भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

Find Us On:

English Hindi
Loading
किसी के आँसुओं पर | ग़ज़ल  (काव्य)    Print  
Author:भावना कुँअर | ऑस्ट्रेलिया
 

किसी के आँसुओं पर, ख़्वाब का घर बन नहीं सकता
भरी बरसात में फिर, शामियाना तन नहीं सकता

दुआओं का अगर हो हाथ सर पर तो भला डर क्या
वो जो खारा समंदर है भला क्यों छन नहीं सकता

भले हालात ने उसको, बना डाला हो आतंकी
कि माँ की कोख से तो लाल, ऐसा जन नहीं सकता

लबालब हो गरल से गर, भला फिर भी है क्यूँ डरना
कुचल दोगे समय से गर, उठा वो फन नहीं सकता

ना हीरे हैं ना मोती हैं, भले कमज़ोर दिखती हूँ
क़लम ताकत मेरी,कोई,चुरा ये धन नहीं सकता

अगर बारूद फैला हो,हमारे घर के आँगन में
वहाँ होली,दीवाली,ईद कुछ भी मन नहीं सकता

-डॉ० भावना कुँअर
 सिडनी (ऑस्ट्रेलिया)

Back

Comment using facebook

 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
  Captcha