अपनी सरलता के कारण हिंदी प्रवासी भाइयों की स्वत: राष्ट्रभाषा हो गई। - भवानीदयाल संन्यासी।
इसको ख़ुदा बनाकर | ग़ज़ल (काव्य)    Print  
Author:विजय कुमार सिंघल
 

इसको ख़ुदा बनाकर उसको खुदा बनाकर 
क्यों लोग चल रहे हैं बैसाखियां लगाकर

दो टूक बात कहना आदत-सी हो गई है
हम उनसे बात करते कैसे घुमा-फिराकर

चेहरों का एक जमघट आंखों के सामने है
हम कैसे भाग जाएं सबसे नज़र बचाकर

जो तुझ को देके गाली हरदम पुकारता है
कहता है कौन तुझसे उसके लिए दुआ कर

बाहर की रोशनी तो बाहर की रोशनी है
रोशन तू अपने अंदर एहसास का दिया कर

-विजय कुमार सिंघल

 

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