मैं महाराष्ट्री हूँ, परंतु हिंदी के विषय में मुझे उतना ही अभिमान है जितना किसी हिंदी भाषी को हो सकता है। - माधवराव सप्रे।
 
सामने गुलशन नज़र आया | ग़ज़ल (काव्य)       
Author:डॉ सुधेश

सामने गुलशन नज़र आया
गीत भँवरे ने मधुर गाया ।

फूल के संग मिले काँटे भी
ज़िन्दगी का यही सरमाया ।

उन की महफ़िल में क़दम मेरा
मैं बडी गुस्ताखी कर आया ।

आँख में भर कर उसे देखा
फिर रहा हूँ तब से भरमाया ।

चोट ऐसी वक्त ने मारी
गीत होंठों ने मधुर गाया ।

धुंध ऐसी सुबह को छाई
शाम का मन्जर नज़र आया ।

आँख टेढ़ी जब हुई उन की
ज़िन्दगी ने बस क़हर ढाया ।

- सुधेश

 

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