हिंदी भारतीय संस्कृति की आत्मा है। - कमलापति त्रिपाठी।

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चीरहरण (काव्य)    Print  
Author:जैनन प्रसाद
 

हँस रहे हैं आज
कई दुशासन।
द्रोपदी को निर्वस्त्र देख।
और झुके हुए हैं
गर्दन वीरों के।
सोच रहें है--
इस आधुनिक जुग में
कैसे वार करें
तीरों के।
चीखती हुई उस
अबला की पुकार
सभी को खल रहा है।
आज कृष्ण की जगह
लोगों में
दुर्योधन पल रहा है ।

-जैनन प्रसाद, फीजी

 

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