हिंदी ही भारत की राष्ट्रभाषा हो सकती है। - वी. कृष्णस्वामी अय्यर

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बस एक ही इच्छा (कथा-कहानी)    Print  
Author:डॉ रमेश पोखरियाल निशंक
 

उसका भोला-भाला चेहरा न जाने क्यों मुझे बार-बार अपनी ओर आकर्षित किये जा रहा था। उसने मेरा सूटकेस पकड़ा और कमरे की ओर चल दिया। कमरे से सम्बंधित सभी जानकारी देने के बाद वह बोला अच्छा बाबू जी ! मैं चलूं? मेरी स्वीकृति के बाद वह लौट गया।

उसका शांत चेहरा किसी मजबूरी का अहसास करा रहा था। हाथ मुंह धोने के उपरान्त मैंने चाय के लिए घण्टी बजाई। दरवाजा बन्द था। आहट पाकर मैंने दरवाजा खोला तो देखा वही लड़का आकर खड़ा है।

मैं उसके चेहरे को देखकर भूल ही गया कि किस कार्य के लिये मैंने उसे बुलाया

'बाबू जी कहिए?' उसने पूछा।

थोड़ी देर चुप रहने के बाद मुझे याद आई।

'हां, नाश्ते में क्या मिल पायेगा?'

'आप जो चाहें।'

उसने किसी टेपरिकार्डर की तरह अनेकों चीजों के नाम गिना डाले, फिर पूछा 'बताइये क्या लाऊं?

मैंने उससे डबल रोटी-मक्खन और साथ में चाय लाने को कहा। एक बार इच्छा हुई कि इसके बारे में कुछ पूछू, किन्तु हिम्मत न हुई। न जाने क्या सोचेगा वह कि अभी-अभी तो आया है और आते ही नाम-पता पूछना शुरू कर दिया है।

थोड़ी ही देर बाद नाश्ते की ट्रे लिये फिर वही आ गया, और मेज पर रखते हुये 'और कुछ चाहिये साहब' कह कर उत्तर की प्रतीक्षा में खड़ा हो गया।

'नहीं, कुछ नहीं। तुम भी लो हमारे साथ।'

नाश्ता करने के पश्चात मैं अपने काम के लिये निकल गया।

वह धीरे से मुस्कुराया और धन्यवाद कहते हुए चला गया।
दिन भर व्यस्त रहने के बाद जब सांय को लौटा तो कुछ होटलकर्मियों के साथ उसको गेट पर खड़ा पाया। मेरे कमरे में पहुंचते ही वह भी कमरे में चला आया और बड़ी आत्मीयता से पूछने लगा, 'बाबू जी, खाना खाया या नहीं? लगता है आज दिन भर आप व्यस्त रहे?''

इतनी आत्मीयता से पूछने पर मैंने भी उसे अपनी व्यस्तता बताते हुये कहा- 'इतना समय ही नहीं था कि खाना खाने के लिये कहीं बैठ पाता।'

वह खड़ा-खड़ा एक गहरी सोच में डूब गया था और मैं मन ही मन सोचने लगा कि 'आखिर इसे कैसे पता चला कि मैंने खाना नहीं खाया। इसने ऐसा प्रश्न क्यों किया? होटल में हजारों लोग आते हैं, क्या सभी से पूछते हैं ये लोग? नहीं ! नहीं !! क्या मतलब है इनको इन सब बातों से? ये तो नौकर हैं इन्हें ही क्या मालिक को भी क्या पड़ी है ? उसे तो बस किराये से मतलब है।' तभी मेरी दृष्टि उस पर पड़ी तो देखा वह अभी तक किसी गहरी सोच में जहां का तहां खड़ा था। मैंने साहस जुटाकर उससे
पूछ ही लिया, 'क्या नाम है तुम्हारा?'

'जी......विक्रम.........'

मैं कुछ और पूछना चाहता था कि नीचे से घण्टी बजते ही विक्रम हड़बड़ा कर बोला, 'बाबू जी अभी थोड़ी देर बाद आऊंगा।'और वह तेजी से चल दिया।

इस बार वह देर से आया और मैं भी तब तक उसकी प्रतीक्षा में बैठा रहा। उसके आते ही मैंने उससे पूछा-
'घर कहां है तुम्हारा ?'

'बाबू जी! पिथौरागढ़।'

'कब से हो यहां?

'जी पूरे तीन साल हो गये।'

'कहां तक पढ़े हो?'

'आठ पास किया है बस, बाबू जी।'

'यहां किसके साथ आये?'

'हमारे यहां का एक लड़का है उसी के साथ आया बाबू जी, कहता था कि कहीं अच्छी नौकरी लगा दूंगा किन्तु तब से बस यहीं पड़ा हूं।'

कितना पैसा मिलता है?

'जी, तीन सौ रुपया।'

'तो फिर बुराई क्या है? अच्छा खाना-पीना और तीन सौ रुपया मिल जाता है।'

'नहीं बाबू जी ! रात-दिन मेहनत करने के बाद सूखी तनख्वाह तीन सौ रुपया मिलते हैं, अब आप ही बताइये कि कैसे गुजारा होगा?'

'आठ के बाद पढ़ाई क्यों छोड़ी?'

