शायद प्रार्थना ही कुछ कर सके ।"

... लहरें नेहा को कहीं और ले आई हैं । आस-पास मौजूद प्रकाश-पुंजों में नेहा को वे कई चेहरे दिख रहे हैं जिन्हें वह जानती थी पर जो वर्षों पहले गुज़र चुके थे ... दादा... दादी... रूनी दीदी ... संजू चाचा ... गुन्नो बुआ ... रिंकी मौसी ... गली का वह चौकीदार जो बदमाशों से लड़ते हुए मारा गया था ...


"हे भगवान्, आप सब यहाँ हैं । और मैं समझ रही थी कि आप सब नहीं रहे । यह कौन-सी जगह है ? मैं कहाँ आ गई हूँ ?" नेहा हैरानी से कह रही है ।
" आओ , बिटिया ! तुम्हारा स्वागत है । अब तुम हमारे पास रहो । यहाँ तुम्हें कोई तकलीफ़ नहीं होगी । "

"शुक्रिया । आप सब से मिल कर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है । मैं आप लोगों को कितना मिस करती थी । लेकिन मैं यहाँ नहीं रह सकती । वहाँ मेरे पति भुवन और बेटी पिकी मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं । अगर मैं वापस नहीं गई तो भुवन और पिकी की देखभाल कौन करेगा ? उनका ख़याल कौन रखेगा ? पिकी को हर रोज़ तैयार करके स्कूल कौन भेजेगा ? उसका होम-वर्क पूरा कौन कराएगा ? और असली बात तो यह है कि मैं भुवन और पिकी के बिना नहीं रह सकती । इसलिए मुझे मत रोकिए । मुझे लौटने दीजिए...।" लहरों पर सवार हो कर नेहा लौट रही है । समुद्र उसे रास्ता दे रहा है । मछलियाँ , अॉक्टोपस और समुद्री कछुए उसे 'बॉय' कह रहे हैं । प्रकाश-पुंजों से मिल कर वह वापस लौट रही है ...


"डॉक्टर , देखिए ! मरीज़ में हरकत हुई !" मुलायम आवाज़ पास लौट आई है ।

"अमेज़िंग ! शी हैज़ कम बैक ।" खुरदरी आवाज़ हैरानी से कह रही है ।

"देखिए, पेशेंट के सारे सिस्टम स्टैबिलाइज़ हो रहे हैं ।" भारी आवाज़ भी अब पास आ गई है ।

"शायद यह प्रार्थनाओं का ही असर होगा । बाहर इसके रिश्तेदारों को बता दो । "

नेहा के थोड़ा ठीक हो जाने के बाद डॉक्टरों ने भुवन को आइ. सी. यू. में आकर नेहा से मिलने की इजाज़त दे दी है ।

"तुम ठीक हो नेहा ! डॉक्टर कह रहे हैं अब घबराने की कोई बात नहीं है ।

"भुवन एक हाथ से नेहा का हाथ थाम कर दूसरे हाथ से उसका माथा सहला रहा है ।

"भुवन ... मैं वहाँ गई थी ... मैं सबसे मिली थी ... माँ , बाबूजी , पुलक ... सबसे ...
"

"क्या कह रही हो नेहा ? "

"हाँ , भुवन ... सारा समय... मैं डॉक्टरों और नर्सों ... की आवाज़ भी ... साफ़-साफ़ सुन रही थी ...
"

"शी इज़ अ लिट्ल डिसओरिएंटेड । ऐसे केस में यह हो जाता है । अब पेशेंट को आराम करने दीजिए ।" नेहा अब उस भारी आवाज़ वाले डॉक्टर को देख सकती है ।

"नहीं , भुवन ... मैं वहाँ ... सचमुच गई थी ... ।" नेहा क्षीण स्वर में कह रही है ।

नियर डेथ् एक्सपीरिएंस ? क्या नेहा को आसन्न मृत्यु अनुभव हुआ है ? यह सोचता हुआ भुवन आश्चर्य से नेहा को देखता है । फिर वह अपनी उँगली उसके होठों पर रख कर उसे चुप रहने का इशारा करता है और धीरे से उसका माथा चूम लेता है ।

"मैं मंदिर में प्रसाद चढ़ा कर आता हूँ ।" वह केवल इतना कहता है । वह चलने लगता है तभी नेहा भुवन का हाथ पकड़ लेती है ।

"मैं ... लौट आई हूँ भुवन ... तुम्हारा और पिंकी का प्यार ... मुझे वापस लौटा लाया है ... ।"

जैसे गहरी खाई के मुहाने से नीचे झाँक कर कोई लौट आता है सकुशल, वैसे लौट आई हूँ मैं, तुम सबके लिए -- नेहा सोचती है । फिर उसके होठ अपने-आप श्रीराम-स्तुति जैसा कुछ बुदबुदाने लगते हैं ...


सुशांत सुप्रिय
A-5001, गौड़ ग्रीन सिटी, वैभव खंड, इंदिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद -201010 ( उ. प्र. )
मो: 8512070086
ई-मेल : sushant1968@gmail.com

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