जिस देश को अपनी भाषा और अपने साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता। - देशरत्न डॉ. राजेन्द्रप्रसाद।

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रामनरेश त्रिपाठी के नीति के दोहे  (काव्य)    Print  
Author:रामनरेश त्रिपाठी
 

विद्या, साहस, धैर्य, बल, पटुता और चरित्र।
बुद्धिमान के ये छवौ, है स्वाभाविक मित्र ।।

नारिकेल सम हैं सुजन, अंतर, दयानिधान ।
बाहर मृदु भीतर कठिन, शठ हैं बेर समान ॥

आकृति, लोधन, वचन, मुख, इंगित, चेष्टा, चाल ।
बतला देते हैं यही, भीतर की सब हाल ।।

शस्त्र वस्त्र भोजन भवन, नारी सुखद नवीन ।
किन्तु अन्न, सेवक, सचिव, उत्तम हैं प्राचीन ।।

- रामनरेश त्रिपाठी
  [ पद्यपीयूष ]

 

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