भाषा का निर्माण सेक्रेटरियट में नहीं होता, भाषा गढ़ी जाती है जनता की जिह्वा पर। - रामवृक्ष बेनीपुरी।
 
कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें (काव्य)       
Author:कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar

कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें

Back
More To Read Under This

 

झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं | ग़ज़ल
ताज़े-ताज़े ख़्वाब | ग़ज़ल
मैं अपनी ज़िन्दगी से | ग़ज़ल
भरोसा इस क़दर मैंने | ग़ज़ल
पुराने ख़्वाब के फिर से | ग़ज़ल
 
 
Post Comment
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश