हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

Find Us On:

English Hindi
Loading
सोऽहम् | कविता (काव्य)    Print  
Author:चंद्रधर शर्मा गुलेरी | Chandradhar Sharma Guleri
 

करके हम भी बी० ए० पास
          हैं अब जिलाधीश के दास ।
पाते हैं दो बार पचास
         बढ़ने की रखते हैं आस ॥१॥


खुश हैं मेरे साहिब मुझ पर
         मैं जाता हूँ नित उनके घर ।
मुफ्त कई सरकारी नौकर
         रहते हैं अपने घर हाजिर ॥२॥

पढ़कर गोरों के अखबार
         हुए हमारे अटल विचार,

अँग्रेज़ी मे इनका सार,
         करते हैं हम सदा प्रचार ॥३॥


वतन हमारा है दो-आब,

        जिसका जग मे नहीं जवाब ।
बनते बनते जहां अजाब,
        बन जाता है असल सवाब ॥४॥

ऐसा ठाठ अजूबा पाकर,
        करें किसी का क्यों मन में डर ।

खाते पीते हैं हम जी भर,
        बिछा हुआ रखते हैं बिस्तर ॥५॥

हमें जाति की जरा न चाह,
नहीं देश की भी परवाह ।
हो जावे सब भले तबाह,
हम जावेंगे अपनी राह ॥६॥

- चन्द्रधर शर्मा गुलेरी

[सरस्वती १९०७ में प्रकाशित गुलेरी जी की रचना]

Back

Comment using facebook

 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
  Captcha
 

 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश