जब हम अपना जीवन, जननी हिंदी, मातृभाषा हिंदी के लिये समर्पण कर दे तब हम किसी के प्रेमी कहे जा सकते हैं। - सेठ गोविंददास।

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कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर और मुंशी प्रेमचंद  (कथा-कहानी)    Print  
Author:मुंशी प्रेमचंद | Munshi Premchand
 

एक बार कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' मुंशी प्रेमचंद से पूछ बैठे, "मुंशीजी आप कैसे कागज़ पर और कैसे 'पेन' से लिखते हैं?"

प्रेमचंद ज़ोर से हँसे और उत्तर दिया, "ऐसे काग़ज पर जिसपर पहले से कुछ न लिखा हो और ऐसे 'पेन' से जिसका निब न टूटा हो!" फिर ज़रा गंभीर होकर बोले, "भाई जान! ये सब 'चोंचले' हम जैसे कलम के मज़दूरों के लिए नहीं हैं !"

[भारत-दर्शन संकलन]

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