कैसे निज सोये भाग को कोई सकता है जगा, जो निज भाषा-अनुराग का अंकुर नहिं उर में उगा। - हरिऔध।

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हममें फर्क है (काव्य)     
Author:प्रीता व्यास | न्यूज़ीलैंड

तुम्हारा नजरिया भले ही समान हो
मेरे और अख़बार के प्रति,
मगर हममें फर्क है
सामयिक सूचनाओं से भरा
पहला पेज नहीं हूँ मैं
जो समय के साथ रद्दी हो जायेगा
मै तो वो विशिष्ट परिशिष्ट हूँ
जो समय के साथ
संग्रहणीय होता जायेगा
सरसरी नज़र डाल कर
भले ही रद्दी वाले को थमा दो
ध्यान दे लोगे
तो हिफाज़त से
रखने की फ़िक्र करोगे।

-प्रीता व्यास
 न्यूज़ीलैंड

 

 

 

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