हिंदी के पुराने साहित्य का पुनरुद्धार प्रत्येक साहित्यिक का पुनीत कर्तव्य है। - पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल।

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दिन अँधेरा-मेघ झरते | रवीन्द्रनाथ ठाकुर (काव्य)    Print  
Author:रबीन्द्रनाथ टैगोर | Rabindranath Tagore
 

यहाँ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचना "मेघदूत' के आठवें पद का हिंदी भावानुवाद (अनुवादक केदारनाथ अग्रवाल) दे रहे हैं। देखने में आया है कि कुछ लोगो ने इसे केदारनाथ अग्रवाल की रचना के रूप में प्रकाशित किया है लेकिन केदारनाथ अग्रवाल जी ने स्वयं अपनी पुस्तक 'देश-देश की कविताएँ' के पृष्ठ 215 पर नीचे इस विषय में टिप्पणी दी है।

दिन अँधेरा-मेघ झरते,
खल पवन के, आक्रमण से
वन दुखी बाहें उठाए
रोर हाहाकार करता
चपल चपला जलद पट को
छिन्न करके झाँकती है
हास बंकिम हृदयभेदी
शून्य से भू पर बरसता।

- रवीन्द्रनाथ ठाकुर

 

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