'बाबू जी मेरे पिता जी खेती का काम करते हैं, मुझे आगे बढ़ाने की उनकी हिम्मत नहीं थी। एक साल घर में खाली रहा। बहुत हाथ-पैर मारे काम की तलाश में, किन्तु कुछ न मिला। हम चार भाई बहन हैं। एक बहिन बड़ी है उसकी अभी तक शादी भी नहीं हुई। कितनी कोशिश करते हैं परन्तु गरीब लोग हैं न, कौन पसन्द करता है गरीब की बेटी को ? दो भाई मुझसे छोटे हैं, स्कूल पढ़ने जाते हैं। पिता जी की इच्छा थी कि मैं किसी अच्छी नौकरी में लग जाऊं और कुछ पैसा कमाकर बहिन की शादी करवा दूं। उन्हें क्या पता कि मैं यहां किस स्थिति में हूं। वे तो हर बार यही लिखते हैं कि तुमने इस महीने इतना कम मनिआउँर क्यों भेजा?' वह कुछ क्षण के लिये रुका और छत की ओर निहारते हुये बोला।

'बाबू जी तीन साल से मैंने अपने भाई बहिनों को नहीं देखा।' उसका गला रुंधा गया था और आंखों से आंसू छलक आए थे।

'गांव गये ही नहीं ?'

'नहीं बाबू जी ! जाता भी कैसे ? पहनने के लिये कपड़े ही नहीं हैं, जितनी तनख्वाह मिलती है मनीआर्डर कर देता हूं। यदि गांव गया तो अपने लिये कपड़े बनवाने पड़ेंगे साथ ही कुछ सामान भी खरीदना पड़ेगा। फिर आने-जाने का किराया भी तो चाहिये। दो महीने की तनख्वाह ऐसे ही चली जायेगी तो छोटे भाइयों की फीस का क्या होगा? छुट्टी जाऊंगा तो उतने दिनों के पैसे भी कट जायेंगे। बस यही सोच कर नहीं जा पाता हूं। वह बेचारगी के साथ बोला।

'घर में भी तो याद करते होंगे तुम्हें?'

'खूब याद करते हैं। चिट्ठी लिखते हैं कि घर आओ और मैं भी लिख देता हूं कि अगले महीने तक आऊंगा, परन्तु तीन साल से वह दिन नहीं आया जब अपने गांव जाकर अपने भाई-बहिनों को गले लगा सकू। बहुत मन होता है बाबू जी, भाई-बहिनों को देखने का, किन्तु अपना ही देश मेरे लिये परदेश हो गया है।

उसने दोनों हाथों से अपने आंसू पोंछे और दीवार की ओर मुंह करके खड़ा हो गया।

'आगे पढ़ने की इच्छा नहीं होती ?' मैंने दु:खी होते हुये पूछा?

वह सिसकियां भरते हुए कहने लगा-'हम अभागों की किस्मत में कहां है लिखनापढ़ना बाबू जी ! पढ़ना तो बहुत चाहता था, पिता जी ने आते समय कहा कि 'बर्तन मांजकर ही लोग बड़े-बड़े साहब बने हैं, किन्तु वे भी तो तभी बने होंगे जब थोड़ा बहुत उन्हें पढ़ने का मौका मिला होगा। चौबीस घण्टे की नौकरी हैं सांस लेने तक की फुर्सत नहीं, काम करते-करते बदन टूट जाता है। मन करता है कि थोड़ा सा आराम मिल जाता परन्तु वह भी नसीब नहीं, ऐसे में पढ़ने की बात सोचना...।' बात को अधूरी छोड़ कर वह कुछ देर चुप रहा मैं भी कुछ नहीं बोल पाया।

थोड़ी ही देर बाद उसके चेहरे का पूरा भाव बदल गया था, बड़े आत्मविश्वास के साथ बोला-'बाबू जी मेरी तो बस एक ही इच्छा है कि चाहे मैं जिस हाल में भी रहूं किन्तु अपने भाइयों को खूब पढ़ाऊंगा। इतना पढ़ाऊंगा कि वे एक दिन बहुत बड़े साहब बन जायें। चाहे मुझे कुछ न दें। मेरा क्या है आधी जिन्दगी भाइयों की लिखाई-पढ़ाई में गुजर जायेगी। उसके बाद कोई चिन्ता नहीं।'

इतने में फिर घण्टी कि आवाज आयी।

'बाबू जी माफ करना, अपना समझ कर आपसे न जाने क्या-क्या कह बैठा। आप भी सोचेंगे कैसा पागल लड़का है। रजिस्टर में आपका नाम ‘पोखरियाल' पढ़कर मुझे लगा, आप भी पहाड़ के हैं नहीं तो.......।

कभी मेरे लायक कोई सेवा हो तो याद अवश्य करना बाबू जी।' कहकर वह तेजी से चल दिया।

मेरी फिर उससे दुबारा मुलाकात नहीं हो पाई। दो साल बाद मैं फिर उसी होटल में

रुका था उसके बारे में पूछा था तो पता चला कि वह कुछ समय पहले कहीं और नौकरी करने चला गया, आज कई साल बीत गये हैं।

तब से आज तक वह मासूम चेहरा मेरे स्मृति पटल पर ज्यों का त्यों अंकित है, जिसे मैं चाहकर भी नहीं भुला पा रहा हूं।

-रमेश पोखरियाल 'निशंक'

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