शिक्षा के प्रसार के लिए नागरी लिपि का सर्वत्र प्रचार आवश्यक है। - शिवप्रसाद सितारेहिंद।

Find Us On:

English Hindi
Loading
जीवन का अधिकार (काव्य)    Print  
Author:सुमित्रानंदन पंत | Sumitranandan Pant
 

जो है समर्थ, जो शक्तिमान,
जीवन का है अधिकार उसे।
उसकी लाठी का बैल विश्‍व,
पूजता सभ्‍य-संसार उसे!

दुर्बल का घातक दैव स्‍वयं,
समझो बस भू का भार उसे।
'जैसे को तैसा'-- नियम यही,
होना ही है संहार उसे।

है दास परिस्थितियों का नर,
रहना है उसके अनुसार उसे।
जीता है योग्‍य सदा जग में ,
दुर्बल ही है आहार उसे।

तृण, झष पशु से नर-तन देता,
जीवन विकास का तार उसे।
वह शासन क्‍यों न करे भू पर,
चुनना है सब का सार उसे।

-सुमित्रानंदन पंत

 

Back

Comment using facebook

 
 
Post Comment
 
Name:
Email:
Content:
Type a word in English and press SPACE to transliterate.
Press CTRL+G to switch between English and the Hindi language.
  Captcha
 

 

सब्स्क्रिप्शन

Captcha Code

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश