जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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सजनवा के गाँव चले  (काव्य)    Print  
Author:आनन्द विश्वास (Anand Vishvas)
 

सूरज उगे या शाम ढले,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

सपनों की रंगीन दुनियाँ लिये,
प्यासे उर में वसन्ती तमन्ना लिये।
मेरे हँसते अधर, मेरे बढ़ते कदम,
अश्रुओं की सजीली सी लड़ियाँ लिये।

कोई हँसे या कोई जले,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

आज पहला मिलन है अनोंखा मिलन,
धीर धूलि हुआ, जाने कैसी लगन।
रात होने लगी, साँस खोने लगी,
चाँद तारे चमकते बहकते नयन।

कोई मिले या कोई छले,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

दो हृदय का मिलन बन गया अब रुदन,
हैं बिलखते हृदय तो बरसते नयन।
आत्मा तो मिली जा प्रखर तेज से,
है यहाँ पर बिरह तो, वहाँ पर मिलन।

श्रेय मिले या प्रेय मिले,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

दुलहन आत्मा चल पड़ी देह से,
दो नयन मिल गये जा परम गेह से।
माँ की ममता लिये देह रोती रही,
मग भिगोती रही प्यार के मेह से।

ममता हँसे या आँसू झरे,
मेरे पाँव सजनवा के गाँव चले।

-आनन्द विश्वास

 

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